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आर्थिक सुरक्षा की नई धुरी: आयात निर्भरता घटाने पर जोर, आत्मनिर्भरता भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन रहा

Sat, 25 Jul 2026 08:57 AM IST
ज्योति भास्कर डॉ पी एस चोहरा
डॉ पी एस चोहरा Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 25 Jul 2026 08:57 AM IST
सार

भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत अपनी आर्थिक नीतियों को नया आयाम देते हुए, आयात निर्भरता कम करके आत्मनिर्भरता को अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बना रहा है।

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New Pivot of Economic Security Emphasis on Reducing Import Dependence; Self-Reliance now Cornerstone in india
भारत के विकास की रफ्तार (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक नीतियों ने आत्मनिर्भर, प्रतिस्पर्धी और लचीली अर्थव्यवस्था के निर्माण पर विशेष बल दिया है। अनेक सुधारों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत अब केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि विश्व का एक प्रमुख विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बाधा, ऊर्जा अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव ने स्पष्ट किया है कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक जोखिम बन सकती है। इसलिए, स्थानीय उत्पादन बढ़ाना और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। भारत की वर्तमान आर्थिक नीति इसी दूरदर्शी सोच का प्रतिबिंब दिखाई देती है।

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इस नीति का उद्देश्य आयात पर कृत्रिम प्रतिबंध लगाना नहीं है। यह उन क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है, जहां भारत के पास प्रतिस्पर्धी लागत, तकनीकी क्षमता और विशाल घरेलू बाजार का लाभ उपलब्ध है। गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का कुल आयात लगभग 776 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। यह आंकड़ा बताता है कि भारत के आयात का आकार लगातार बढ़ा है। इस कारण व्यापार घाटा चुनौती बना हुआ है। ऐसे में, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना एक व्यावहारिक और आवश्यक रणनीति है।
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इसी सोच के तहत आर्थिक नीतियों को नया रुख देते हुए लगभग 1,272 उत्पादों की पहचान की गई है, जिनका भारत प्रतिवर्ष लगभग 189 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात करता है और जो उसके कुल आयात का करीब 26 प्रतिशत है। इन क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर आयात बिल में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की खपत भी कम होगी। वहीं, भारत के कुल आयात का लगभग 46 प्रतिशत कच्चे तेल, सोना और कोयला जैसे संसाधनों पर खर्च होता है।
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प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण निकट भविष्य में इनका आयात जारी रहना लगभग अपरिहार्य है। इसलिए, नीति का उद्देश्य उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना है, जहां घरेलू उत्पादन वास्तविक रूप से संभव और आर्थिक रूप से लाभकारी है। लगभग 28 प्रतिशत आयात ऐसे उत्पादों का है, जिनका निर्माण भारत में पहले से हो रहा है, लेकिन विदेशी उत्पाद कई मामलों में अधिक प्रतिस्पर्धी साबित हो रहे हैं।

इसलिए, भारत के सामने चुनौती इन उत्पादों की विश्वस्तरीय गुणवत्ता, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी नवाचार, लागत दक्षता और उत्पादकता विकसित करने की भी है, ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। इस रणनीति की सफलता में राज्यों को केंद्रीय नीतियों के साथ तालमेल बिठाना होगा। साथ ही, निवेशकों के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस, भूमि उपलब्धता, सरल नियम, निवेश-अनुकूल नीतियां और नियामकीय सुधार लागू करने होंगे। केंद्र को इस उद्देश्य के लिए राज्यों को वित्तीय मदद उपलब्ध करानी होगी।


फरवरी 2026 के बाद से रुपया डॉलर के मुकाबले 96 रुपये प्रति डॉलर से अधिक के स्तर तक कमजोर हुआ है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी सात प्रतिशत की कमी हो चुकी है। रुपये की कमजोरी का अर्थ है कि समान मात्रा में आयात के लिए अधिक भुगतान करना पड़ता है। यदि आयात निर्भरता कम होगी, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी कम होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों का अधिक मजबूती से सामना कर सकेगी। इस नीति के लाभ अनेक स्तरों पर दिखाई देंगे। 

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