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UP Election : सपा ने दलितों एवं अति पिछड़ों पर बढ़ाया फोकस, निकाय चुनाव में इस बार युवाओं को तवज्जो
चंद्रभान यादव, लखनऊ
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 05 Dec 2022 03:24 PM IST
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सार
UP Election: नगर निकाय चुनाव में इसकी झलक साफ दिखेगी। दलित एवं अति पिछड़े वर्ग के युवा चेहरों को आगे किया जाएगा। इनके जरिए लोकसभा चुनाव में वोट बैंक बढ़ाने की रणनीति है।
सांकेतिक तस्वीर...
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
समाजवादी पार्टी दलितों एवं अति पिछड़ों पर फोकस बढ़ा रही है। नगर निकाय चुनाव में इसकी झलक साफ दिखेगी। दलित एवं अति पिछड़े वर्ग के युवा चेहरों को आगे किया जाएगा। इनके जरिए लोकसभा चुनाव में वोट बैंक बढ़ाने की रणनीति है। एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को लामबंद रखते हुए इन जातियों को गोलबंद कर वोटबैंक की गठरी भारी करने की कोशिश है। मैनपुरी लोकसभा और खतौली व रामपुर विधानसभा उपचुनाव में भी यही रणनीति अपनाई गई है। पार्टी के रणनीतिकार इसे सुखद मान रहे हैं।
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सपा ने विधानसभा चुनाव के दौरान लोहियावादी और आंबेडकरवादी को एक मंच पर आने का आह्वान किया। नतीजा रहा कि पार्टी का वोट बैंक करीब 32 फीसदी तक पहुंच गया। सत्ता से दूरी रही, लेकिन वोट बैंक बढ़ने से शीर्ष नेतृत्व गदगद दिखा। अब यही रणनीति उपचुनाव में भी अपनाई है। मैनपुरी, रामपुर एवं खतौली में अति पिछड़े एवं दलित नेताओं को उनकी बिरादरी के बीच उतारा गया। वे निरंतर बसपा को भाजपा की बी टीम प्रचारित कर रहे हैं।
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यह संदेश दे रहे हैं कि अब सपा ही डॉ. आंबेडकर के सपनों को पूरा कर सकती है। उनका दावा है कि इस प्रयोग का असर दिख रहा है। लेकिन कितना, यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे। सामने नगर निकाय चुनाव है। ऐसे में दलित-अति पिछड़ों की गोलबंदी का फार्मूला अपनाने की तैयारी है। इस चुनाव में दलित एवं अति पिछड़े वर्ग के युवा एवं शिक्षित नेताओं को आगे बढ़ाया जाएगा। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि आरक्षित एवं पिछड़े वर्ग की सीटों पर उम्मीदवार के साथ ही अन्य नेताओं को भी लगाया जाएगा।
इससे एक तरफ वोट बैंक बढ़ेगा तो दूसरी तरफ शिक्षित युवाओं के जरिए संबंधित बिरादरी में नई सियासी पौध तैयार होगी। इससे नगरीय इलाकों में पार्टी मजबूत होगी। इस मजबूती का फायदा लोकसभा चुनाव में मिलेगा। इसी तरह संगठन में भी दलित एवं अति पिछड़ों को तवज्जो देने की तैयारी है। इसमें गैर जाटव बिरादरी पर ज्यादा जोर लगाया जाएगा।
युवा दलितों को तवज्जो देने की वजह
आंकड़ों पर गौर करें तो बसपा का वोट बैंक 2012 में करीब 26 फीसदी, 2017 में 22.4 और 2022 में 12.7 फीसदी पर पहुंच गया। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि बसपा के तमाम पुराने नेता छिटक गए हैं। इसमें कुछ सपा के साथ हैं। इन नेताओं को साथ रहते हुए नई पीढ़ी के दलितों को खुद से जोड़ने का फायदा मिल सकता है। वे बसपा के बजाय सपा से ज्यादा जुड़ाव महसूस करें, इसके लिए निरंतर अभियान चलाया जा रहा है। मैनपुरी उपचुनाव में पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज, केके गौतम जैसे नेता दलितों को लामबंद करते नजर आए तो रामकरन निर्मल, चंद्रशेखर चौधरी, मनोज पासवान जैसे युवा नेता भी पीछे नहीं हैं। वे युवाओं एवं छात्र नेताओं को एकजुट करके ताकत दिखा रहे हैं।
रामपुर में सपा-रालोद के साथ आजाद समाज पार्टी से गठबंधन करके सियासी संदेश दिया गया। मंच पर अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद के अगल-बगल बैठने के भी सियासी निहितार्थ है। पार्टी की रणनीति है कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्से में उभरते हुए दलित नेताओं को निरंतर जोड़ा जाए। पश्चिम में चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता साथ हैं तो बुंदेलखंड में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से निकले चंद्रशेखर चौधरी को तवज्जो दी जा रही है। इसका असर भविष्य में संगठन में साफ दिखेगा।
अति पिछड़ों के सहारे भाजपा की सेंधमारी की होगी भरपाई
प्रदेश में पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी करीब 52 फीसदी मानी जाती है। इसमें यादव एवं कुर्मी करीब 11 फीसदी होने का दावा करते हैं। यादव सपा का कोर वोट बैंक है। कुर्मी पर पहला दावा अपना दल करती है। सपा और भाजपा भी इन्हें अपने हिस्से में गिनते हैं। अब भाजपा ने यादव वोट बैंक में सेंधमारी शुरू की है। इसकी भरपाई के लिए सपा ने दलित और अति पिछड़ों पर फोकस किया है।
इसी तरह मौर्य, कुशवाहा अलग-अलग हिस्से में सपा और भाजपा के साथ हैं। जबकि लोध परंपरागत रूप से भाजपा के साथ है। करीब आठ से 10 फीसदी हिस्सेदारी वाली निषाद, कश्यप, मल्लाह, बिंद आदि जातियों में बिखराव है। सपा की रणनीति है कि इन्हें हर हाल में खुद से जोड़े रखा जाए। पूर्वांचल में सुभासपा के दावे वाली दो फीसदी राजभर बिरादरी को भी किसी न किसी रूप में तोड़ने की रणनीति अपनाई जा रही है।