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Lucknow News: कथक की हर थाप में गूंजती है पं. लच्छू महाराज की विरासत

Mon, 20 Jul 2026 01:04 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 20 Jul 2026 01:04 AM IST
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Pandit Lachhu Maharaj's legacy resonates in every beat of Kathak.
पंडित लच्छू महाराज। (फाइल फोटो) 
लखनऊ। समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन कुछ गुरु अपनी कला के माध्यम से हमेशा जीवित रहते हैं। लखनऊ घराने की नजाकत, भाव-भंगिमा और अभिनय प्रधान कथक शैली को नई पहचान देने वाले पंडित लच्छू महाराज ऐसे ही महान आचार्य थे, जिनकी विरासत आज भी उनके शिष्यों की साधना, मंचीय प्रस्तुतियों और कथक की हर थाप में महसूस की जाती है। उनकी पुण्यतिथि पर रविवार को शिष्यों और कला जगत ने उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हुए उनके बहुआयामी योगदान को नमन किया।
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पंडित लच्छू महाराज ने कथक को केवल तकनीकी नृत्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पौराणिक कथाओं, कृष्ण लीला और मानवीय भावों को उसमें इस तरह पिरोया कि यह आम दर्शकों के लिए भी सहज, रोचक और आत्मीय बन गया। हिंदी फिल्मों से लेकर रंगमंच तक उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली की अमिट छाप छोड़ी। लखनऊ लौटने के बाद उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा को नई मजबूती दी और कथक की ऐसी पीढ़ी तैयार की, जो आज दुनिया भर में लखनऊ घराने की पहचान को आगे बढ़ा रही है।
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लास्य और अभिनय को दी नई पहचान
भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने बताया कि पं. लच्छू महाराज, बिंदादीन महाराज के गंडाबंध शिष्य थे। उन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कथक में लास्य, सूक्ष्म भावों और अभिनय को विशेष महत्व दिया। श्रृंगार रस, अंग-सौंदर्य और नजाकत के समावेश से उन्होंने कथक को नई कलात्मक ऊंचाई प्रदान की। उन्होंने कई नए प्रयोग किए और इंद्रसभा, मुगल-ए-आजम तथा पाकीजा जैसी क्लासिक फिल्मों तक कथक की पहुंच बनाकर इसकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने वहीदा रहमान और मधुबाला जैसी कलाकारों को भी प्रशिक्षण दिया।
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हर शिष्य की प्रतिभा के अनुसार देते थे शिक्षा

उनकी प्रमुख शिष्या एवं वरिष्ठ कथक नृत्यांगना प्रो. कुमकुम धर ने बताया कि गुरुजी किसी तय पाठ्यक्रम से नहीं पढ़ाते थे। वे पहले शिष्य की क्षमता और स्वभाव को समझते, फिर उसी के अनुरूप प्रशिक्षण देते थे। उन्होंने बिंदादीन महाराज की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ स्वयं भी साहित्य रचा, जिस पर आज भी कथक की प्रस्तुतियां होती हैं। गजलों पर कथक और अनेक नृत्य-नाटिकाओं की शुरुआत भी उन्होंने की। उनके दिखाए मार्ग पर आगे बढ़ते हुए उनके शिष्यों ने समसामयिक विषयों पर अनेक बैले तैयार किए, जिन्हें देश-विदेश में सराहना मिली। यही कारण है कि पंडित लच्छू महाराज केवल इतिहास का नाम नहीं, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान और कथक की जीवंत विरासत बन चुके हैं।
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