Lucknow News: या हुसैन, या अली... की सदाओं से गूंजा शहर
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हुसैनाबाद ट्रस्ट की ओर से आसिफी इमामबाड़े में मौलाना मजलिस के बाद शाही जुलूस निकाला गया। इसमें हुसैनाबाद ट्रस्ट के बैनर के पीछे नवाबी खानदान के सदस्य और शाही बाजा चल रहा था। मातमी धुनें, नक्कारे के साथ नौहाख्वानी होती रही। मातमी बैंड, होमगार्ड बैंड, चांदी के बल्लम, बरछियां और मोरपंखी लिए अजादार भी जुलूस का हिस्सा बने। सोजख्वानों की दर्दभरी मर्सियाख्वानी और नौहों ने माहौल को गमगीन बनाए रखा। रास्ते भर अकीदतमंदों ने शाही जरीह और तबर्रकात की जियारत कर इमाम हुसैन को खिराजे अकीदत पेश किया।
जुलूस के इस्तकबाल के लिए जगह-जगह लोग खड़े रहे। मातमी दस्ते सीनाजनी करते हुए चलते रहे, जबकि हजारों अकीदतमंद उनके साथ गम-ए-हुसैन का इजहार करते हुए शामिल रहे।
अजादारी का फायदा इंसान को: मौ. हुसैन कमालुद्दीन
कैसरबाग स्थित मकबरा सआदत अली खां में पहली मोहर्रम की मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना हुसैन कमालुद्दीन अकबर ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन को हर मजहब और मिल्लत के लोग मानते हैं। इंसानियत का तकाजा है कि इंसान हमेशा इंसान बनकर जिए। नमाज बुराई से रोकती है, जबकि रोजा तकवा और परहेजगारी पैदा करता है। मोहर्रम की मजलिसें और अजादारी का फायदा इमाम हुसैन को नहीं, बल्कि इंसानों को मिलता है। यह उन्हें बेहतर इंसान बनने की सीख देती हैं।

मुहर्रम की पहली तारीख पर बड़े इमामबाड़े से शाही जरीह निकाला गया।

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