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Sirmour News: कंडईवाला पर दो साल बाद भी मंडरा रहा मलबे का डर
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ग्राउंड रिपोर्ट
13 अगस्त 2023 की तबाही की यादें ताजा, अधूरे सुरक्षा कार्यों से ग्रामीणों में अब भी दहशत
दो साल पहले हजारों टन मलबे ने उजाड़ा था गांव, आज भी बारिश में जागकर रात काट रहे लोग
मुख्यमंत्री के दौरे और घोषणाओं के बाद भी अधूरे हैं डंगे, नाले और अन्य बचाव कार्य
धर्म सिंह तोमर
नाहन (सिरमौर)। उपमंडल नाहन के कंडईवाला गांव के लोगों की स्मृतियों में 13 अगस्त 2023... तारीख आज भी एक ऐसे जख्म की तरह दर्ज है, जो वक्त बीतने के बावजूद नहीं भर पाया। उस दिन हुई मूसलाधार बारिश के बीच पहाड़ी से अचानक हजारों टन मलबा गांव की ओर उमड़ पड़ा। कुछ ही मिनटों में घरों, दुकानों, सड़कों और वाहनों को चपेट में लेने वाले इस मलबे ने पूरे गांव की जिंदगी थाम दी थी।
दो साल बाद जब अमर उजाला ने कंडईवाला का दौरा किया तो आपदा के निशान भले ही काफी हद तक मिट चुके हों, लेकिन ग्रामीणों के मन में बैठा डर अब भी जस का तस है। हर बारिश के साथ लोगों की नजरें उसी पहाड़ी पर टिक जाती हैं, जहां से दो वर्ष पहले तबाही का सैलाब उतरा था।
तबाही की तस्वीरें आज भी आंखों में ताजा
ग्रामीण बताते हैं कि उस दिन किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। देखते ही देखते कई घरों में कई-कई फीट तक मलबा भर गया। राशन, घरेलू सामान और फर्नीचर मलबे में दब गए। बाजार में खड़ी मोटरसाइकिलें और वाहन गायब हो गए। कई परिवारों के घरों में चूल्हा तक नहीं जल पाया।
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स्थानीय निवासी एन. ठाकुर के दो ट्रैक्टर मलबे में दब गए थे। राजेंद्र चौहान की दुकान के बाहर खड़ी करीब 28 मोटरसाइकिलें मलबे की चपेट में आ गई थीं। शटरिंग का सामान पूरी तरह दब गया। एक निजी स्कूल की बस भी रास्ते में फंस गई थी। इसमें करीब 30 बच्चे सवार थे। राहत टीमों की तत्परता से बड़ा हादसा टल गया, लेकिन गांव कई दिनों तक दहशत में जीता रहा। हालात इतने खराब थे कि पूरे क्षेत्र को सामान्य होने में करीब दो महीने लगे। जेसीबी मशीनें लगातार मलबा हटाती रहीं और तब जाकर लोगों की दिनचर्या पटरी पर लौट सकी।
वादे किए, सुरक्षा अब भी अधूरी
आपदा के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह और प्रशासनिक अधिकारी गांव पहुंचे थे। प्रभावित परिवारों को राहत का भरोसा दिया गया और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए सुरक्षा डंगे, नाले का सुधार और अन्य स्थायी सुरक्षा कार्य करवाने की घोषणा की गई। अब दो साल बाद जमीनी हकीकत इन दावों से अलग दिखाई देती है। जिन सुरक्षा कार्यों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, वे अब भी अधूरे हैं। गांव में कहीं भी ऐसी व्यापक संरचनाएं नजर नहीं आतीं, जिनसे ग्रामीण खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।
नई पुलिया बनी नई आशंका
गांव के प्रवेश क्षेत्र में एक पुलिया का निर्माण जरूर हुआ है, लेकिन यही अब ग्रामीणों की नई चिंता बन गई है। लोगों का कहना है कि पुलिया की ऊंचाई पर्याप्त नहीं है। उनका डर है कि यदि भविष्य में फिर भारी मात्रा में मलबा आया तो वह पुलिया के मुहाने पर ही अटक जाएगा। इससे पानी का बहाव रुक सकता है और मलबा दोबारा गांव की ओर फैल सकता है। यानी जिस पुलिया से सुरक्षा की उम्मीद थी, वही भविष्य में खतरे की वजह बन सकती है।
हर बरसात में लौट रहा डर
महिमा चंद्र, राजेंद्र चौहान, बाबू राम और अन्य ग्रामीण बताते हैं कि मानसून शुरू होते ही गांव में बेचैनी बढ़ जाती है। तेज बारिश होने पर लोग रातभर जागकर हालात पर नजर रखते हैं। उनका कहना है कि जब तक स्थायी सुरक्षा कार्य पूरे नहीं होते, तब तक हर बारिश उन्हें 13 अगस्त 2023 की भयावह रात की याद दिलाती रहेगी।
उनका कहना है कि सरकार और प्रशासन ने बड़े-बड़े आश्वासन दिए थे, लेकिन दो साल बाद भी हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। उनका आग्रह है कि डंगे, नाले का निर्माण और पुलिया की ऊंचाई बढ़ाने जैसे कार्य अब और टाले नहीं जाने चाहिए।
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13 अगस्त 2023 की तबाही की यादें ताजा, अधूरे सुरक्षा कार्यों से ग्रामीणों में अब भी दहशत
दो साल पहले हजारों टन मलबे ने उजाड़ा था गांव, आज भी बारिश में जागकर रात काट रहे लोग
मुख्यमंत्री के दौरे और घोषणाओं के बाद भी अधूरे हैं डंगे, नाले और अन्य बचाव कार्य
धर्म सिंह तोमर
नाहन (सिरमौर)। उपमंडल नाहन के कंडईवाला गांव के लोगों की स्मृतियों में 13 अगस्त 2023... तारीख आज भी एक ऐसे जख्म की तरह दर्ज है, जो वक्त बीतने के बावजूद नहीं भर पाया। उस दिन हुई मूसलाधार बारिश के बीच पहाड़ी से अचानक हजारों टन मलबा गांव की ओर उमड़ पड़ा। कुछ ही मिनटों में घरों, दुकानों, सड़कों और वाहनों को चपेट में लेने वाले इस मलबे ने पूरे गांव की जिंदगी थाम दी थी।
दो साल बाद जब अमर उजाला ने कंडईवाला का दौरा किया तो आपदा के निशान भले ही काफी हद तक मिट चुके हों, लेकिन ग्रामीणों के मन में बैठा डर अब भी जस का तस है। हर बारिश के साथ लोगों की नजरें उसी पहाड़ी पर टिक जाती हैं, जहां से दो वर्ष पहले तबाही का सैलाब उतरा था।
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तबाही की तस्वीरें आज भी आंखों में ताजा
ग्रामीण बताते हैं कि उस दिन किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। देखते ही देखते कई घरों में कई-कई फीट तक मलबा भर गया। राशन, घरेलू सामान और फर्नीचर मलबे में दब गए। बाजार में खड़ी मोटरसाइकिलें और वाहन गायब हो गए। कई परिवारों के घरों में चूल्हा तक नहीं जल पाया।
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स्थानीय निवासी एन. ठाकुर के दो ट्रैक्टर मलबे में दब गए थे। राजेंद्र चौहान की दुकान के बाहर खड़ी करीब 28 मोटरसाइकिलें मलबे की चपेट में आ गई थीं। शटरिंग का सामान पूरी तरह दब गया। एक निजी स्कूल की बस भी रास्ते में फंस गई थी। इसमें करीब 30 बच्चे सवार थे। राहत टीमों की तत्परता से बड़ा हादसा टल गया, लेकिन गांव कई दिनों तक दहशत में जीता रहा। हालात इतने खराब थे कि पूरे क्षेत्र को सामान्य होने में करीब दो महीने लगे। जेसीबी मशीनें लगातार मलबा हटाती रहीं और तब जाकर लोगों की दिनचर्या पटरी पर लौट सकी।
वादे किए, सुरक्षा अब भी अधूरी
आपदा के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह और प्रशासनिक अधिकारी गांव पहुंचे थे। प्रभावित परिवारों को राहत का भरोसा दिया गया और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए सुरक्षा डंगे, नाले का सुधार और अन्य स्थायी सुरक्षा कार्य करवाने की घोषणा की गई। अब दो साल बाद जमीनी हकीकत इन दावों से अलग दिखाई देती है। जिन सुरक्षा कार्यों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, वे अब भी अधूरे हैं। गांव में कहीं भी ऐसी व्यापक संरचनाएं नजर नहीं आतीं, जिनसे ग्रामीण खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।
नई पुलिया बनी नई आशंका
गांव के प्रवेश क्षेत्र में एक पुलिया का निर्माण जरूर हुआ है, लेकिन यही अब ग्रामीणों की नई चिंता बन गई है। लोगों का कहना है कि पुलिया की ऊंचाई पर्याप्त नहीं है। उनका डर है कि यदि भविष्य में फिर भारी मात्रा में मलबा आया तो वह पुलिया के मुहाने पर ही अटक जाएगा। इससे पानी का बहाव रुक सकता है और मलबा दोबारा गांव की ओर फैल सकता है। यानी जिस पुलिया से सुरक्षा की उम्मीद थी, वही भविष्य में खतरे की वजह बन सकती है।
हर बरसात में लौट रहा डर
महिमा चंद्र, राजेंद्र चौहान, बाबू राम और अन्य ग्रामीण बताते हैं कि मानसून शुरू होते ही गांव में बेचैनी बढ़ जाती है। तेज बारिश होने पर लोग रातभर जागकर हालात पर नजर रखते हैं। उनका कहना है कि जब तक स्थायी सुरक्षा कार्य पूरे नहीं होते, तब तक हर बारिश उन्हें 13 अगस्त 2023 की भयावह रात की याद दिलाती रहेगी।
उनका कहना है कि सरकार और प्रशासन ने बड़े-बड़े आश्वासन दिए थे, लेकिन दो साल बाद भी हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। उनका आग्रह है कि डंगे, नाले का निर्माण और पुलिया की ऊंचाई बढ़ाने जैसे कार्य अब और टाले नहीं जाने चाहिए।