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Kangra News: निर्वासित तिब्बती संसद ने चीन के खिलाफ पारित किए दो प्रस्ताव
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धर्मशाला। पर्यटन नगरी धर्मशाला स्थित निर्वासित तिब्बती संसद ने तिब्बत के भीतर गहराते संकट और चीन द्वारा थोपे गए तथाकथित जातीय एकता और प्रगति कानून के खिलाफ दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए हैं। इन प्रस्तावों के जरिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान तिब्बत में हो रहे मानवाधिकारों के हनन और सांस्कृतिक दमन की ओर खींचा गया है।
पहला प्रस्ताव 5-सूत्री एकजुटता संकल्प है। यह प्रस्ताव उन तिब्बतियों के साहस और सर्वोच्च बलिदान को समर्पित है, जिन्होंने तिब्बती संघर्ष के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। प्रस्ताव में 11वें पंचेन लामा सहित सभी राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई और तिब्बती लोगों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा, तिब्बत में जारी क्रूरता को समाप्त करने और वहां के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को पहुंच रहे नुकसान को रोकने की मांग की गई है। साथ ही वैश्विक नेताओं, सांसदों, मीडिया और शोध संस्थानों से तिब्बत का दौरा कर वास्तविक जमीनी स्थिति देखने का आग्रह किया गया है।
वहीं, दूसरा प्रस्ताव का 7-सूत्रीय कानूनी चुनौती है। इसमें संसद ने चीन के जातीय एकता कानूनों को अंतरराष्ट्रीय और संवैधानिक मानकों के तहत अवैध और अनैतिक करार दिया है। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि चीन जबरन सांस्कृतिक समायोजन की नीतियां थोप रहा है, जिसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए। प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र से इन कानूनों की समीक्षा करने और सांस्कृतिक विनाश के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की अपील की गई है। साथ ही तिब्बत के भीतर रह रहे तिब्बतियों से अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने और स्वतंत्रता की लौ को जीवित रखने का आह्वान किया गया है।
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पहला प्रस्ताव 5-सूत्री एकजुटता संकल्प है। यह प्रस्ताव उन तिब्बतियों के साहस और सर्वोच्च बलिदान को समर्पित है, जिन्होंने तिब्बती संघर्ष के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। प्रस्ताव में 11वें पंचेन लामा सहित सभी राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई और तिब्बती लोगों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा, तिब्बत में जारी क्रूरता को समाप्त करने और वहां के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को पहुंच रहे नुकसान को रोकने की मांग की गई है। साथ ही वैश्विक नेताओं, सांसदों, मीडिया और शोध संस्थानों से तिब्बत का दौरा कर वास्तविक जमीनी स्थिति देखने का आग्रह किया गया है।
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वहीं, दूसरा प्रस्ताव का 7-सूत्रीय कानूनी चुनौती है। इसमें संसद ने चीन के जातीय एकता कानूनों को अंतरराष्ट्रीय और संवैधानिक मानकों के तहत अवैध और अनैतिक करार दिया है। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि चीन जबरन सांस्कृतिक समायोजन की नीतियां थोप रहा है, जिसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए। प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र से इन कानूनों की समीक्षा करने और सांस्कृतिक विनाश के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की अपील की गई है। साथ ही तिब्बत के भीतर रह रहे तिब्बतियों से अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने और स्वतंत्रता की लौ को जीवित रखने का आह्वान किया गया है।