जानना जरूरी है: दुष्यंत का वंश अश्वत्थामा तक कैसे पहुंचा? शकुंतला पुत्र भरत से जुड़े हैं महाभारत के चिरंजीवी
राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के वंश से आगे चलकर सुहोत्र, अजमीढ, दिवोदास और कृपी होते हुए अश्वत्थामा का जन्म हुआ।
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राजा दुष्यंत ने तपोवन में शकुंतला से गंधर्व विवाह किया था, किंतु राजधानी लौटने पर वह उसे स्वीकार करने में संकोच करने लगे। जब शकुंतला अपने पुत्र भरत को लेकर राजसभा में पहुंची, तब दुष्यंत ने उसे पहचानने से इन्कार कर दिया। उसी समय आकाशवाणी हुई, ‘राजन! पुत्र पिता के ही तेज से उत्पन्न होता है। शकुंतला सत्य कह रही है। इस बालक को स्वीकार करो।’ देववाणी सुनकर दुष्यंत ने भरत को अपना पुत्र स्वीकार किया। भरत आगे चलकर महान चक्रवर्ती सम्राट बने। उन्हीं के नाम पर यह देश भारत तथा उनके वंशज भारतीय कहलाए।
भरत के अनेक पुत्र हुए, परंतु माताओं के शाप और क्रोध के कारण वे जीवित न रह सके। तब देवताओं ने महर्षि बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज को भरत का पुत्र स्वीकार कराया। भारद्वाज की प्रेरणा से भरत को वितथ नामक पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र प्राप्त होने के बाद भरत स्वर्गलोक चले गए और भारद्वाज वितथ का राज्याभिषेक कर खुद वन चले गए। वितथ के पांच पुत्र हुए-सुहोत्र, सुहोता, गय, गर्ग और कपिल। इनमें सुहोत्र के वंश में काशिक और गृत्समति थे। गृत्समति के वंश में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों का विस्तार हुआ। काशिक के दो पुत्र हुए-काशेय और दीर्घतपा। सुहोत्र के एक अन्य पुत्र बृहत हुआ, जिससे अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ का जन्म हुआ।
अजमीढ की तीन रानियां नीलिनी, केशिनी और धूमिनी थीं। नीलिनी से सुशांति उत्पन्न हुए। उनके वंश में पुरुजाति और वाह्याश्व का जन्म हुआ। वाह्याश्व के पांच पुत्र मुद्गल, सृंजय, बृहदिषु, यवीनर और कृमिलाश्व हुए। उनका राज्य पंचाल कहलाया और वे पंचाल नरेश। मुद्गल के वंश में मौद्गल्य ऋषि उत्पन्न हुए, जो क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी ब्रह्मर्षि के समान तेजस्वी थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र इंद्रसेन हुए, जिनसे वध्य्रश्व का जन्म हुआ। वध्य्रश्व और अप्सरा मेनका से दो संतानें उत्पन्न हुईं-पुत्र दिवोदास और कन्या अहल्या।
- दिवोदास आगे चलकर महान राजा बने। अहल्या का विवाह महर्षि गौतम से हुआ। महर्षि गौतम और अहल्या के पुत्र शतानंद भी अपने माता-पिता के समान महान तपस्वी और विद्वान थे।
- वह मिथिला के राजा जनक के राजपुरोहित बने। जब महर्षि विश्वामित्र भगवान राम व लक्ष्मण को लेकर जनक की सभा में पहुंचे, तब शतानंद ने ही उनका आदर-सत्कार किया था।
उन्होंने श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र के महान तप, त्याग और पराक्रम का विस्तार से वर्णन किया। सीता स्वयंवर के अवसर पर भी वह उपस्थित थे। शतानंद के पुत्र शरद्वान धनुर्वेद के महान आचार्य थे। एक दिन एक अप्सरा को देखकर उनका वीर्य सरकंडों पर गिर पड़ा, जिससे एक बालक और एक बालिका का जन्म हुआ। शरद्वान, दोनों बच्चों को छोड़कर चले गए। उसी समय राजा शांतनु वन में शिकार के लिए निकले थे। वह नवजात बच्चों को अपने महल ले आए और उनका पालन-पोषण किया। कृपा से अपनाए जाने के कारण बालक का नाम कृप और बालिका का नाम कृपी रखा गया। समय आने पर महर्षि शरद्वान को ज्ञात हुआ कि राजा शांतनु जिन दोनों बालकों का पालन कर रहे हैं, वे उन्हीं की संतान हैं। तब उन्होंने राजमहल पहुंचकर कृप और कृपी को अपनी पहचान बताई तथा उन्हें अपने साथ ले जाकर वेद, शास्त्र और धनुर्वेद की शिक्षा दी।
कृप ने अल्प समय में ही समस्त अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया और महान धनुर्धर तथा आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। आगे चलकर वह हस्तिनापुर के राजगुरु बने और कौरव-पांडव, दोनों को शस्त्रविद्या का प्रशिक्षण दिया। महाभारत के महायुद्ध में भी कृपाचार्य कौरव पक्ष के प्रमुख योद्धाओं में सम्मिलित हुए। युद्ध समाप्त होने पर वह जीवित बचे कुछ योद्धाओं में से एक थे और आगे चलकर राजा परीक्षित के भी गुरु बने। कृपी का विवाह महर्षि भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य से हुआ। उनके गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ, जो महाभारत का एक अद्वितीय और चिरंजीवी योद्धा माना जाता है।