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राज्यों की देनदारियों में 5% से अधिक हिस्सा एमपी पर:विपक्ष ने उठाए सवाल, सरकार बोली-विकास कार्यों के लिए उधारी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: आनंद पवार Updated Wed, 11 Feb 2026 04:02 PM IST
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सार

मध्य प्रदेश पर राज्यों के कुल कर्ज का 5% से ज्यादा बोझ है और मार्च 2026 तक राज्य का बकाया कर्ज बढ़कर करीब 5.31 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। बीते एक साल में ही लगभग 50 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर बहस तेज कर दी है।

MP accounts for more than 5% of state liabilities: Opposition raises questions, government bids – borrowing fo
कर्ज बड़ी समस्या (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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विस्तार

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार राज्यों के कुल बकाया कर्ज में 5 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मध्य प्रदेश का है। मार्च 2026 तक के बजट अनुमान के आधार पर राज्यों की कुल बकाया देनदारियां लगभग 1,04,27,920.8 करोड़ रुपये आंकी गई हैं, जिनमें मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 5,31,012.8 करोड़ रुपये है। रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक वर्ष में ही राज्य का कर्ज करीब 50 हजार करोड़ रुपये बढ़ा है। एक साल पहले यह आंकड़ा लगभग 4.81 लाख करोड़ रुपये था, जिसके मार्च 2026 तक अनुमानित अब बढ़कर 5.31 लाख करोड़ रुपये से अधिक हाेने का अनुमान है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2007 में मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज करीब 52,731 करोड़ रुपये था। तब से अब तक राज्य की देनदारियां दस गुना से अधिक बढ़ चुकी हैं। इस तेजी से बढ़ते कर्ज ने राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
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राज्यों में 9वें स्थान पर
कुल बकाया देनदारियों के मामले में मध्य प्रदेश देश में नौवें स्थान पर है। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य इससे आगे हैं।

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केंद्र से कर हिस्सेदारी में कमी
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि केंद्रीय करों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 7.85 प्रतिशत से घटकर 7.34 प्रतिशत रह गई है। इससे राज्य को मिलने वाली राशि में कमी आई है, जिससे वित्तीय दबाव और बढ़ा है।

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योजनाओं का बढ़ता बोझ
राज्य सरकार की प्रमुख योजना ‘लाड़ली बहना योजना’ पर हर महीने लगभग 1,850 करोड़ रुपये का व्यय हो रहा है। लाभार्थियों की संख्या और सहायता राशि बढ़ने के कारण यह खर्च और बढ़ने की संभावना है। पहले यह खर्च लगभग 1,540 करोड़ रुपये था, जो बाद में बढ़ गया।

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विकास कार्यों के लिए उधारी
सरकार कहना है कि बढ़ता कर्ज मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों के लिए लिया गया है। सरकार का तर्क है कि विकास परियोजनाओं से भविष्य में आय और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी, जिससे वित्तीय स्थिति संतुलित की जा सकेगी। आरबीआई की रिपोर्ट के बाद राज्य की वित्तीय स्थिति और कर्ज प्रबंधन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। 

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विपक्ष ने साधा निशाना 
उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया पर लिखा कि बजट सत्र से ठीक पहले मध्यप्रदेश सरकार द्वारा एक सप्ताह में दूसरी बार 5,000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया जाना अत्यंत गंभीर विषय है। चालू वित्त वर्ष में अब तक 67,300 करोड़ रुपये की उधारी और 36 बार कर्ज लिया जाना राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। हाल ही में जारी RBI की रिपोर्ट ने भी प्रदेश की वास्तविक आर्थिक तस्वीर उजागर की है  देश के कुल कर्ज का लगभग 5% हिस्सा अकेले मध्यप्रदेश पर है। यह स्थिति चिंताजनक है और सरकार की वित्तीय दिशा पर पुनर्विचार की मांग करती है। सरकार स्पष्ट करे कि इस भारी उधारी का ठोस वित्तीय रोडमैप क्या है?
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