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ब्राह्मणों का सियासी साथ, किसकी पूरी होगी आस: जनेश्वर के बहाने अखिलेश सक्रिय, यूपी में सपा और बसपा की नई बिसात
Mon, 10 Aug 2026 03:03 PM IST
Sharukh Khan
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Sharukh Khan
Updated Mon, 10 Aug 2026 03:03 PM IST
सार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ब्राह्मण समुदाय एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सपा के मुखिया अखिलेश यादव, जो 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण की राजनीति के लिए जाने जाते हैं, अब ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, इस बार भी मायावती की नजर ब्राह्मणों पर टिकी हैं।
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UP Politics
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आते ही प्रदेश के ब्राह्मण राजनीति के केंद्र में फिर आते दिख रहे हैं। पिछड़ा-दलित और अल्पसंख्यक के गठजोड़ 'पीडीए' की राजनीति करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं।
समय-समय पर पीडीए की तमाम परिभाषाएं बताने वाले सपा मुखिया ने अब 'पीडीए' के 'पीडी' को पंडित बताया है। पार्टी संस्थापकों में शामिल पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती पर यहां पार्टी मुख्यालय पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में कहा कि 'पीडी' का अर्थ पंडित है।
इसलिए सपा के एजेंडे में पंडित भी है। अखिलेश ने कानपुर के विकास दुबे के एनकाउंटर के हवाले और अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की उपेक्षा के उल्लेख के सहारे भाजपा को घेरने की कोशिश की है।
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अखिलेश का प्रयास अकारण नहीं है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है। आंक़ड़ों के अनुसार, यह प्रदेश में विधानसभा की 115 से 120 सीटों की चुनावी गणित प्रभावित करते हैं। पूर्वांचल के कुछ जिलों में तो इनकी आबादी 20 प्रतिशत तक भी मानी जाता है।
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समय-समय पर पीडीए की तमाम परिभाषाएं बताने वाले सपा मुखिया ने अब 'पीडीए' के 'पीडी' को पंडित बताया है। पार्टी संस्थापकों में शामिल पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती पर यहां पार्टी मुख्यालय पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में कहा कि 'पीडी' का अर्थ पंडित है।
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इसलिए सपा के एजेंडे में पंडित भी है। अखिलेश ने कानपुर के विकास दुबे के एनकाउंटर के हवाले और अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की उपेक्षा के उल्लेख के सहारे भाजपा को घेरने की कोशिश की है।
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अखिलेश का प्रयास अकारण नहीं है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है। आंक़ड़ों के अनुसार, यह प्रदेश में विधानसभा की 115 से 120 सीटों की चुनावी गणित प्रभावित करते हैं। पूर्वांचल के कुछ जिलों में तो इनकी आबादी 20 प्रतिशत तक भी मानी जाता है।
नब्बे के दशक में रामजन्मभूमि आंदोलन पर कांग्रेस की नीति, नीयत और निर्णयों से नाराज ब्राह्मणों ने कांग्रेस का साथ छोड़ भाजपा का हाथ थाम लिया। इसके पीछे ब्राह्मणों का संस्कृति और सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति झुकाव ही था। यही वह दौर था जब मुसलमान भी कांग्रेस से छिटका।
इसकी भी मुख्य वजह कांग्रेस का असमंजस था। साल 1990 के अक्तूबर में संतों के श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति व निर्माण को कारसेवा करने अयोध्या जा रहे हिंदुओं की गिरफ्तारी हुई। कर्फ्यू लगा। सुरक्षा बलों की गोलियों से कई कारसेवकों की मृत्यु हुई।
मुलायम को मिला था मुसलमानों का साथ
मुसलमानों के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मसीहा हो गए, क्योंकि उनकी नजर में मुख्यमंत्री ने ऐसा करके उनकी मस्जिद बचाई थी। मुलायम को मुसलमानों का साथ मिला तो उन्हें प्रदेश के 10 प्रतिशत यादव व 19 प्रतिशत मुसलमानों के योग से अपनी निजी राजनीतिक जमीन को मजबूत बनाने की राह दिखी।
मुसलमानों के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मसीहा हो गए, क्योंकि उनकी नजर में मुख्यमंत्री ने ऐसा करके उनकी मस्जिद बचाई थी। मुलायम को मुसलमानों का साथ मिला तो उन्हें प्रदेश के 10 प्रतिशत यादव व 19 प्रतिशत मुसलमानों के योग से अपनी निजी राजनीतिक जमीन को मजबूत बनाने की राह दिखी।
ब्राह्मणों का साथ मिला तो सत्ता आई हाथ
भाजपा के साथ ब्राह्मण और मुलायम के साथ मुसलमान। इसी समीकरण पर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 1991 में ही अर्थात अपनी स्थापना के 11वें साल पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली तो 1993 में सपा ने बसपा के साथ गठबंधन कर पिछड़ा, दलित और मुसलमान के समीकरण से सरकार बनाई । पर, मुलायम व मायावती का गठबंधन टिका नहीं तो मुख्य मुकाबला भाजपा व सपा के बीच होने लगा।
भाजपा के साथ ब्राह्मण और मुलायम के साथ मुसलमान। इसी समीकरण पर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 1991 में ही अर्थात अपनी स्थापना के 11वें साल पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली तो 1993 में सपा ने बसपा के साथ गठबंधन कर पिछड़ा, दलित और मुसलमान के समीकरण से सरकार बनाई । पर, मुलायम व मायावती का गठबंधन टिका नहीं तो मुख्य मुकाबला भाजपा व सपा के बीच होने लगा।
कहीं-कहीं बसपा इसमें तीसरा कोण बनाती। पर, गठबंधन के प्रयोगों की विवशता की दुहाई के साथ भाजपा ने राम जन्मभूमि से जुड़े संकल्प पर जब रुख बदलना शुरू किया तो ब्राह्मण क्षुब्ध हुआ। उसने दूसरे विकल्प तलाशने की कोशिश की। भाजपा सिमटने लगी।
वर्ष 2003 में जब मायावती का भाजपा से तीसरी बार गठबंधन टूटा तो मनुवाद और ब्राह्मणवाद को पानी पी-पीकर कोसने तथा अगड़ी जातियों के विरोध में राजनीति शुरू करने मायावती की नजर ब्राह्मणों पर गई। उन्होंने ब्राह्मणों को जोड़ने का अभियान चलाया। उन्होंने 2007 में सरकार बनाई। वर्ष 2012 में अखिलेश की जीत में भी ब्राह्मण मतों का योगदान रहा।
भाजपा में लौटा ब्राह्मण
खराब कानून-व्यवस्था, हिंदुओं के उत्पीड़न, मुस्लिम तुष्टीकरण, पलायन एवं मुजफ्फरनगर दंगा जैसी घटनाओं से नाराज ब्राह्मण सपा के खिलाफ होने लगा। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री व हिंदुत्ववादी छवि के नरेंद्र मोदी भाजपा की केंद्रीय राजनीति में आए। भाजपा हिंदुत्व, मंदिर, सनातन की राह पर फिर चलना शुरू हुई।
खराब कानून-व्यवस्था, हिंदुओं के उत्पीड़न, मुस्लिम तुष्टीकरण, पलायन एवं मुजफ्फरनगर दंगा जैसी घटनाओं से नाराज ब्राह्मण सपा के खिलाफ होने लगा। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री व हिंदुत्ववादी छवि के नरेंद्र मोदी भाजपा की केंद्रीय राजनीति में आए। भाजपा हिंदुत्व, मंदिर, सनातन की राह पर फिर चलना शुरू हुई।
मुस्लिम तुष्टीकरण पर प्रहार शुरू हुआ। ब्राह्मण फिर भाजपा में लौटने लगा। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 68 ब्राह्मणों को टिकट दिया, जिसमें 46 जीते। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रखर हिंदुत्ववादी राजनीति, बेहतर कानून-व्यवस्था तथा सनातन सरोकारों पर निरंतर काम ने ब्राह्मणों को तब से अब तक भाजपा के साथ जोड़कर रखा।
विधानसभा के पिछले यानी 2022 के चुनाव में भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक फिर जीते । पर, कुछ महीनों से यूजीसी गाइड लाइन सहित अन्य कई मुद्दों को लेकर ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी की खबरें चर्चा में हैं। बिहार में भरत तिवारी के पुलिस एनकाउंटर को लेकर ब्राह्मणों में दिख रहे आक्रोश और ट्रांसफर व पोस्टिंग सहित संगठन के पदाधिकारियों की नियुक्ति में ब्राह्मणों को पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने की चर्चाओं से दिख रहे असंतोष की बातें जब-तब सार्वजनिक होती रहती हैं।
पिछले वर्ष दिसंबर में पार्टी के एक विधायक पीएन पाठक के घर पर ब्राह्मण विधायकों की बैठक तथा इस पर भाजपा के अध्यक्ष पंकज चौधरी की सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई नाराजगी के बाद से ही ब्राह्मणों पर राजनीति तेज है। सियासी गलियारों में ब्राह्मणों में रोष व असंतोष की बातें गूंज रही हैं।
आसान नहीं अखिलेश की राह
शायद अखिलेश इसका ही लाभ उठाना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने जनेश्वर मिश्र की जयंती के सहारे ब्राह्मणों को रिझाने का फिर प्रयास शुरू किया है। वह चाहते हैं कि किसी तरह अगर कुछ ब्राह्मणों का वोट सपा की तरफ आ जाए तो भाजपा की गणित गड़बड़ा सकती है। इसीलिए उन्होंने पूर्व मंत्री पवन पाण्डेय को अयोध्या से पहला प्रत्याशी घोषित कर ब्राह्मणों के सम्मान की चिंता का संदेश देने का प्रयास किया है। पर, वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट कहते हैं कि 2022 के चुनाव से पहले भी अखिलेश परशुराम मंदिर, विष्णु मंदिर बनाने जैसी घोषणाओं तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने की घोषणाओं से ऐसा प्रयास कर चुके हैं। जहां तक यूजीसी या भरत तिवारी के एनकाउंटर का मुद्दा है तो इन दोनों से योगी आदित्यनाथ का कोई लेना-देना नहीं है।
शायद अखिलेश इसका ही लाभ उठाना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने जनेश्वर मिश्र की जयंती के सहारे ब्राह्मणों को रिझाने का फिर प्रयास शुरू किया है। वह चाहते हैं कि किसी तरह अगर कुछ ब्राह्मणों का वोट सपा की तरफ आ जाए तो भाजपा की गणित गड़बड़ा सकती है। इसीलिए उन्होंने पूर्व मंत्री पवन पाण्डेय को अयोध्या से पहला प्रत्याशी घोषित कर ब्राह्मणों के सम्मान की चिंता का संदेश देने का प्रयास किया है। पर, वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट कहते हैं कि 2022 के चुनाव से पहले भी अखिलेश परशुराम मंदिर, विष्णु मंदिर बनाने जैसी घोषणाओं तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने की घोषणाओं से ऐसा प्रयास कर चुके हैं। जहां तक यूजीसी या भरत तिवारी के एनकाउंटर का मुद्दा है तो इन दोनों से योगी आदित्यनाथ का कोई लेना-देना नहीं है।
ट्रांसफर व पोस्टिंग में ब्राह्मणों को पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने का सवाल जरूर उठ सकता है लेकिन इस मुद्दे पर अखिलेश सरकार भी पाकसाफ नहीं थी। ध्यान रखना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में प्रखर हिंदुत्व की राजनीति करने वाले योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। जो अपराधियों से कड़ाई से निपटने तथा सख्त कानून-व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं।
योगी हिंदुत्व के साथ राष्ट्रवादी राजनीति के भी प्रतीक बन चुके हैं। अब तक के अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि नाराजगी के बावजूद ब्राह्मण राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति से विमुख नहीं हो सकता। फिर अखिलेश ब्राह्मणों के खिलाफ जहर उगलने वाले अपने नेताओं को कितना रोक पाएंगे।
राह में खड़ी हैं ये भी मुश्किलें
- भट्ट के तर्क ठीक हैं। योगी की रीतिनीति ने प्रदेश में हिंदुओं में स्वाभिमान भरा है। अपराधियों एवं गुंडों तथा महिलाओं से दुर्व्यवहार करने वालों के साथ सख्ती ने भी योगी की छवि को काफी निखारा है। फिर जिस विकास दुबे के एनकाउंटर को अखिलेश ने ब्राह्मण उत्पीड़न का प्रतीक बताते हुए योगी को निशाने पर लिया है। उसके बाद विधानसभा का एक चुनाव हो चुका है। जिसमें उसका कोई असर नहीं दिखा।
यही नहीं, समाजवादी पार्टी के कोर वोट यादवों के साथ ब्राह्मणों के राजनीतिक तालमेल का काम भी कोई आसान नहीं है। अनेकों घटनाएं इसका प्रमाण हैं। अखिलेश ने ब्राह्णणों के सरोकारों को उठाते हुए कृष्ण-सुदामा की दोस्ती का उदाहरण दिया जरूर है। पर, उनके आग्रह को यादव कितना समझेंगे, यह बड़ा सवाल है।
- राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी कहते हैं कि अखिलेश के इस प्रयास में मुसलमान तो बाधा नहीं बनेगा। वह तो किसी भी तरह भाजपा को सत्ता से बाहर देखना चाहता है। पर, यादव और सपा के राजकुमार भाटी जैसे प्रवक्ता कब तक ब्राह्मणों को बर्दाश्त करेंगे, कहना मुश्किल है।
फिर हिंदुत्व का एजेंडा भी अखिलेश को उलझन में डालेगा। उनके सामने मुसलमानों के वोट का जो गंभीर सवाल है। दूसरी तरफ ब्राह्मणों के लिए भी एक सीमा से अधिक हिंदुत्व विरोधी राजनीति स्वीकार करना मुश्किल है। यही नहीं, सामाजिक धरातल पर ब्राह्मणों व यादव में नेतृत्व के वर्चस्व का टकराव भी बड़ा सवाल है। ऊपर से ब्राह्मणों को लेकर मायावती अखिलेश पर अलग निशाना साध रही हैं। ऐसे में आने वाले दिन ही बताएंगे कि अखिलेश या मायावती भाजपा से कितने ब्राह्मणों को अलग कर पाएंगे।
मायावती का भी ब्राह्मणों पर दांव
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण हमेशा राजनीति के केंद्र में रहा। बीते दो दशक में बसपा, सपा या दो बार से भाजपा की बन रही पूर्ण बहुमत की स्थिर सरकारों में ब्राह्मणों की लामबंदी ही बड़ा कारण रही। वैसे तो राजनीति में ब्राह्मण सक्रिय भूमिका तो काफी पहले से निभाता रहा है लेकिन बीते दो दशकों में ब्राह्मण के नाम पर राजनीति शुरू करने का श्रेय मायावती को ही जाएगा।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण हमेशा राजनीति के केंद्र में रहा। बीते दो दशक में बसपा, सपा या दो बार से भाजपा की बन रही पूर्ण बहुमत की स्थिर सरकारों में ब्राह्मणों की लामबंदी ही बड़ा कारण रही। वैसे तो राजनीति में ब्राह्मण सक्रिय भूमिका तो काफी पहले से निभाता रहा है लेकिन बीते दो दशकों में ब्राह्मण के नाम पर राजनीति शुरू करने का श्रेय मायावती को ही जाएगा।
- उन्होंने 2007 में इसका प्रयोग किया और सफलता हासिल की। इस बार भी मायावती की नजर ब्राह्मणों पर टिकी है। उन्होंने अभी तक जितने उम्मीदवारों की घोषणा की उनमें भी ब्राह्मणों की संख्या भी ठीकठाक है। ब्राह्मणों को संदेश देने के लिए मायावती ने भी पहला उम्मीदवार जालौन के माधवगढ़ से आशीष पाण्डेय के रूप में एक ब्राह्मण को ही घोषित किया है।
- दरअसल, भाजपा से तीन बार गठबंधन करके सत्ता का स्वाद चखती रही मायावती ने 2003 में सरकार से बाहर होने के बाद ब्राह्मणों की राजनीति में भागीदारी को मुद्दा बनाया। उन्होंने दलित, ब्राह्मण, मुसलमान के साथ पिछड़़ी जातियों के कुछ वोट हासिल कर सत्ता पाने का समीकरण बनाया।
- तिलक-तराजू और तलवार को जूते मारने के नारे से शुरू हुई बसपा में 'ब्राह्मण शंख बजाएगा-हाथी बढ़ता जाएगा' और 'हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा-विष्णु महेश है' जैसे नारे लगने लगे । जगह-जगह सम्मेलन किए। पार्टी में सतीश मिश्र, रामवीर उपाध्याय जैसे चेहरों को आगे किया। जमीन पर दलितों के साथ ब्राह्मणों के रिश्तों को ठीक करने के लिए सम्मेलन किए।
टिकटों में प्राथमिकता
- मायावती का नारा 'सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय' हो गया। उन्होंने 2007 चुनाव में 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया। जिसमें 41 पर उन्हें जीत मिली। मायावती की सरकार बन गई। अधिकारियों की नियुक्ति में भी ब्राह्मणों को अच्छी-खासी तवज्जो दी। पर, कुछ महीनों बाद ही बसपा के मूल कॉडर दलित और ब्राह्मणों के बीच खींचतान की घटनाएं शुरू हो गईं। लोगों में असंतोष बढ़ गया।
- फिर 2012 का चुनाव नजदीक आया। लोगों को विकल्प चाहिए था। विकल्प एकमात्र समाजवादी पार्टी दिख रही थी। मुसलमान और यादव के समीकरण से राजनीति कर रहे मुलायम सिंह यादव ने भी 2012 में ब्राह्मणों को साधने के लिए 45 ब्राह्मणों को टिकट दिया। जिसमें 21 जीते। अखिलेश यादव की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। सरकार बनने पर ब्राह्मणों की लामबंदी को स्थाई करने के कई उपाय किए गए लेकिन सफलता नहीं मिली। मुस्लिम तुष्टीकरण, दंगों और हिंदुओं की शोभायात्राओं पर हमले जैसी कई घटनाओं ने ब्राह्मणों को सपा से भी दूर कर दिया।