अमर को इस दुनिया से गए सालभर से अधिक हो गया है, लेकिन उसकी पत्नी वर्षा आज भी उस दिन को कोसती है, जब एक अनजान नंबर की कॉल ने उसकी हंसती-खेलती दुनिया बदलकर रख दी थी। यह कॉल एक अस्पताल से थी। उस तरफ से बताया गया कि आप फौरन अस्पताल आ जाइए, आपके पति का एक्सीडेंट हो गया है। किसी अनहोनी के डर से ही वह कंपकंपाने लगी थी। अभी एक घंटे पहले ही तो अमर ऑफिस के लिए निकले थे। जाते समय अमर ने मुस्कुराते हुए शाम को जल्दी घर आने का वादा किया था। वो वादा अधूरा ही रह गया, वर्षा की जिंदगी में घुप अंधेरा छा गया।
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कहते हैं कि जीवन और मृत्यु अटल सत्य हैं, जो आया है वह जाएगा भी। लेकिन जब असमय ही कोई अपना खो देता है, तो इस दुख का बोझ कई गुना बढ़ जाता है। इतना बढ़ जाता है कि सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। जिंदगी ठहर-सी जाती है। सभी बेगाने लगने लगते हैं। ऐसे में जरूरत महसूस होती है उन अपनों की, उन दोस्तों की जो आपके पहाड़ से भारी दुख और असहनीय दर्द को बांट सकें, उसे महसूस कर सकें। परंतु कभी कभी जब दर्द हद से गुजर जाता है, अपनों पर भरोसा नहीं हो पाता, ऐसे में जिसने अपना खास आदमी खोया है, वह आसपास की दुनिया से कटने लगता है। अपना दुख अपना मानकर दूसरों से बात करना छोड़ देता है।
इसका नतीजा यह होता है कि वह अवसाद का शिकार होने लगता है। कभी-कभी अपना जीवन भी बेकार समझ उसे खत्म करने की सोचने लगता है। पुरुष तो बाहर की दुनिया में कुछ हद तक जीवन की ओर मुड़ जाता है, मगर महिलाएं दुख से उबरने में प्रायः हताश और निराश हो जाती हैं। एक स्थिति ऐसी आ जाती है कि वे मनोरोग की शिकार हो जाती हैं, जहां उन्हें सामाजिक संरक्षण के अलावा, दवाओं का सहारा लेना पड़ता है।
मनोचिकित्सक डॉ. संदीप गोविल कहते हैं कि ऐसी स्थिति एक साल बाद बनती है। जब व्यक्ति सामान्य नहीं हो पाता। वे सदमे को तीन चरणों में बांटते हैं। पहला-‘शॉक एंड डिनायल’ यानी व्यक्ति मानता ही नहीं कि ऐसा हो गया है। दूसरा- ‘डिस्ट्रेस’ यानी जब वह मान लेता है कि उसके प्रिय की मृत्यु हो गई है, तो वह उदास रहने लगता है, खाना-पीना कम हो जाता है और काम में मन नहीं लगता। तीसरा चरण ‘डिटैैचमेंट’ है, जिसमें वह मान लेता है कि जीवन में अब कुछ बाकी नहीं रहा।
अपने किसी प्रिय की मृत्यु के एक महीने तक व्यक्ति गहरे सदमे में रहता है। फिर धीरे-धीरे यह दुख कम होने लगता है। लेकिन लंबे समय तक यदि कोई व्यक्ति सदमे से बाहर न निकल पाए, परिवार वालों, दोस्तों सबसे अलग रहने लगे, जीवन के प्रति मोह छोड़ दे और जो कुछ हुआ उसके लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगे, तो हम यह मान लेते हैं कि व्यक्ति मनोरोगी हो चुका है। ऐसे में उसको इलाज की आवश्यकता होती है।
जब कोई अपना बेहद करीबी इंसान खो देता है और जो दुख वह झेलता है, उसे कोई दूसरा महसूस नहीं कर सकता। लेकिन उस दुख को कोई तीसरा थोड़ा ही सही, बांट जरूर सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. शिल्पी शर्मा कहती हैं, "दुख का कोई पैमाना नहीं होता। न यह कि यह इंसान कम रोएगा और वह इंसान ज्यादा। लेकिन कुछ ये ही मानने के लिए तैयार नहीं होते कि ऐसा हो गया है।
यही जब डिनायल मोड़ में आ जाते हैं, तो खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सबसे पहले जो हादसा हुआ है, उसे मान लेना चाहिए। जो नुकसान हो चुका है, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। हां, जो आपने खोया है उसके बारे में अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से बात जरूर करें, ताकि आपके अंदर दुख इकठ्ठा न हो। अगर बात नहीं करेंगे, तो दुख बढ़ता जाएगा। इसलिए अपनी भावनाओं को जरूर शेयर करें।" किसी अपने की मृत्यु के सदमे से निकलने में मशहूर लेखिका लियाना चेंप की सलाह और उपाय काफी कारगर सिद्ध हो सकते हैं।
स्वयं को अलग न करें
दुख है ही ऐसा जो आपको सारी दुनिया से काट देता है। दुख की फितरत है कि यह आपको जटिल बना देगा, रहस्यमयी बना देगा। ऐसे में आपको कोई अपना चाहिए, जो आपको समझ सके। आपके दर्द को महसूस कर सके। उससे अपने दिल की बात, दर्द की बात और अपने किसी खास के खोने के दुख को साझा कीजिए। आपके बात करने से वह दर्द, वह दुख अवश्य कम होगा। हां, एक बात का ध्यान जरूर रखें। दूसरे के दर्द से अपनी तुलना मत कीजिए। इस दुनिया में न सुख समान हैं और न ही दुख एक समान। आपका दुख आपका है।