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Mandsaur News: 7 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला, आरोपियों की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंदसौर Published by: मंदसौर ब्यूरो Updated Sat, 08 Feb 2025 09:06 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि आरोपियों का प्रतिनिधित्व उनकी पसंद के वकील द्वारा नहीं किया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के संदर्भ में पर्याप्त अनुभव रखने वाले बचाव पक्ष के वकील को अभियुक्तों का बचाव करने और नए सिरे से मुकदमे में शामिल होने के लिए नियुक्त करने का आदेश दिया है।

The Supreme Court canceled the death sentence of the accused in the case of rape of a 7-year-old girl
पुलिस गिरफ्त में आरोपी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंदसौर में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची से सामूहिक दुष्कर्म करने के मामले में आरोपियों की फांसी की सजा को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि वैज्ञानिक विशेषज्ञों की गवाही/परीक्षण किए बगैर सिर्फ डीएनए रिपोर्ट पर भरोसा करने से न सिर्फ न्याय की विफलता हुई, बल्कि इससे मुकदमे की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई।
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जस्टिस विक्रम नाथ, संजय करोल और संदीप मेहता की पीठ ने आरोपियों को दी गई फांसी की सजा को रद्द करते हुए इस मामले को दोबारा से सुनवाई के लिए निचली /विशेष अदालत में भेज दिया है। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि तथ्यों से जाहिर होता है कि मामले में आरोपियों को अपना बचाव करने का पर्याप्त मौका दिए बगैर 2 माह से भी कम समय में मुकदमे का ट्रायल/सुनवाई पूरा कर लिया गया। पीठ ने कहा है कि इससे जाहिर होता कि मुकदमे की प्रक्रिया में अनुचित जल्दबाजी दिखाई गई। शीर्ष अदालत ने कहा है कि चूंकि मौजूदा मामले में मौत की सजा शामिल है। इसलिए आरोपियों को बचाव करने का उचित मौका देना बहुत जरूरी है और इस मसले पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
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पीठ ने फैसले में कहा है कि हम सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अपीलकर्ताओं को दी गई फांसी की सजा को रद्द करते हैं और इस मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट को वापस भेजा जाता है। पीठ ने विशेष अदालत द्वारा फांसी की सजा देने और बाद में उच्च न्यायालय द्वारा इसे बहाल रखने के फैसले के खिलाफ इरफान उर्फ भय्यू मेवाती और आसिफ मेवाती की ओर से दाखिल अपीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है।

इस मामले को दोबारा ट्रायल का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत को कहा कि डीएनए रिपोर्ट को तैयार करने और इसे जारी करने वाले वैज्ञानिक विशेषज्ञों को संपूर्ण सहायक सामग्री के साथ कोर्ट में गवाही के लिए बुलाया जाए। पीठ ने कहा है कि नामले में संबंधित वैज्ञानिक विशेषज्ञों को गवाही देने और उनसे जिरह के लिए अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष दोनों को उचित अवसर दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि आरोपियों का प्रतिनिधित्व उनकी पसंद के वकील द्वारा नहीं किया जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के संदर्भ में पर्याप्त अनुभव रखने वाले बचाव पक्ष के वकील को अभियुक्तों का बचाव करने और नए सिरे से मुकदमे में शामिल होने के लिए नियुक्त करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञों की गवाही के बाद, आरोपियों से नए साक्ष्य के संदर्भ में सीआरपीसी की धारा 313 के तहत दोबारा से बयान दर्ज किए जाएं। पीठ ने कहा है कि इसके बाद दोनों पक्षों की बहस को सुनने के बाद विशेष अदालत में तथ्यों, साक्ष्यों के आधार पर अपना फैसला करें। पीठ ने निचली अदालत को चार माह के भीतर मामले की दोबारा से सुनवाई पूरी करने को कहा है।

यह है मामला
दरअसल, मंदसौर में 26 जून 2018 को एक महिला ने पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया था कि तीसरी कक्षा में पढऩे वाली उसकी पोती स्कूल से घर नहीं आई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जब क्षेत्र में लगे सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो बच्ची को दो युवक ले जाते हुए दिखे। जिसके बाद अगले दिन लक्ष्मण दरवाजे के समीप झाड़ियों में पुलिस को एक जगह पर बच्ची घायल अवस्था में मिली। इलाज के बाद पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर मामले में इरफान और आसिफ को गिरफ्तार कर दोनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 363, 366ए, 307 और 376 डीबी और यौन उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण के लिए बने कानून पॉक्सो के तहत मुकदमा दर्ज कराया।

इस मामले में विशेष अदालत ने 2 माह से भी कम समय में आरोपियों को दोषी ठहराया। साथ ही आईपीसी की धारा 376 (डीबी) (बारह वर्ष से कम उम्र की बच्ची से सामूहिक बलात्कार के लिए सजा) के तहत अपराध के संबंध में, अपीलकर्ताओं को फांसी की सजा दी थी। उच्च न्यायालय के इंदौर पीठ ने भी अपीलकर्ताओं की सजा की पुष्टि की थी। इसके खिलाफ अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम में अपील दाखिल की थी।
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