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जनादेश मिला, सरकार बनी: फिर भी अधूरा है जम्मू-कश्मीर का सफर; आखिर कब मिलेगा राज्य का दर्जा?
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लाल चौक
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा केंद्र सरकार कई बार कर चुकी है, लेकिन सात साल बाद भी यह वादा पूरा नहीं हुआ। रणजी ट्रॉफी में जम्मू-कश्मीर की ऐतिहासिक जीत से लेकर रिकॉर्ड मतदान और निर्वाचित सरकार बनने के बावजूद राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया। लेख में इस देरी को लोकतांत्रिक अधिकारों, राजनीतिक वादों और केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में गंभीर सवालों के साथ उठाया गया है।क्या रणजी ट्रॉफी की जीत ने जम्मू-कश्मीर की नई पहचान की उम्मीद जगाई?
भारत की सबसे पुरानी क्रिकेट प्रतियोगिता रणजी ट्रॉफी नौ दशक से भी अधिक समय से खेली जा रही है। इस वर्ष की शुरुआत में इस प्रतियोगिता में उसके इतिहास का शायद सबसे बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जब कम आंकी जाने वाली जम्मू-कश्मीर की टीम ने आठ बार की विजेता कर्नाटक को फाइनल में हराकर खिताब जीत लिया। कर्नाटक क्रिकेट के आजीवन समर्थक होने के बावजूद मैं इस जीत से बेहद खुश था। लेकिन मुझसे भी अधिक प्रसन्नता राजनीतिक वैज्ञानिक अमिताभ मट्टू को हुई, जिनका जन्म और पालन-पोषण कश्मीर में हुआ है।
क्या यह जीत केवल क्रिकेट की सफलता थी या सांस्कृतिक बहुलता की भी?
अपनी टीम की इस शानदार जीत का उत्साहपूर्वक जश्न मनाते हुए मट्टू ने लिखा कि विजेता टीम के ग्यारह खिलाड़ी अलग-अलग बोलियां बोलते हैं और अलग-अलग धर्मों को मानते हैं, लेकिन मैदान पर टीम भावना और आपसी तालमेल ने इन सभी भिन्नताओं को पीछे छोड़ दिया। मट्टू ने इस जीत में सिर्फ क्रिकेट की सफलता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक बहुलता की जीत भी देखी। उन्होंने लिखा कि यह रणजी ट्रॉफी की जीत केवल बनाए गए रनों या लिए गए विकेटों की कहानी नहीं है। यह उस क्षेत्र के खुद को नए नजरिये से देखने और उम्मीद करने की कहानी है कि बाकी देश और दुनिया भी उसे एक नई दृष्टि से देखें।
क्या नागरिकों के अधिकार किसी खेल की जीत पर निर्भर होने चाहिए?
मट्टू का मानना था कि जम्मू-कश्मीर को जल्द से जल्द राज्य का दर्जा वापस मिलना चाहिए। आखिरकार, यह उपलब्धि केवल एक क्रिकेट सत्र जीतने की कहानी बनकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे लोगों के भीतर फिर से पैदा हुए आत्मविश्वास की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए। मट्टू का लेख मुझे भीतर तक छू गया, लेकिन साथ ही उसने मुझे उदास भी किया। आखिर जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के अधिकारों की मान्यता इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए और न ही हो सकती है कि क्रिकेट के मैदान पर कोई मुकाबला जीता गया या हारा गया।
अनुच्छेद 370 हटने के सात साल बाद भी राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिला?
अगस्त 2019 में जब अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया और जम्मू-कश्मीर को भारत के इतिहास में पहली बार किसी राज्य को घटाकर केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया, तब उम्मीद की गई थी कि उसे जल्द से जल्द फिर से राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा। लेकिन अब उस घटना को सात साल होने को हैं और जम्मू-कश्मीर अभी भी केवल एक केंद्र शासित प्रदेश बना हुआ है। यह स्थिति न सिर्फ वहां रहने वाले लोगों के लिए सदमे और निराशा का कारण है, बल्कि देश के सभी लोकतांत्रिक सोच रखने वाले नागरिकों के लिए भी चिंता का विषय है।
केंद्र सरकार ने राज्य का दर्जा बहाल करने के कौन-कौन से वादे किए?
अप्रैल 2024 में स्वतंत्र वेबसाइट ‘कश्मीर टाइम्स’ ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस देने को लेकर केंद्र सरकार की ओर से किए गए उन वादों की एक टाइमलाइन प्रकाशित की थी, जो अभी तक पूरी नहीं हुई हैं। केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के महज दो महीने बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पुलिस अधिकारियों के एक समूह से कहा था कि "जब हालात सामान्य हो जाएंगे, तब राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा।" उसी वर्ष दिसंबर में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने भी कहा था कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा "जल्द ही" वापस दे दिया जाएगा।
क्या चुनाव और परिसीमन के बाद भी वादा अधूरा रह गया?
केंद्रीय गृह मंत्री ने सरकार समर्थक एक टेलीविजन चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा, "मैंने स्पष्ट रूप से कहा था कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने के बाद वहां राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा।" वर्ष 2022 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया गया। इसके तहत जम्मू क्षेत्र में विधानसभा की छह सीटें बढ़ाई गईं, जबकि कश्मीर घाटी में केवल एक सीट का इजाफा हुआ। सितंबर 2024 में विधानसभा चुनाव हुए। अप्रैल में उधमपुर-डोडा में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि चुनाव के बाद केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल कर देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ‘इंडी’ गठबंधन को विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला। कुल 90 सीटों में से गठबंधन ने 49 सीटें जीत लीं, जबकि अकेले नेशनल कॉन्फ्रेंस को 42 सीटें मिलीं। इसके बाद उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
'उचित समय' आखिर कब आएगा?
‘कश्मीर टाइम्स’ ने राज्य का दर्जा बहाल करने के बारे में किए गए अधूरे वादों की जो टाइमलाइन प्रकाशित की थी, वह अप्रैल 2024 तक की कहानी बताती है। इसके बाद भी कई बार वादे किए गए, लेकिन अमल नहीं हुआ। बस "हालात सामान्य होने पर", "जल्द", "उचित समय पर" और "उपयुक्त अवसर आने पर" जैसे शब्द सुनने को मिले। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह कैसे तय होगा कि वह 'उचित समय' कब आ गया?
क्या फिल्म 'चौहान' के ट्रेलर ने नया विवाद खड़ा कर दिया?
हाल ही में जारी फिल्म ‘चौहान’ के ट्रेलर में पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथों आम कश्मीरियों द्वारा झेली गई हिंसा और पीड़ा का मजाक उड़ाया गया है और उसे कमतर दिखाने की कोशिश की गई है। लोगों का मानना है कि इसमें मानो यह संदेश दिया गया है कि अगर कश्मीरी दोबारा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग उठाते हैं तो राज्य की ओर से उनके खिलाफ इससे भी अधिक क्रूर हिंसा की जा सकती है।
रिकॉर्ड मतदान और निर्वाचित सरकार के बाद भी अधिकार सीमित क्यों हैं?
2024 के विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर में रिकॉर्ड 64 प्रतिशत मतदान हुआ। नेशनल कॉन्फ्रेंस को सत्ता में आए अब लगभग दो वर्ष होने वाले हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक जम्मू-कश्मीर को उसका राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया है। इसी महीने की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने बताया कि राज्य का दर्जा न होने के कारण निर्वाचित सरकार के पास वास्तविक अधिकार बहुत सीमित हैं।
क्या सातवीं वर्षगांठ पर भी राज्य का दर्जा केवल मांग बनकर रह जाएगा?
5 अगस्त, 2026 को अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने की सातवीं वर्षगांठ होगी। इस अवसर को देखते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 20 जुलाई को नई दिल्ली में एक प्रदर्शन आयोजित किया और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग उठाई, हालांकि घाटी में प्रभाव रखने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की इस पहल का समर्थन नहीं किया। वहीं, ‘इंडी’ गठबंधन के अन्य दलों ने भी इसे बहुत उत्साह से समर्थन नहीं दिया। इसके अलावा प्रदर्शन के लिए चुना गया समय भी अनुकूल नहीं था। 20 जुलाई को ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने संसद तक छात्रों का मार्च आयोजित किया था। इसलिए उस दिन का समाचार चक्र बड़ी संख्या में मार्च में शामिल हुए छात्रों और दिल्ली पुलिस द्वारा उनके खिलाफ की गई कथित कठोर कार्रवाई की खबरों से भरा रहा।
जब दूसरे छोटे राज्यों को अधिकार मिल सकते हैं तो जम्मू-कश्मीर को क्यों नहीं?
आखिर 1950 से 2019 तक जम्मू-कश्मीर भारत संघ का एक पूर्ण राज्य था। इस दौरान हिमालयी क्षेत्र में स्थित भारत के कम से कम नौ अन्य ऐसे क्षेत्र, जिन्हें कभी राज्य बनने योग्य नहीं माना जाता था, पूर्ण राज्यों का दर्जा हासिल कर चुके हैं। ये राज्य हैं- अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड। इन सभी राज्यों की आबादी जम्मू-कश्मीर से कम है। जब इन राज्यों की निर्वाचित सरकारों के पास अधिकार हो सकते हैं, तो जम्मू-कश्मीर को यह अधिकार क्यों नहीं मिल सकता?
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क्या राज्य का दर्जा न मिलना लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी सवाल खड़े करता है?
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री जिस हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े हैं, वह मुसलमानों को समान अधिकार वाले नागरिकों के बजाय ऐसे लोगों के रूप में देखती है, जिन्हें शासित किया जाना है और जिन्हें अधिकारों के लिए सत्ता के सामने गुहार लगानी पड़ती है। जम्मू-कश्मीर को लगातार और अनुचित तरीके से राज्य का दर्जा देने से इनकार करना उसी हानिकारक बहुसंख्यकवादी राजनीति का हिस्सा है, जो भारतीय गणराज्य की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बुनियाद को कमजोर कर रही है।