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Gorakhpur News: ब्रह्म से जुड़कर ही किया जा सकता है आनंद का संधान
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते आचार
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गोरखपुर। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के पूर्व कुलपति प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी ने कहा कि हम जिसे जान लेते हैं वह ज्ञान है। जो जानने योग्य है वह ब्रह्म है। उस ब्रह्म से जुड़कर ही आनंद का संधान किया जा सकता है। सत्य ही ब्रह्म है। वही धर्म है।
वह बुधवार को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग और आनंद मार्ग प्रचारक संघ की बौद्धिक शाखा रेनैसांस यूनिवर्सल के संयुक्त तत्वावधान में ‘श्री श्री आनंदमूर्ति का भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि श्री श्री आनंदमूर्ति के दर्शन में ज्ञान युक्त, विकार मुक्त, ममत्व युक्त व भेद रहित जीवन का सृजन दिखता है। वह आध्यात्म से अनुप्राणित भौतिक विकास का पाठ सिखाते हैं।
मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. अनिल प्रताप गिरि ने कहा कि ‘आनन्दसूत्रम्’ आध्यात्मिक साधना और सामाजिक प्रयोजन का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करता है। रेनैसांस यूनिवर्सल के केन्द्रीय सचिव आचार्य दिव्यचेतनानंद अवधूत ने श्री श्री आनंदमूर्ति के सामाजिक-आर्थिक सिद्धांत ‘प्रोग्रेसिव यूटिलाइजेशन थ्योरी’ की व्याख्या करते हुए बताया कि संसाधनों का अधिकतम उपयोग और न्यायसंगत वितरण ही समग्र मानव विकास का आधार है।
विभागाध्यक्ष प्रो. कीर्ति पांडेय ने आनंद मार्ग की उत्पत्ति एवं विकास पर विस्तार से समझाया। संचालन डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी व आभार ज्ञापन डॉ. देवेंद्र पाल ने किया। तकनीकी सत्र में प्रो. आरपी सिंह, प्रो. शरद मिश्र, प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी, डॉ. अभिषेक शुक्ल, डॉ. रंजना बागची, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. प्रवीण द्विवेदी, डॉ. पीयूष मिश्र, डॉ. रंजनलता व डॉ. स्मिता द्विवेदी आदि ने विचार रखे।
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वह बुधवार को दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग और आनंद मार्ग प्रचारक संघ की बौद्धिक शाखा रेनैसांस यूनिवर्सल के संयुक्त तत्वावधान में ‘श्री श्री आनंदमूर्ति का भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि श्री श्री आनंदमूर्ति के दर्शन में ज्ञान युक्त, विकार मुक्त, ममत्व युक्त व भेद रहित जीवन का सृजन दिखता है। वह आध्यात्म से अनुप्राणित भौतिक विकास का पाठ सिखाते हैं।
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मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. अनिल प्रताप गिरि ने कहा कि ‘आनन्दसूत्रम्’ आध्यात्मिक साधना और सामाजिक प्रयोजन का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करता है। रेनैसांस यूनिवर्सल के केन्द्रीय सचिव आचार्य दिव्यचेतनानंद अवधूत ने श्री श्री आनंदमूर्ति के सामाजिक-आर्थिक सिद्धांत ‘प्रोग्रेसिव यूटिलाइजेशन थ्योरी’ की व्याख्या करते हुए बताया कि संसाधनों का अधिकतम उपयोग और न्यायसंगत वितरण ही समग्र मानव विकास का आधार है।
विभागाध्यक्ष प्रो. कीर्ति पांडेय ने आनंद मार्ग की उत्पत्ति एवं विकास पर विस्तार से समझाया। संचालन डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी व आभार ज्ञापन डॉ. देवेंद्र पाल ने किया। तकनीकी सत्र में प्रो. आरपी सिंह, प्रो. शरद मिश्र, प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी, डॉ. अभिषेक शुक्ल, डॉ. रंजना बागची, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. प्रवीण द्विवेदी, डॉ. पीयूष मिश्र, डॉ. रंजनलता व डॉ. स्मिता द्विवेदी आदि ने विचार रखे।