यूपी: बांदा जेल के जेलर विक्रम सिंह सस्पेंड, रवि काना की रिहाई पर विवाद का मामला...इन्होंने की थी जांच
बांदा जेल से रवि काना की रिहाई पर उठे विवाद में कारागार प्रशासन ने कार्रवाई की है। जेलर को निलंबित कर दिया गया है, जबकि जेल अधीक्षक के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई है। प्रारंभिक जांच में रिहाई प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं।
विस्तार
बांदा जिला जेल से रवींद्र नागर उर्फ रवि काना की रिहाई पर लगातार सवाल उठ रहे थे। इसको लेकर कारागार प्रशासन पर लगातार दबाव पड़ रहा था। अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई की गई है। मामले में बांदा जिला जेल के जेलर विक्रम सिंह को निलंबित कर दिया गया है, जबकि जेल अधीक्षक के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश जारी किए गए हैं।
प्रकरण सामने आने के बाद डीजी जेल पीसी मीणा ने पूरे मामले की जांच डीआईजी जेल प्रयागराज को सौंपी थी। प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में रिहाई प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं, लापरवाही और नियमों के उल्लंघन के संकेत मिलने के बाद जेलर केपी यादव को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया
जेल से रिहा हुआ है आरोपी
जेल अधीक्षक द्वारा न्यायालय को भेजे गए पत्र में बताया गया कि आरोपी को प्रशासनिक आधार पर अगस्त 2024 में गौतमबुद्धनगर से बांदा कारागार स्थानांतरित किया गया था। 28 जनवरी 2026 को संबंधित प्रकरण का बी-वारंट कारागार को प्राप्त हुआ था। जिसमें 29 जनवरी को न्यायालय के समक्ष पेश करने का आदेश था। पुलिस गार्ड उपलब्ध न होने के कारण आरोपी को वीसी के माध्यम से पेश किया गया।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि आरोपी के खिलाफ अन्य सभी मामलों में रिहाई आदेश पहले ही प्राप्त हो चुके थे। वह केवल बी-वारंट के आधार पर ही बंद था। वहीं जेल प्रशासन का कहना है कि वीसी पेशी के बाद न तो अभिरक्षा वारंट प्राप्त हुआ और न ही अग्रिम पेशी तिथि की कोई सूचना मिली।
इसी आधार पर 29 जनवरी-2026 यानी बृहस्पतिवार को शाम 6:39 बजे आरोपी को रिहा कर दिया गया। वर्तमान में आरोपी जिला कारागार बांदा में बंद नहीं है। हालांकि न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार्य मानते हुए कहा कि जब जेल प्रशासन को पहले से जानकारी थी कि आरोपी बी-वारंट पर तलब है और उसी दिन रिमांड को लेकर सुनवाई भी हुई, तो ऐसे में आरोपी को रिहा करना न्यायिक आदेशों की अवहेलना है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना न्यायालय की अनुमति एवं सूचना के आरोपी को छोड़ना गंभीर चूक है, जो न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करती है। वहीं जेल से छूटने के बाद कहां आरोपी कहा गया नोएडा पुलिस को नहीं पता। फिलहाल पुलिस आरोपी के संपर्क में रहे लोगों की तलाश कर रही है।
डीआईजी जेल और डीजी जेल को भी दी गई प्रकरण
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जेल अधीक्षक से तीन प्रमुख बिंदुओं पर जवाब मांगा है। पहला, जब बी-वारंट की जानकारी पहले से थी तो किन परिस्थितियों और किस आधार पर आरोपी को रिहा किया गया। दूसरा वीसी के माध्यम से रिमांड की कार्यवाही चलने के बावजूद न्यायालय को सूचित किए बिना अभियुक्त को क्यों छोड़ा गया।
तीसरा क्यों न इस कृत्य को अभियुक्त के जेल कस्टडी से भागने की श्रेणी में मानते हुए जेल अधीक्षक के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाए। अदालत ने इस पूरे प्रकरण की जानकारी डीआईजी जेल और डीजी जेल को भी भेजी है ताकि आवश्यक स्तर पर जांच और कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
क्या है बी-वारंट
बी-वारंट अदालत द्वारा जारी किया जाने वाला ऐसा वारंट होता है। जिसके जरिए पहले से किसी अन्य मुकदमे में जेल में बंद आरोपी को किसी दूसरे मामले में पेश करने के लिए कोर्ट में तलब किया जाता है। जब किसी आरोपी के खिलाफ एक से अधिक मामले दर्ज होते हैं और वह किसी एक केस में न्यायिक हिरासत में होता है।
तब संबंधित अदालत जेल अधीक्षक को बी-वारंट जारी कर आरोपी की पेशी सुनिश्चित कराती है। बी-वारंट के आधार पर जेल प्रशासन आरोपी को तय तारीख पर पुलिस अभिरक्षा या जेल वैन के माध्यम से अदालत में पेश करता है। आमतौर पर बी-वारंट को प्रोडक्शन वारंट भी कहा जाता है। जबकि ए-वारंट बाहर खुले घूम रहे आरोपी की गिरफ्तारी के लिए जारी किया जाता है।
