ये एक ही संकट की कड़ियां हैं: डिग्रियों की संख्या बढ़ाने की होड़, शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल विकास पीछे छूट गए
पेपर लीक, शिक्षा नीतियों पर विवाद और बढ़ती बेरोजगारी अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक ही संकट की कड़ियां हैं। डिग्रियों की संख्या बढ़ाने की होड़ में शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल विकास पीछे छूट गए हैं, जिसका असर अब भारत के कार्यबल पर साफ दिखाई दे रहा है।
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हाल ही में, नीट परीक्षा का पेपर लीक होना, और फिर सीबीएसई का वह विवाद, जिसमें पहली बार ऑनलाइन आंसर मार्किंग सिस्टम के लिए एक संदिग्ध कंपनी को काम पर लगाया गया था, भारत की शिक्षा व्यवस्था की हालत को बयां करता है। नई शिक्षा नीति, 2020 (एनईपी) खुद विवादों में घिरी हुई है। इसमें चार साल के पाठ्यक्रम में छात्रों को ऐसी चीजें पढ़ाई जाती हैं, जिन्हें वे पसंद नहीं करते, क्योंकि इससे उनके सीखने की क्षमता कम हो गई है। वे पुराने तीन साल के अंडरग्रेजुएट कार्यक्रम की तुलना में चार साल में कम सीखते हैं। इसके अलावा, विचारधारा के आधार पर बड़ी संख्या में फैकल्टी की नियुक्तियां भी हुई हैं। छात्रों पर आए इन संकटों को तेजी से निजीकृत हो रही स्कूल/उच्च शिक्षा व्यवस्था ने और बढ़ावा दिया है।
ये समस्याएं एक ढांचागत संकट का सिर्फ एक हिस्सा भर हैं। भारत ‘डीप टेक’ में चीन से मुकाबला कर विकसित देश बनना चाहता है। लेकिन, भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था ने सिर्फ दाखिले की संख्या बढ़ाई है-2006 में जीईआर (सकल नामांकन अनुपात) 11 फीसदी था, जो 2024 में 29 फीसदी हो गया है, लेकिन रोजगार पाने की क्षमता बहुत कम रही है। विडंबना यह है कि एनईपी, 2020 का लक्ष्य 2035 तक उच्च शिक्षा में जीईआर को 50 फीसदी तक पहुंचाना है। इस बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षा के विस्तार की नींव बहुत कमजोर थी-1991 में जब भारत ने अपना आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किया, तब साक्षरता दर मुश्किल से 51 फीसदी थी। आखिरकार, 1990 के दशक में सरकारी स्कूलों पर खर्च बढ़ा, जिससे पहले 2010 तक एलिमेंट्री स्कूलिंग (कक्षा 1-8) को सबके लिए सुलभ बनाया गया, और फिर 2015 तक लैंगिक समानता के साथ माध्यमिक (कक्षा 9-10) शिक्षा को। स्कूलों के तेजी से विस्तार ने यह पक्का कर दिया कि सीखने का स्तर, जो पहले से ही कम था, खराब ही बना रहेगा।
इसके बाद शिक्षा और श्रम बाजार से जुड़े तीन नतीजे सामने आए। पहला, भारत के कार्यबल की शिक्षा और कौशल की स्थिति बहुत खराब है। 1983 में कार्यबल का 56 फीसदी हिस्सा अनपढ़ था; 2024 में भी यह आंकड़ा 23 फीसदी (महिलाओं के मामले में 37 फीसदी) है, जो डरावना है। भारत की मौजूदा कार्यबल का 64 फीसदी हिस्सा ऐसा है, जिसकी शिक्षा आठ साल या उससे कम है। साथ ही, कार्यबल के सिर्फ 2.4 फीसदी लोगों के पास फॉर्मल वोकेशनल ट्रेनिंग (वीईटी) है और 4.7 फीसदी के पास कोई तकनीकी प्रशिक्षण (उच्च शिक्षा में) है, जबकि एनईपी का लक्ष्य वीईटी दाखिले को 2035 तक 50 फीसदी तक ले जाना है।
दूसरी बात, इतना कम पढ़े-लिखे कार्यबल के साथ यह हैरानी की बात नहीं है कि भारत का 90 फीसदी कार्यबल असंगठित क्षेत्र में काम करता है, क्योंकि उनके पास मध्यम या बड़ी कंपनियों में फॉर्मल नौकरी पाने के लिए जरूरी शिक्षा या कौशल नहीं है। तीसरी बात, स्कूल और उच्चतम शिक्षा, दोनों ही स्तर पर पढ़ाई की गुणवत्ता खराब होने की वजह से युवाओं में खुली बेरोजगारी बढ़ी है। 2011-12 में 15-29 साल के युवाओं में यह सिर्फ छह फीसदी थी, लेकिन 2017-18 तक यह तीन गुना बढ़कर 18 फीसदी (पीएलएफएस डाटा) हो गई। नोटबंदी के फैसले की वजह से बड़ी संख्या में एमएसएमई बंद हुए, जिसकी वजह से मंदी आई। इसके बाद कोविड तक हर तिमाही में जीडीपी ग्रोथ धीमी होती गई। ऐसे में, क्या भारत सच में अपने जनसांख्यिकी लाभांश का फायदा उठा सकता है?
कामकाजी उम्र की आबादी का एक बढ़ता हुआ हिस्सा असल में जीडीपी विकास दर को बढ़ाएगा। जब ऐसे कार्यबल का हिस्सा बढ़ता है और उन पर आश्रित रहने वालों का हिस्सा घटता है, तो देश अपने जनसांख्यिकी लाभांश का फायदा उठा पाता है। इसलिए, चीन ने तीन दशकों तक हर साल 9-10 फीसदी की दर से विकास किया और गरीबी घटाई। इसके उलट, भारत की विकास दर धीमी रही और कम समावेशी रही है। आंशिक रूप से इसलिए, क्योंकि इसकी आबादी कम पढ़ी-लिखी है। और, उससे भी बुरा हाल व्यावसायिक कौशल का है। 61 करोड़ के कार्यबल में से सिर्फ 2.4 फीसदी लोगों ने किसी काम या पेशे के लिए औपचारिक प्रशिक्षण लिया है। ज्यादा कुशल और बेहतर पढ़े-लिखे कार्यबल के साथ, वियतनाम और चीन ने विनिर्माण क्षेत्र में कहीं ज्यादा एफडीआई आकर्षित किया। उच्च शिक्षा में जरूरत से ज्यादा दाखिले को व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण (वीईटी) की तरफ मोड़ने की जरूरत है।
अगर खराब रोजगार क्षमता के कारणों की पड़ताल करें, तो इसका संबंध निजी कॉलेजों के बढ़ने की वजह से स्नातक शिक्षा के विस्तार से है। 20 वर्षों तक हर दिन चार नए कॉलेज! इनमें से ज्यादातर निजी कॉलेज हैं। कुल संबद्ध कॉलेजों की संख्या सदी की शुरुआत में 10,000 थी, जो लगभग 25 साल बाद बढ़कर 58,000 हो गई। इसका पहला कारण है कि सरकारी स्कूल खुले, तो निजी स्कूलों का भी विस्तार हुआ। निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या 2002-03 में 22 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 38 फीसदी हो गई। माध्यमिक स्तर पर भी निजी स्कूलों में दाखिल की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। 2006 में जहां केवल 25 फीसदी छात्र निजी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 52 प्रतिशत हो गया है। इसी दौरान उच्च माध्यमिक स्तर पर दाखिले की दर 30 फीसदी से बढ़कर लगभग 60 फीसदी हो गई। दूसरा कारण यह है कि उच्चतम शिक्षा में दाखिले बढ़ने के साथ निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी और तेजी से बढ़ी, क्योंकि सरकारों ने बढ़ती मांग के हिसाब से खर्च नहीं बढ़ाया। नतीजतन, शिक्षा की गुणवत्ता गिर गई।
नौकरी पाने की काबिलियत से जुड़ी समस्याओं का तीसरा कारण छात्रों द्वारा पढ़े जाने वाले विषयों का चयन था। यदि तुलना करें, तो वियतनाम में भारत के मुकाबले प्रति युवा आबादी पर लगभग 50-70 फीसदी से अधिक टर्शियरी एसटीईएम छात्र (विज्ञान और तकनीक की उच्च शिक्षा ले रहा विद्यार्थी) तैयार होते हैं। हैरानी नहीं कि वियतनाम ज्यादा विदेशी निवेश आकर्षित कर पाता है, क्योंकि विदेशी निवेशकों को वहां विनिर्माण से जुड़े कार्यबल के लिए ज्यादा संभावनाएं दिखती हैं। इसे भारत के सबसे ज्यादा औद्योगिकृत राज्यों में से एक, तमिलनाडु में भी देखा जा सकता है। तमिलनाडु में न सिर्फ उच्च शिक्षा में दाखिले का अनुपात 48 है, (वियतनाम से भी अधिक), बल्कि लगभग 30 फीसदी उच्च शिक्षा के छात्र एसटीईएम विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं। इससे जुड़ी नीतियों के नतीजे साफ हैं।
-साथ में जजाति परिदा, प्रोफेसर (हैदराबाद यूनिवर्सिटी)