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MP News: क्या छात्र संगठनों के आगे बेबस हो गया विभाग? आंदोलन के बाद BU और RGPV के कुलगुरु को छोड़ना पड़ा पद

Sat, 20 Jun 2026 02:53 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल Published by: Sandeep Kumar Tiwari Updated Sat, 20 Jun 2026 02:53 PM IST
सार

बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय में प्रो. एसके जैन और राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में प्रो. राजीव त्रिपाठी के इस्तीफों ने उच्च शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों मामलों में छात्र आंदोलनों के बाद ही बड़े प्रशासनिक फैसले सामने आए, जिससे विभाग की सक्रियता, निगरानी व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया पर बहस तेज हो गई है।

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MP News: Has the department become helpless before student organizations? Vice-Chancellors of BU and RGPV forc
प्रो. राजीव त्रिपाठी और प्रो.एसके जैन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। प्रदेश के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों में अलग-अलग समय पर हुए घटनाक्रमों ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या विश्वविद्यालयों में बड़े प्रशासनिक फैसले अब केवल छात्र आंदोलनों और बढ़ते दबाव के बाद ही लिए जा रहे हैं। हाल ही में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एसके जैन को पद छोड़ना पड़ा, जबकि इससे पहले नवंबर 2025 में राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजीव त्रिपाठी ने विवादों और छात्र विरोध के बीच इस्तीफा दिया था। दोनों मामलों में एक समानता साफ दिखाई देती है। विश्वविद्यालयों में अनियमितताओं और प्रशासनिक विवादों की शिकायतें पहले से मौजूद थीं, लेकिन निर्णायक कार्रवाई तब सामने आई जब छात्र संगठन मैदान में उतरे और आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया।
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बीयू में आंदोलन के बाद बदले हालात
राजधानी भोपाल स्थित बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय पिछले कई महीनों से विवादों में रहा। विश्वविद्यालय में प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद लगातार आंदोलन कर रही थी। मामला इतना बढ़ गया कि स्वयं उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार को प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचकर चर्चा करनी पड़ी। विद्यार्थी परिषद ने कुलपति प्रोफेसर एसके जैन को हटाने सहित कई मांगों को लेकर लगातार दबाव बनाया। आंदोलन के दौरान राजभवन तक शिकायतें पहुंचीं और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए। बढ़ते विवाद और दबाव के बीच पहले कुलपति को अवकाश पर भेजा गया और बाद में उन्होंने पद छोड़ दिया। इस घटनाक्रम को छात्र संगठन अपनी बड़ी जीत के रूप में देख रहा है।
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आरजीपीवी में नैक ग्रेडिंग विवाद के बाद गया कुलपति का पद
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में नवंबर 2025 में सामने आया घटनाक्रम भी कम चर्चित नहीं रहा। विश्वविद्यालय को नैक से मिली ‘ए प्लस प्लस’ ग्रेडिंग को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्व-अध्ययन रिपोर्ट में भ्रामक और गलत तथ्य प्रस्तुत कर बेहतर ग्रेडिंग हासिल की। विद्यार्थी परिषद ने इसे अकादमिक भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता का मामला बताते हुए विश्वविद्यालय में प्रदर्शन शुरू कर दिया। कार्यकर्ताओं ने कुलपति कार्यालय का घेराव किया और पूरे मामले की जांच तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की। लगातार विरोध और बढ़ते दबाव के बीच कुलपति प्रोफेसर राजीव त्रिपाठी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए राजभवन पहुंचकर राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उस समय विद्यार्थी परिषद ने इसे अपनी बड़ी जीत बताते हुए दावा किया था कि छात्र हितों और शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए चलाया गया आंदोलन सफल रहा।
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दो इस्तीफों ने खड़े किए कई सवाल
लगातार दो बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के पद छोड़ने की घटनाओं ने उच्च शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि शिकायतें और अनियमितताओं के आरोप पहले से मौजूद थे तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय में आंदोलन के बाद मंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा, जबकि राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में छात्र विरोध तेज होने के बाद कुलपति का इस्तीफा सामने आया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग अब केवल तब सक्रिय होता है जब छात्र संगठन सड़कों पर उतरते हैं और मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन जाता है।


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क्या आंदोलनों के बाद ही होगी कार्रवाई?
दोनों विश्वविद्यालयों के घटनाक्रमों ने उच्च शिक्षा विभाग की निर्णय प्रक्रिया पर बहस छेड़ दी है। छात्र संगठनों का दावा है कि यदि वे आंदोलन नहीं करते तो कई मामलों में कार्रवाई ही नहीं होती। वहीं विपक्ष भी इन घटनाओं को विभागीय निगरानी और जवाबदेही की विफलता के रूप में पेश कर रहा है। प्रदेश के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों में हुए इन घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विश्वविद्यालयों में जवाबदेही तय कराने और अनियमितताओं पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए अब छात्र आंदोलनों का दबाव जरूरी हो गया है।


 
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