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उत्तराखंड@ 25: उत्तराखंड को भी है 'लाइटहाउस चैलेंज' जैसे प्रोजेक्ट की जरूरत- संजीव चोपड़ा

अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 18 Aug 2022 07:47 PM IST
सार

राज्य के आवासीय संकट के आरंभिक आकलन के मुताबिक प्रदेश में कोई सात लाख लोग खस्ताहाल ढांचों या झुग्गी में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर गैरकानूनी या कब्जों वाली ज़मीनों पर हैं। अनेक तो जोखिम के साथ नदियों के किनारों और पर्यावरणीय तौर पर संवेदनशील जगहों पर हैं।

लेखक संजीव चोपड़ा
लेखक संजीव चोपड़ा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार

बेशक 2025 तक उत्तराखंड शून्य गरीबी वाला देश का पहला राज्य बन सकता है लेकिन सूबे की एक बड़ी और विकराल चुनौती यह है कि हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर जैसे राज्य के मैदानी जिलों में किफायती मकानों का इंतजाम कैसे हो! दरअसल यही तीन ज़िले शहरीकरण के केंद्र हैं, जहां पहले से घरों की किल्लत है। चूंकि यहां आर्थिक तरक्की के सबसे ज्यादा अवसर पनपते हैं, पहाड़ से इनकी ओर पलायन के कारण आगे भी यहां मकानों की भारी मांग पैदा होती रहेगी। पुरानी किल्लत और नई डिमांड- दोनों के जुड़ने से समस्या गहराती जाएगी।



राज्य के आवासीय संकट के आरंभिक आकलन के मुताबिक प्रदेश में कोई सात लाख लोग खस्ताहाल ढांचों या झुग्गी में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर गैरकानूनी या कब्जों वाली ज़मीनों पर हैं। अनेक तो जोखिम के साथ नदियों के किनारों और पर्यावरणीय तौर पर संवेदनशील जगहों पर हैं। इन सात लाख लोगों में से आधे तो ऐसे हैं जिन्हें भविष्य में डोरमेट्री सरीखे सामूहिक निवासों में कम किराये वाले विकल्पों की ही ज़रूरत होगी। लेकिन बाकी आधे यानी कोई साढ़े तीन लाख लोग ऐसे हैं जो एक बेडरूम वाले नन्हे किफायती मकान खरीद सकते हैं बशर्ते उनकी कीमत को 15-20 साल में आसान किस्तों में चुकाने की सुविधा मिले।

योजना से चूका उत्तराखंड

ऐसे ही आबादी वर्ग के लिए केंद्रीय आवास व शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय की एक शानदार योजना है-लाइटहाउस चैलेंज प्रोजेक्ट। बदकिस्मती से उत्तराखंड को इस योजना के दायरे में नहीं है। इस योजना में 6 राज्यों में से हरेक में एक बेड रूम हॉल व किचन वाले एक हज़ार से अधिक किफायती मकान बनने हैं। झारखंड में रांची, तमिलनाडु में चेन्नई, त्रिपुरा में अगरतला, मध्यप्रदेश में इंदौर, उत्तरप्रदेश में लखनऊ और गुजरात के राजकोट को इस प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था। लाइटहाउस चैलेंज प्रोजेक्ट की तकनीक खासी अलग और उन्नत है। मगर उसके सबसे आकर्षक बिंदु ये हैं कि एक तो हज़ार मकानों के समूचे प्रोजेक्ट को एक साल के भीतर पूरा किया जाना है और दूसरा, हरेक मकान की लागत 13 लाख रुपये से कम रखी जानी है। 

प्री-फ़ेब्रिकेटेड तकनीक में पहले से तैयार ब्लॉकों का प्रयोग प्रोजेक्ट को जल्द पूरा करने में सहायक होता है। साथ ही प्रोजेक्ट में भूकंपरोधी ढांचा, सोलर लाइट, पर्याप्त रोशनी और हवा वाले कमरे, सार्वजनिक हरियाली क्षेत्र, पेय जल आपूर्ति, चारदीवारी, पैदल पथ, आंतरिक सड़कें, बाहरी प्रकाश व्यवस्था, रेनवाटर हार्वेस्टिंग, सीवर, ड्रेनेज जैसी सुविधाएं भी होती हैं। बहरहाल, इस योजना की बस अगर 'मिस' हो गई तो अब उत्तराखंड क्या करें? मेरी राय में राज्य सरकार को अपना एक प्रतिनिधिमंडल अगरतला वाले प्रोजेक्ट के अध्ययन के लिए भेजना चाहिए। क्योंकि अगरतला और देहरादून की भौगोलिक संरचना मिलती- जुलती है।

सरकार खुद कर सकती है पहल

उधमसिंह नगर और हरिद्वार की आवासीय स्कीमों की खातिर सबक लेने के लिए प्रतिनिधिमंडल को लखनऊ जाना चाहिए। वहां के अनुभवों के आधार पर हरिद्वार, देहरादून और उधमसिंह नगर के लिए हर वर्ष 25-25 लाइटहाउस प्रोजेक्ट पूरे करने का लक्ष्य तय किया जाना चाहिए। हर साल 75 प्रोजेक्ट का मतलब होगा हर साल 75000 किफायती मकानों का निर्माण। इस तरह वर्ष 2025 तक कुल लगभग सवा दो लाख मकानों का निर्माण मुमकिन है जिससे प्रदेश की आवासीय समस्या कमोबेश सुलझ सकती है। कोई ज़रूरी नहीं कि प्रदेश सरकार खुद ही सीधे तौर पर ये प्रोजेक्ट चलाए। इसके लिए एक एसपीवी यानी स्पेशल पर्पज व्हीकल (विशिष्ट उद्देश्यएजेंसी) का गठन हो सकता है। 


इसके तहत प्रदेश सरकार या नगर निकाय हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए जमीन की पेशकश करेंगे। रुड़की के केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) से निर्माणकी तकनीक मिलेगी। सहकारी बैंक या सामान्य बैंक दीर्घकालिक ऋण प्रदान करेंगे। एसपीवी का निगरानी प्रकोष्ठ प्रोजेक्ट के विभिन्न कामों की समयसीमा के पालन पर नज़र रखेगा। प्रदेश गठन की पच्चीसवीं सालगिरह पर गरीबी मिटाने वाला देश का पहला राज्य बनने का महान लक्ष्य मैं पाठकों को बार-बार याद दिलाता हूं। किफायती हाउसिंग वाली इस कार्ययोजना पर वाकई अमल हो जाता है तो क्या पता, उत्तराखंड अपने हर नागरिक के सिर पर छत सुनिश्चित करने की प्रक्रिया की शुरुआत करनेवाला देश का राज्य भी बन जाए..! आमीन...!

(लेखक मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक एकेडमी के पूर्व निदेशक हैं। उन्होंने लंबे समय तक उत्तराखंड सरकार के शीर्ष पदों पर काम किया है। )

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