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ईरान-अमेरिका जंग का असर: प्रदेश से चावल, टेक्सटाइल, केले और दवाइयों के करोड़ों के निर्यात पर संकट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Sat, 14 Mar 2026 12:56 PM IST
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सार
ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब मध्य प्रदेश के निर्यात कारोबार पर भी दिखाई देने लगा है। समुद्री मार्गों में अनिश्चितता के कारण चावल, केला, टेक्सटाइल और फार्मा उत्पादों की शिपमेंट प्रभावित हो रही है, जिससे कारोबारियों और किसानों की चिंता बढ़ गई है।
ईरान इजरायल युद्ध का मध्यप्रदेश पर हुआ असर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ईरान-अमेरिका की जंग से खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर अब प्रदेश के निर्यात कारोबार पर भी दिखाई देने लगा है। समुद्री मार्गों में अनिश्चितता और सुरक्षा चिंताओं के कारण राज्य से चावल, टेक्सटाइल और फार्मा उत्पादों की शिपमेंट प्रभावित हो रही है। इसके चलते माल भेजने में देरी, मालभाड़ा बढ़ने और कीमतों में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। जानकारी के अनुसार इन परिस्थितियों के कारण मध्य प्रदेश से मध्य पूर्वी देशों को भेजे जाने वाले करीब 782 करोड़ रुपये के निर्यात पर असर पड़ा है। व्यापारियों और निर्यातकों का कहना है कि लाल सागर क्षेत्र में अस्थिरता के कारण समुद्री परिवहन प्रभावित हो रहा है, जिससे सामान की आवाजाही धीमी हो गई है।
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4 लाख टन बासमती चावल फंसा
प्रदेश से अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच बासमती चावल का निर्यात करीब 4,064 करोड़ रुपये का रहा। केवल मार्च 2025 में ही 338 करोड़ रुपये का चावल निर्यात किया गया था, लेकिन हालात बिगड़ने के कारण पिछले एक सप्ताह में बासमती चावल का निर्यात लगभग रुक गया है। अनुमान है कि करीब 4 लाख टन बासमती चावल फिलहाल फंसा हुआ है, जिससे बाजार में कीमतों पर भी दबाव बढ़ गया है। किसानों के अनुसार पिछले सप्ताह तक जो चावल 4,400 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, उसकी कीमत घटकर करीब 4,000 रुपये प्रति क्विंटल रह गई है। यानी बाजार में करीब 10 से 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। ऑल इंडिया एक्सपोर्ट एसोसिएशन के सदस्य सचिन वर्मा ने बताया कि इस युद्ध के कारण बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय हालातों के चलते बासमती चावल के निर्यात पर टैक्स बढ़ गया है।शिपिंग लागत भी कई गुना बढ़ चुकी है। निर्यातक के ऊपर अतिरिक्त शुल्क का दबाव बढ़ रहा है। कई निर्यातकों ने फिलहाल माल भेजना रोक दिया है, क्योंकि रास्ते में माल फंसने से भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है।
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बड़वानी का केला निर्यात प्रभावित
बड़वानी का केला अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में जाना जाता है। यहां से हर साल बड़ी मात्रा में केला ईरान, इराक, इस्राइल, बहरीन, तुर्की और दुबई समेत कई मध्य-पूर्वी देशों में निर्यात होता रहा है। नर्मदा नदी के किनारे की उपजाऊ जमीन और पर्याप्त सिंचाई के कारण यहां के केले का स्वाद और आकार खास माना जाता है। हालांकि हालिया अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर अब किसानों की आमदनी पर भी दिखाई देने लगा है। निर्यातकों के अनुसार बंदरगाहों पर माल अटकने और मांग घटने से कीमतों में तेज गिरावट आई है। पहले जहां केले का भाव 2000 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रहा था, वहीं, अब यह घटकर करीब 1200 से 1300 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। निर्यातक संतोष लछेटा के अनुसार बड़वानी से केले का निर्यात वर्ष 2016 से शुरू हुआ था । पिछले साल करीब 1.6 लाख टन केला विदेश भेजा गया था। इस साल जिले में करीब ढाई से तीन करोड़ केले के पौधे लगाए गए हैं, लेकिन बाजार की सुस्ती से किसान चिंतित हैं।
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टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर पर भी असर
राज्य से कपास धागे और टेक्सटाइल का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच टेक्सटाइल निर्यात लगभग 7,940 करोड़ रुपये रहा, जो राज्य के कुल निर्यात का करीब 12 प्रतिशत है। इसी अवधि में रेडीमेड गारमेंट्स का निर्यात करीब 527 करोड़ रुपये रहा। उद्योग संगठनों का कहना है कि समुद्री मार्गों में व्यवधान और शिपमेंट में देरी के कारण कारोबार की गति धीमी पड़ गई है।
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मालभाड़ा बढ़ने से फार्मा निर्यात प्रभावित
दवाइयों और फार्मास्यूटिकल उत्पादों के निर्यात पर भी संकट के संकेत हैं। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच राज्य से फार्मा निर्यात करीब 13,830 करोड़ रुपये का रहा, जो कुल निर्यात का लगभग 21 प्रतिशत है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री मालभाड़ा 60 से 100 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जिससे लॉजिस्टिक लागत में भारी वृद्धि हुई है। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रदेश की फार्मा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा क्षमता में 3 से 5 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका जताई जा रही है।
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4 लाख टन बासमती चावल फंसा
प्रदेश से अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच बासमती चावल का निर्यात करीब 4,064 करोड़ रुपये का रहा। केवल मार्च 2025 में ही 338 करोड़ रुपये का चावल निर्यात किया गया था, लेकिन हालात बिगड़ने के कारण पिछले एक सप्ताह में बासमती चावल का निर्यात लगभग रुक गया है। अनुमान है कि करीब 4 लाख टन बासमती चावल फिलहाल फंसा हुआ है, जिससे बाजार में कीमतों पर भी दबाव बढ़ गया है। किसानों के अनुसार पिछले सप्ताह तक जो चावल 4,400 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, उसकी कीमत घटकर करीब 4,000 रुपये प्रति क्विंटल रह गई है। यानी बाजार में करीब 10 से 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। ऑल इंडिया एक्सपोर्ट एसोसिएशन के सदस्य सचिन वर्मा ने बताया कि इस युद्ध के कारण बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय हालातों के चलते बासमती चावल के निर्यात पर टैक्स बढ़ गया है।शिपिंग लागत भी कई गुना बढ़ चुकी है। निर्यातक के ऊपर अतिरिक्त शुल्क का दबाव बढ़ रहा है। कई निर्यातकों ने फिलहाल माल भेजना रोक दिया है, क्योंकि रास्ते में माल फंसने से भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है।
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बड़वानी का केला निर्यात प्रभावित
बड़वानी का केला अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में जाना जाता है। यहां से हर साल बड़ी मात्रा में केला ईरान, इराक, इस्राइल, बहरीन, तुर्की और दुबई समेत कई मध्य-पूर्वी देशों में निर्यात होता रहा है। नर्मदा नदी के किनारे की उपजाऊ जमीन और पर्याप्त सिंचाई के कारण यहां के केले का स्वाद और आकार खास माना जाता है। हालांकि हालिया अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर अब किसानों की आमदनी पर भी दिखाई देने लगा है। निर्यातकों के अनुसार बंदरगाहों पर माल अटकने और मांग घटने से कीमतों में तेज गिरावट आई है। पहले जहां केले का भाव 2000 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रहा था, वहीं, अब यह घटकर करीब 1200 से 1300 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। निर्यातक संतोष लछेटा के अनुसार बड़वानी से केले का निर्यात वर्ष 2016 से शुरू हुआ था । पिछले साल करीब 1.6 लाख टन केला विदेश भेजा गया था। इस साल जिले में करीब ढाई से तीन करोड़ केले के पौधे लगाए गए हैं, लेकिन बाजार की सुस्ती से किसान चिंतित हैं।
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टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर पर भी असर
राज्य से कपास धागे और टेक्सटाइल का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच टेक्सटाइल निर्यात लगभग 7,940 करोड़ रुपये रहा, जो राज्य के कुल निर्यात का करीब 12 प्रतिशत है। इसी अवधि में रेडीमेड गारमेंट्स का निर्यात करीब 527 करोड़ रुपये रहा। उद्योग संगठनों का कहना है कि समुद्री मार्गों में व्यवधान और शिपमेंट में देरी के कारण कारोबार की गति धीमी पड़ गई है।
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मालभाड़ा बढ़ने से फार्मा निर्यात प्रभावित
दवाइयों और फार्मास्यूटिकल उत्पादों के निर्यात पर भी संकट के संकेत हैं। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच राज्य से फार्मा निर्यात करीब 13,830 करोड़ रुपये का रहा, जो कुल निर्यात का लगभग 21 प्रतिशत है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री मालभाड़ा 60 से 100 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जिससे लॉजिस्टिक लागत में भारी वृद्धि हुई है। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रदेश की फार्मा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा क्षमता में 3 से 5 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका जताई जा रही है।

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