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सफलता की नई इबारत: अस्पताल की नौकरी छोड़ युवा किसान ने शुरू की अश्वगंधा की खेती, अब हो रहा लाखों का मुनाफा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर Published by: सागर ब्यूरो Updated Thu, 16 Apr 2026 09:59 AM IST
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सार

देवरी के युवा किसान राहुल लोधी ने नौकरी छोड़ औषधीय खेती अपनाई। अश्वगंधा की खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। 10 एकड़ में उत्पादन कर प्रति एकड़ करीब 1.5 लाख तक लाभ कमा रहे हैं और अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बने हैं।

A young farmer quit his hospital job to start cultivating ashwagandha earning millions in profits
सागर के युवक ने औषधीय खेती अपनाई है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

कहते हैं कि अगर मन में कुछ नया करने का जज्बा हो और सही दिशा में मेहनत की जाए, तो मिट्टी भी सोना उगलने लगती है। इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है देवरी के सुखचैन वार्ड निवासी युवा किसान राहुल लोधी ने। राहुल ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद भोपाल के एलबीएस अस्पताल में जनसंपर्क अधिकारी की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी और औषधीय खेती को अपनाकर आज क्षेत्र के किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं।

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नौकरी छोड़ क्यों चुनी औषधीय खेती?
राहुल बताते हैं कि वे पिछले तीन साल से खेती से जुड़े हैं। उन्होंने देखा कि परंपरागत खेती (गेहूं-चना) में लागत और मेहनत के मुकाबले मुनाफा कम होता जा रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें अश्वगंधा की खेती के लाभ पता चले। उन्होंने महसूस किया कि कई लोग किराए की जमीन लेकर औषधीय फसलों से लाखों कमा रहे हैं, जबकि अपनी निजी भूमि होने के बावजूद कई किसान पिछड़ रहे हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और वापस अपने गृह नगर देवरी आ गए।
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प्रशिक्षण और तकनीकी शुरुआत
खेती को वैज्ञानिक तरीके से करने के लिए राहुल ने राजस्थान के कोटा और जयपुर में जड़ी-बूटियों की खेती का विशेष प्रशिक्षण लिया। वे जयपुर से ही उच्च गुणवत्ता वाले अश्वगंधा के बीज लेकर आए और नवंबर में अपनी 10 एकड़ भूमि पर इसकी बोवनी की। वर्तमान में 5 एकड़ की हार्वेस्टिंग (कटाई) पूरी हो चुकी है और शेष 5 एकड़ का कार्य प्रगति पर है।

मुनाफे का गणित: लागत कम, आय ज्यादा
राहुल के अनुभव के अनुसार, अश्वगंधा की खेती में एक एकड़ का आर्थिक ढांचा बेहद लाभकारी है। इसकी लागत लगभग 30,000 प्रति एकड़ आती है। औसतन 5 से 6 क्विंटल जड़ें (प्रति एकड़) होती है। बाजार में सूखी जड़ें 30,000 प्रति क्विंटल के हिसाब से बिक जाती है। इसका बीज 20,000 प्रति क्विंटल होता है। भूसा 2,000 प्रति क्विंटल बिक जाता है। सभी खर्च काटकर एक एकड़ से लगभग 1.5 लाख तक की बचत की उम्मीद है।

देशभर की मंडियों में भारी मांग
राहुल की फसल की गुणवत्ता इतनी बेहतर है कि नीमच, कोटा और देश के कई बड़े शहरों की आयुर्वेदिक कंपनियों से उनके पास लगातार खरीद के लिए फोन आ रहे हैं। राहुल का कहना है कि देवरी ब्लॉक में उनका यह पहला प्रयास था, जिसमें उन्हें प्रति एकड़ पांच क्विंटल तक का शानदार उत्पादन मिला है।

परंपरागत खेती से बेहतर विकल्प
राहुल लोधी का मानना है कि किसानों को अब परंपरागत फसलों के साथ-साथ औषधीय फसलों की ओर रुख करना चाहिए। उन्होंने बताया कि गेहूं-चना की तुलना में इसमें पानी और देखरेख की जरूरत कम है, जबकि मुनाफा कई गुना अधिक है। उन्होंने 10 एकड़ से शुरुआत इसलिए की ताकि हार्वेस्टिंग और मार्केटिंग की बारीकियों को ठीक से समझ सकें। आज उनकी सफलता देख क्षेत्र के अन्य युवा भी औषधीय खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

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