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Chaitra Navratri 2026: 600 मीटर की ऊंचाई पर बना छठी सदी का मंदिर, यहां से जुड़े रहस्यमयी किस्से करते हैं हैरान

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैहर Published by: मैहर ब्यूरो Updated Thu, 19 Mar 2026 06:01 AM IST
सार

मैहर शारदा देवी मंदिर मध्य प्रदेश के मैहर में त्रिकूट पर्वत पर स्थित है, जहां 1080 सीढ़ियां चढ़कर भक्त दर्शन करते हैं। इसे शक्तिपीठ माना जाता है। आल्हा-ऊदल से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं। नवरात्र में यहां लाखों श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं। 

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A 6th-century temple built at a height of 600 meters in Maihar, learn about its secrets.
मां शारदा का मंदिर मैहर में स्थित है। - फोटो : अमर उजाला
कहते हैं मां हमेशा ऊंचे स्थानों पर विराजमान होती हैं। जिस तरह मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहाड़ों को पार करते हुए भक्त वैष्णो देवी तक पहुंचते हैं। ठीक उसी तरह मध्य प्रदेश के मैहर जिले में भी 1080 सीढ़ियां लांघ कर माता के दर्शन करने जाते हैं। मैहर जिले की मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित माता के इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर कहा जाता है।


मैहर का मतलब है मां का हार, मैहर नगरी से 5 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है। मां शारदा देवी का मंदिर पर्वत की चोटी के मध्य में स्थित है। देश भर में माता शारदा का अकेला मंदिर मैहर में ही है। इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरवी, भगवान, हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, फूलमती माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी की भी पूजा की जाती है।
 
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A 6th-century temple built at a height of 600 meters in Maihar, learn about its secrets.
मैहर का शारदा देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
मंदिर तक जाने के लिए 1080 सीढ़ियां
मैहर में मां शारदा के मंदिर में देश के कोने-कोने से प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। पहाड़ी पर 600 मीटर की ऊंचाई पर मां शारदा का भव्य मंदिर बना हुआ है। मंदिर तक जाने के लिए 1080 सीढ़ियां बनी हुई हैं। साथ में रोपवे से 170 रुपए की टिकट लेकर आने जाने की सुविधा उपलब्ध है। इस मंदिर का अस्तित्व 6वीं शताब्दी से इतिहास में मिलता है। सन 1918 में यह मंदिर छोटा सा था, मंदिर में आने जाने के लिए पहाड़ी में दुर्गम रास्ते का इस्तेमाल होता था। सन 1951 में इस मंदिर में सीढ़ियों का निर्माण हुआ और श्रद्धालु भक्त मां के मंदिर में सीढ़ियों से आने-जाने लगे और भीड़ बढ़ने लगी और धीरे-धीरे चैत्र क्ंवर नवरात्रि मेला लगने लगा। प्रति वर्ष चैत्र क्ंवर नवरात्रि मेले में लाखों श्रद्धालु भक्त मां शारदा के दर्शन के लिए आने लगे।

देश का तीसरा शक्तिपीठ
मां के चरणों में प्रसाद में नारियल, सिंदूर, चुनरी, पान सुपारी, कपूर, चुनरी जैसे शृंगार का समान चढ़ाकर भक्त अपने आप को धन्य मानते हैं। मां के दरबार में आने वाले सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है। किवदंतियों के अनुसार आज भी मां शारदा के परम भक्त आल्हा आज भी मां शारदा के प्रथम दर्शन करते हैं और कमल के ताजे फूल मां के चरणों में चढ़ाते हैं। मैहर मां शारदा का मंदिर देश में प्रसिद्ध है। यह मंदिर तीसरा शक्तिपीठ माना जाता है। मां शारदा के मंदिर में सुबह 4 बजे मां की आरती एवं भजन के बाद भक्तों की कतार में लग कर दर्शन मिलते हैं और भव्य शृंगार किया जाता है। साथ ही मां शारदा को महाभोग भी चढ़ाया जाता है, जिसमें चुनरी, मेवा, पान, सुपारी आदि चढ़ाया जाता है और शाम को 7ः30 बजे आरती एवं भजन होते हैं। उसके बाद मंदिर के पट बंद हो जाते हैं। नवरात्र के पहले दिन मां शारदा का विशेष शृंगार होता है। आरती के पहले मां शारदा का शृंगार किया जाता है। मां की आरती प्रधान पुजारी के द्वारा कराई जाती है। नवरात्र के पहले दिन मां शरदा के दर्शनार्थ सुबह से ही श्रद्धालु लंबी-लंबी कतारों में खड़े रहते हैं और मां शारदा के दर्शन करते हैं।

 
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A 6th-century temple built at a height of 600 meters in Maihar, learn about its secrets.
मैहर माता मंदिर के दर्शन को हजारों लोग पहुंचते हैं। नवरात्र में संख्या लाखों में होती है। - फोटो : अमर उजाला
आल्हा और ऊदल करते हैं सबसे पहले मां के दर्शन
ऐसी मान्यता है कि आल्हा और ऊदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे भी शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। आल्हा और ऊदल ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी। इसके बाद आल्हा ने ही इस मंदिर में 12 साल तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। कहा जाता है कि आल्हा माता को शारदा माई कहकर पुकारा करते थे, जिस वजह से यह मंदिर भी शारदा माई के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और ऊदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है, जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है। यही नहीं, तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा और ऊदल कुश्ती लड़ा करते थे।

 
A 6th-century temple built at a height of 600 meters in Maihar, learn about its secrets.
मैहर में अब मेला भी लगने लगा है। - फोटो : अमर उजाला
मंदिर से जुड़ी है धार्मिक महत्व की कहानी
माना जाता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती शिव से विवाह करना चाहती थी। उनकी यह इच्छा राजा दक्ष को मंजूर नहीं थी। वे शिव को भूतों और अघोरियों का साथी मानते थे। फिर भी सती ने अपनी जि़द पर भगवान शिव से विवाह कर लिया। एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकर जी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती इससे बहुत आहत हुईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से दुखी होकर सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला, तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। उन्होंने यज्ञ कुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और गुस्से में तांडव करने लगे। ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने ही सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित कर दिया। जहां भी सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिवजी को फिर से पति रूप में प्राप्त किया। माना जाता है कि मैहर में मां का हार गिरा था यहां वर्षों से माता के दर्शन के लिए भक्तों का रेला लगा रहता है।

इसके अलावा, ये भी मान्यता है कि यहां पर सर्वप्रथम आदि गुरु शंकराचार्य ने 9वीं-10वीं शताब्दी में पूजा-अर्चना की थी। शारदा देवी का मंदिर सिर्फ आस्था और धर्म के नजरिये से खास नहीं है। इस मंदिर का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है। माता शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 559 में की गई थी। मूर्ति पर देवनागरी लिपि में शिलालेख भी अंकित है। दुनिया के जाने-माने इतिहासकार ए कनिंग्घम ने इस मंदिर पर विस्तार से शोध किया है। 
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