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अध्ययन में खुलासा: उदासी की ओर धकेल रहे प्लास्टिक के सूक्ष्म कण, नैनोप्लास्टिक खत्म कर रहा हैप्पी हार्मोन

विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Tue, 26 May 2026 01:56 PM IST
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सार

प्लास्टिक के सूक्ष्म कण खून में मिलकर हमारे शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगाड़ रहे हैं। इससे हमारे शरीर में हैप्पी हार्मोन यानी डोपामिन की कमी हो रही है। लोग धीरे-धीरे उदासी और अवसाद की गिरफ्त में जा रहे हैं। इससे पार्किंसन का खतरा भी बढ़ रहा है। सीमैप अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है। आगे पढ़ें पूरी खबर...

Microplastic Particles Are Driving People Towards Depression Nanoplastics Are Depleting 'Happy Hormones'
रिसर्च। (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

राजधानी लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौध संस्थान (सीमैप) के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि प्लास्टिक के अतिसूक्ष्म कण प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण को ही नहीं बिगाड़ रहा, बल्कि लंबी अवधि में यह इंसानी दिमाग और तंत्रिका तंत्र के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

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सीमैप के वैज्ञानिकों ने पाया कि हल्दी, तुलसी, ग्रीनटी और ताजे फलों में प्राकृतिक रूप से पॉलीफेनॉल पाया जाता है जो एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है। ये हमें नैनोप्लास्टिक से होने वाले न्यूरोटॉक्सिसिटी से बचा सकते हैं। सीमैप संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. रत्नशेखर और उनकी टीम का यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल फ्री रेडिकल एंड मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है।

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कोशिकाओं के ऊर्जा केंद्र को बना रहे निशाना

सीमैप के वैज्ञानिकों ने ब्रेन लिपिडोमिक्स तकनीक की मदद से पाया कि नैनोप्लास्टिक मस्तिष्क की कोशिकाओं पर गहरा असर डालते हैं। ड्रोसोफिला जीव पर किए गए इस अध्ययन में पता चला कि प्लास्टिक के अतिसूक्ष्म कण माइटोकॉन्ड्रिया यानी कोशिकाओं के ऊर्जा केंद्र की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। इसके कारण कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ने लगता है। इससे डोपामिन जैसे जरूरी न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर कम होने लगता है। यही बदलाव आगे उदासी, अवसाद, पार्किंसन जैसी न्यूरोडीजेनरेटिव बीमारियों की स्थिति पैदा करते हैं।

हल्दी, तुलसी, ग्रीन-टी और ताजे फल कर सकते हैं बचाव

सीमैप के निदेशक डॉ. प्रबोध कुमार त्रिवेदी ने बताया कि हाल के वर्षों में कई अध्ययनों में यह पुष्ट हुआ है कि माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक के बेहद छोटे कण पानी, भोजन और रक्त के जरिये मस्तिष्क तक पहुंच रहे हैं। सीमैप वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि हल्दी, तुलसी और ताजे फलों में प्राकृतिक रूप से मौजूद पॉलीफेनॉल शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करते हैं। इनके सेवन से नैनोप्लास्टिक से होने वाली न्यूरोटॉक्सिसिटी से बचाव संभव है।

अध्ययन में ये भी रहे शामिल

प्रिया राठौर, आशुतोष के. तिवारी, राजेंद्र पी. पटेल, अनूप कुमार वर्मा, शीलेंद्र प्रताप सिंह भी इस अध्ययन में शामिल रहे। वैज्ञानिकों के अनुसार यह अध्ययन भविष्य में पार्किंसन रोग, मस्तिष्क संबंधी विकारों और प्लास्टिक प्रदूषण के बीच संबंध को समझने में नई दिशा देगा।

जानिए क्या है सीमैप

इस संस्थान की स्थापना 1959 में लखनऊ में हुई जो औषधीय और सुगंधित पौधों की उन्नत किस्मों के विकास, उनकी वैज्ञानिक खेती, जैव-प्रौद्योगिकी और पौधों से दवा निकालने जैसी तकनीकों पर शोध करता है। देश के कई राज्यों में इसकी शाखाएं हैं।

सीमैप के निदेशक डॉ. प्रबोध कुमार त्रिवेदी ने बताया कि हल्दी, तुलसी जैसे पौधों से मिलने वाले प्राकृतिक तत्व (फाइटोमॉलिक्यूल्स) नैनोप्लास्टिक से होने वाले दिमागी नुकसान से बचाने में मदद कर सकते हैं। ये तत्व शरीर में बनने वाले हानिकारक फ्री रेडिकल्स को कम करके ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस घटाते हैं। 
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