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Gorakhpur News: कॉमर्शियल सिलिंडर की किल्लत से उद्योगों पर बढ़ रहा दबाव, उत्पादन बंदी की आशंका
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गोरखपुर। प्लास्टिक दाने और एल्युमिनियम की कीमतों में भारी वृद्धि के चलते गोरखपुर की कई उद्योग इकाइयां बंदी के कगार पर पहुंच गई हैं। इंडस्ट्रियल एरिया में एल्युमिनियम बर्तन बनाने वाली दो यूनिटें कॉमर्शियल सिलिंडर की कमी के कारण उत्पादन रोकने की स्थिति में हैं। वहीं, गीडा में प्लास्टिक और पैकेजिंग उत्पाद बनाने वाली यूनिटों को भी नुकसान सहकर उत्पादन करना पड़ रहा है। प्लास्टिक दाने की कीमतें 80-90 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 160-170 रुपये प्रति किलो पहुंच गई हैं, लेकिन उपलब्धता सीमित है।
उद्यमियों का कहना है कि सरकारी आदेशों के तहत उन्हें पुराने रेट पर बोरे और पैकेजिंग उत्पाद सप्लाई करना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ा है। एल्युमिनियम बर्तन बनाने वाली यूनिटों को एक साथ दस कॉमर्शियल सिलेंडर की आवश्यकता है, अन्यथा कुछ दिनों में उत्पादन रुक जाएगा। कूलर, वाशिंग मशीन और पंखा बनाने वाली यूनिटों में प्लास्टिक मटेरियल की कीमत में 90 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके अलावा वायरिंग और प्लंबर के काम की लागत 10-15 फीसदी बढ़ गई है। बोरिंग, पाइप और मोटर जैसी वस्तुएं महंगी होने से रियल इस्टेट और बड़े निर्माण कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
आर्किटेक्ट मनीष मिश्रा का कहना है कि टाइल्स, प्लम्बर के काम के साथ वायरिंग की लागत में 30 से 40 फीसदी तक महंगा हो गया है। प्लास्टिक का बोतल बनाने वाले अजय श्रीवास्तव का कहना है कि पॉलीमर की कीमत 115 रुपये से बढ़कर 170 रुपये प्रति किलो हो गई है। पानी और कोल्ड ड्रिंक की बोतलों की उत्पादन लागत भी 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। कंपनियों ने बिक्री मूल्य नहीं बढ़ाया है, जिससे मुनाफा घटा है। धागे की महंगाई से टेक्सटाइल सेक्टर भी संकट में है।
लघु उद्योग भारती के प्रांतीय अध्यक्ष दीपक कारीवाल ने बताया कि अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध के असर से कोई भी इंडस्ट्री अछूती नहीं रही। पॉलिएस्टर और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें उद्योगों को बंदी की ओर धकेल रही हैं। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो निकट भविष्य में और इकाइयां उत्पादन बंद करने को मजबूर हो सकती हैं।
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उद्यमियों का कहना है कि सरकारी आदेशों के तहत उन्हें पुराने रेट पर बोरे और पैकेजिंग उत्पाद सप्लाई करना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ा है। एल्युमिनियम बर्तन बनाने वाली यूनिटों को एक साथ दस कॉमर्शियल सिलेंडर की आवश्यकता है, अन्यथा कुछ दिनों में उत्पादन रुक जाएगा। कूलर, वाशिंग मशीन और पंखा बनाने वाली यूनिटों में प्लास्टिक मटेरियल की कीमत में 90 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके अलावा वायरिंग और प्लंबर के काम की लागत 10-15 फीसदी बढ़ गई है। बोरिंग, पाइप और मोटर जैसी वस्तुएं महंगी होने से रियल इस्टेट और बड़े निर्माण कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
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आर्किटेक्ट मनीष मिश्रा का कहना है कि टाइल्स, प्लम्बर के काम के साथ वायरिंग की लागत में 30 से 40 फीसदी तक महंगा हो गया है। प्लास्टिक का बोतल बनाने वाले अजय श्रीवास्तव का कहना है कि पॉलीमर की कीमत 115 रुपये से बढ़कर 170 रुपये प्रति किलो हो गई है। पानी और कोल्ड ड्रिंक की बोतलों की उत्पादन लागत भी 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। कंपनियों ने बिक्री मूल्य नहीं बढ़ाया है, जिससे मुनाफा घटा है। धागे की महंगाई से टेक्सटाइल सेक्टर भी संकट में है।
लघु उद्योग भारती के प्रांतीय अध्यक्ष दीपक कारीवाल ने बताया कि अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध के असर से कोई भी इंडस्ट्री अछूती नहीं रही। पॉलिएस्टर और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें उद्योगों को बंदी की ओर धकेल रही हैं। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो निकट भविष्य में और इकाइयां उत्पादन बंद करने को मजबूर हो सकती हैं।