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Bhopal News: प्रदेश के तकनीकी कॉलेजों में स्टाफ का सूखा, भर्ती अटकी, खाली पदों के बोझ तले दबा पूरा सिस्टम

न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल Published by: Sandeep Kumar Tiwari Updated Sat, 25 Apr 2026 05:19 PM IST
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सार

एमपी के तकनीकी शिक्षा संस्थानों में स्टाफ की भारी कमी से व्यवस्था चरमराई हुई है। भर्ती प्रक्रिया एजेंसी तय न होने और नियमों में संशोधन के अभाव में अटकी है, जिससे पढ़ाई, रिसर्च और छात्रों के भविष्य पर असर पड़ रहा है।

Bhopal News: Staff Crisis Grips State's Technical Colleges—Recruitment Stalled; Entire System Crumbles Under t
आरजीपीवी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मध्यप्रदेश के तकनीकी शिक्षा संस्थानों में स्टाफ की भारी कमी अब सिस्टम पर सीधा असर डाल रही है। पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में वर्षों से नियमित नियुक्तियां नहीं होने के कारण पढ़ाई से लेकर शोध और प्लेसमेंट तक प्रभावित हो रहे हैं। हालात यह हैं कि भर्ती की पूरी प्रक्रिया एजेंसी तय न होने के कारण फाइलों में अटकी हुई है। तकनीकी शिक्षा विभाग (डीटीई) ने खाली पदों को भरने के लिए कई विकल्प तलाशे, लेकिन अब तक किसी एक एजेंसी पर सहमति नहीं बन पाई है। मप्र लोक सेवा आयोग, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी, कर्मचारी चयन मंडल और गेट जैसे विकल्प सामने आए, यहां तक कि विज्ञापन तक जारी हुआ, लेकिन अंतिम निर्णय लंबित है। भर्ती नियम-2004 में बदलाव न होने से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही।
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संस्थानों में स्टाफ का गंभीर अभाव
प्रदेश के पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में 50 प्रतिशत से ज्यादा शैक्षणिक पद खाली हैं। उच्च पदों की स्थिति और भी खराब है, जहां प्राचार्य और विभागाध्यक्ष (एचओडी) के करीब 90 फीसदी पद रिक्त हैं। कुल लगभग 3000 पदों में से करीब डेढ़ हजार पद खाली पड़े हैं। 67 पॉलिटेक्निक कॉलेजों में सिर्फ 4 नियमित प्राचार्य हैं। 324 एचओडी पदों में केवल 45 कार्यरत हैं। लाइब्रेरियन के लगभग सभी पद खाली हैं, जबकि पीटीआई, टीपीओ और वर्कशॉप सुपरिटेंडेंट के दर्जनों पद भी खाली पड़े हैं।
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गेस्ट फैकल्टी के भरोसे सिस्टम
स्थायी भर्ती नहीं होने से कॉलेजों का संचालन बड़ी संख्या में गेस्ट फैकल्टी के भरोसे चल रहा है। प्रदेशभर में करीब 1200 गेस्ट फैकल्टी कार्यरत हैं। इनमें से कुछ ने भर्ती प्रक्रिया के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है, जिससे मामला और उलझ गया है।

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भर्ती अटकी, योजनाएं भी ठहरीं
पिछले कई वर्षों से सरकार स्तर पर संस्थानों को सोसायटी से निकालकर शासन में शामिल करने की कोशिशें होती रहीं, लेकिन यह प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो सकी। अलग-अलग समय में मंत्रियों ने पहल की, लेकिन मामला अब तक अधूरा है। वहीं, सामान्य प्रशासन विभाग ने कैडर मैनेजमेंट को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसके अनुसार 2027 तक खाली पदों के बड़े हिस्से को भरने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह लक्ष्य  चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है।

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पढ़ाई और करियर पर सीधा असर
शिक्षकों की कमी का असर सीधे छात्रों पर पड़ रहा है। नियमित फैकल्टी के अभाव में रिसर्च, लैब वर्क और प्रैक्टिकल पढ़ाई प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही प्लेसमेंट और स्किल डेवलपमेंट के अवसर भी कमजोर पड़ रहे हैं, जिससे छात्रों का भविष्य दांव पर लग रहा है। आखिरी बार वर्ष 2017 में व्याख्याता और सहायक प्राध्यापक स्तर पर भर्ती हुई थी। इसके बाद से नई नियमित नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं, जिससे संस्थानों में पदों का बैकलॉग लगातार बढ़ता जा रहा है।:
 
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