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सुना है क्या: 'आसमान से गिरे खजूर पर अटके', साथ ही 'मोबाइल से भयभीत मैडम और क्या होता है प्रोटोकॉल' के किस्से

Mon, 27 Jul 2026 09:17 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Mon, 27 Jul 2026 09:17 AM IST
सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

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Fallen from frying pan into fire Plus tales of Madam terrified of mobile and what exactly constitutes protocol
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'आसमान से गिरे खजूर पर अटके' की कहानी। इसके अलावा 'मोबाइल से भयभीत मैडम' और 'क्या होता है प्रोटोकॉल' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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आसमान से गिरे खजूर पर अटके

सूबे की सत्ता का सुख मिलने के बाद भी एक माननीय की स्थिति आसमान से गिरे खजूर पर अटके जैसी हो गई है। दरअसल, माननीय भले ही कभी चुनाव न जीते हों लेकिन वाकपटुता और तुकबंदी के बल पर पार्टी का अहम चेहरा बनकर भगवा दल की पहली सरकार में मंत्री भी बन गए। दूसरी सरकार में गाड़ी पटरी से उतर गई। हाल में विस्तार हुआ तो माननीय को उम्मीद थी लेकिन मामला नहीं बना। अब माननीय को उम्मीद है कि कम से कम दिल्ली की टीम में ही जगह मिल जाए लेकिन मामला बनता नहीं दिख रहा है। इस अहसास से माननीय का मधुमेह स्तर बढ़ गया है।

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मोबाइल से भयभीत मैडम

सेहत महकमे की मैडल को मोबाइल से भय लगता है। उनसे कोई मिलने जाए या विभागीय बैठक हो, हर वक्त उनकी निगाह मोबाइल पर रहती है। पिछले दिनों बैठक के दौरान एक मातहत मोबाइल लेकर पहुंच गया। फिर क्या था मैडम का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उन्होंने कमरे में घुसने वालों का मोबाइल चेक करने के लिए एक कार्मिक रखा है। बैठक में जाने से पहले संबंधित कार्मिक की एनओसी लेना अनिवार्य है। जब तक वह एनओसी नहीं देगा, तब तक संबंधित मातहत बैठक में हिस्सा नहीं ले सकता है। विभाग में चर्चा है कि एक तरफ मुखिया डिजिटल कार्यपद्धति सीखने पर करोड़ों खर्च कर रहे हैं तो दूसरी तरफ मैडम उससे दूर कर रही हैं।

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क्या होता है प्रोटोकॉल

पश्चिमी यूपी के एक जिले में होने वाले कार्यक्रम का जायजा लेने डीआईजी साहब पहुंचे थे। प्रोटोकॉल के तहत जिला कप्तान का मौके पर पहुंचना भी लाजिमी था। वह पहुंचे भी लेकिन बेहद कैजुअल अंदाज में। न वर्दी, न जूते... स्लीपर पहनकर पूरे आत्मविश्वास के साथ निरीक्षण करते रहे। उधर, डीआईजी साहब पूरी वर्दी में थे। चर्चा है कि कप्तान साहब का सीधे ऊपर तक कनेक्शन है। अवैध निर्माण ढहाकर वह अपनी छवि भी मजबूत करते रहते हैं। शायद यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर प्रोटोकॉल को ज्यादा तवज्जो नहीं देते।

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