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भारत अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है : प्रो. दीप्ति
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कुरुक्षेत्र। श्रीमद्भागवदगीता वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में आयोजित आचार्य विकास वर्ग कार्यक्रम क
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कुरुक्षेत्र। श्रीमद्भागवतगीता वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में आचार्य विकास वर्ग जारी रहा। डीएसपी कुरुक्षेत्र सिद्धार्थ, दीप्ति और चेतराम शर्मा प्रदेश उपाध्यक्ष हिंदू शिक्षा समिति ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। दीप्ति ने भारतीय मूल्य दर्शन पर अपना व्याख्यान दिया।
उन्होंने कहा कि भारत अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। शब्द ब्रह्म हैं और भारतीय मूल्य दर्शन जीवन जीने की एक पद्धति है। दीप्ति ने विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू वह है जो दूसरों को प्रिय बना ले। मूल्य हमारे विश्वास, सिद्धांत और व्यवहार को दर्शाते हैं। बच्चों को मां के प्रति मोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया। भारतीय संस्कृति की धुरी आध्यात्मिकता है, जिसमें ऋग्वेद और उपनिषदों का महत्व है। अहिंसा को परम धर्म माना गया है और धरती को मां कहा जाता है। भारत में अतिथि देवो भव और राष्ट्र देवो भव का नारा दिया जाता है।
पिछले एक दशक में गर्व से कहो हम हिंदू हैं जैसे भाव बढ़े हैं। पूरी धरती को एक परिवार मानने की भावना प्रबल हुई है। उन्होंने परिवार को संस्कृति की धुरी बताया और उसे संजोने पर जोर दिया। संतान उत्पत्ति दूसरों के सुख के लिए होनी चाहिए, यह भी कहा गया। भारतीय संस्कृति परहित, करुणा, समरसता और समानता पर बल देती है, जाति-पाति छोड़कर सभी को एक परिवार मानना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि भारत अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। शब्द ब्रह्म हैं और भारतीय मूल्य दर्शन जीवन जीने की एक पद्धति है। दीप्ति ने विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू वह है जो दूसरों को प्रिय बना ले। मूल्य हमारे विश्वास, सिद्धांत और व्यवहार को दर्शाते हैं। बच्चों को मां के प्रति मोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया। भारतीय संस्कृति की धुरी आध्यात्मिकता है, जिसमें ऋग्वेद और उपनिषदों का महत्व है। अहिंसा को परम धर्म माना गया है और धरती को मां कहा जाता है। भारत में अतिथि देवो भव और राष्ट्र देवो भव का नारा दिया जाता है।
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पिछले एक दशक में गर्व से कहो हम हिंदू हैं जैसे भाव बढ़े हैं। पूरी धरती को एक परिवार मानने की भावना प्रबल हुई है। उन्होंने परिवार को संस्कृति की धुरी बताया और उसे संजोने पर जोर दिया। संतान उत्पत्ति दूसरों के सुख के लिए होनी चाहिए, यह भी कहा गया। भारतीय संस्कृति परहित, करुणा, समरसता और समानता पर बल देती है, जाति-पाति छोड़कर सभी को एक परिवार मानना चाहिए।