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Sibling Day: बचपन हुआ स्क्रॉल और रिश्ते हो गए म्यूट, मोबाइल फोन बर्बाद कर रहा है रिश्ते; घर में भी दूरियां!
सोनम प्रतिहस्त, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 10 Apr 2026 02:26 AM IST
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सार
छोटी सी मोबाइल स्क्रीन में सिमटी दुनिया से बचपन जहां स्क्रॉल हो रहा है वहीं रिश्ते म्यूट होकर रह गए हैं। अब यहां छोटी-छोटी बातों पर भाई-बहन में कहासुनी, नोक झोंक नहीं होती, किताबें दराजों में बंद हैं, खिलौने गायब हैं।
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- फोटो : Freepik
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विस्तार
घर एक, कमरे दो और मोबाइल की दो स्क्रीन... दिल्ली समेत दूसरे मेट्रो शहरों के फ्लैट कल्चर की नई तस्वीर इसी तरह बनती जा रही है। छोटी सी मोबाइल स्क्रीन में सिमटी दुनिया से बचपन जहां स्क्रॉल हो रहा है वहीं रिश्ते म्यूट होकर रह गए हैं। अब यहां छोटी-छोटी बातों पर भाई-बहन में कहासुनी, नोक झोंक नहीं होती, किताबें दराजों में बंद हैं, खिलौने गायब हैं। बातचीत का माध्यम भी व्हाट्सएप रह गया है। पसंदी-नापसंदी रील और स्टेटस से समझाए जाते हैं। आभासी दुनिया ने इनको पास होकर भी दूर कर दिया है।
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यकीन के लिए दिल्ली के लक्ष्मी नगर में रहने वाले एक परिवार की कहानी समझिए... अपनी 20 वर्षीय बेटी से उसके मम्मी-पापा इसलिए परेशान हैं क्योंकि उसका छोटा भाई घर में रहते हुए भी महीनों से सीधे बात नहीं करता। कुछ सवाल करने पर ना-हां तक बातचीत सीमित है। ज्यादा कहने पर चिल्लाता भी है। लंबे समय तक इस तरह का व्यवहार देखकर पूरा परिवार परेशान हो उठा और बच्चे की मानव व्यवहार एवं संबद्ध संस्थान (इहबास) में काउंसलिंग करवाई। पिछले तीन महीने से बच्चा डॉक्टर की देख-रेख में है।
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परिजन बताते हैं कि इस बीच इसके व्यवहार में बदलाव भी दिख रहा है। यही कहानी मानसरोवर पार्क में रहने वाली एक परिवार की भी है। इसमें मां-बाप के साथ 14 साल के एक बच्चा और 12 साल की एक बच्ची है। परिजनों का कहना है कि पहले दोनों साथ-साथ होते थे। कहासुनी, शिकायतें आम रहती थीं लेकिन मोबाइल मिलने के बाद आपस में इनकी बातचीत बंद सी हो गई। साथ होते हैं, स्कूल भी साथ ही जाते हैं लेकिन इनके बीच की बॉडिंग कमजोर हो गई है। कई बार ऐसा लगता है कि यह दूर के रिश्तेदार हो गए हैं। साथ रहने के बावजूद आपसी समझ, शेयरिंग और गहराई कम हो रही है, जिससे रिश्ता सतही होता जा रहा है। परिवार दोनों बच्चों की काउंसलिंग इहबास में करवा रहा है।
इस तरह के मामलों में इस वक्त तेजी से इजाफा हो रहा है। डिजिटल माध्यम से जुड़ाव बना रहता है लेकिन उसमें भावनात्मक गहराई कम हो सकती है। हंसी-मजाक, साझा पल और साथ बिताया समय ही रिश्तों को असल मजबूती देते हैं। बच्चों के साथ परिवार को समझना पड़ेगा कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ बातचीत से नहीं, बल्कि साथ बिताए गए अनुभवों से मजबूत होता है। तकनीक खुद समस्या नहीं है, लेकिन जब वह आमने-सामने के रिश्तों की जगह लेने लगती है, तब भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।
-डॉ. ओम प्रकाश, वरिष्ठ मनोचिकित्सक इहबास
संतुलन ही है कुंजी
विशेषज्ञों का मानना है कि टेक्नोलॉजी को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है, बल्कि संतुलन बनाना जरूरी है। परिवार में कुछ समय ऐसा तय किया जाना चाहिए, जब सभी सदस्य स्क्रीन से दूर रहकर एक-दूसरे के साथ समय बिताएं। कुछ समय ऐसा निर्धारित करें, जिसमें मोबाइल का इस्तेमाल पर सख्त मनाही हो। मसलन, नाश्ता करते वक्त, खाते वक्त, आपसी बातचीत के दौरान। इससे चीजें धीरे-धीरे रास्ते पर आ सकती हैं।
सिबलिंग बॉन्ड कमजोर होने के संकेत
- एक ही घर में रहकर भी ऑनलाइन बातचीत
- साथ खेलने और समय बिताने में कमी
- हर किसी का अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहना
- बातचीत में भावनात्मक गहराई की कमी
- छोटी-छोटी बातों पर जुड़ाव कम होना
ऐसे मजबूत करें रिश्ता
- रोज 30-60 मिनट ‘नो स्क्रीन टाइम’ रखें
- साथ में खेलें या कोई एक्टिविटी करें
- आमने-सामने बातचीत को बढ़ावा दें
- पुरानी यादों और अनुभवों को साझा करें
- छोटे-छोटे जेस्चर से अपनापन दिखाएं