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14 साल में इस खूबसूरत शहर में 1000 हजार लोगों ने की आत्महत्याएं, पढ़ें चौंकाने वाली ये रिपोर्ट
अमित गुप्ता, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 10 Sep 2018 02:03 PM IST
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chandigarh
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खूबसूरती के लिहाज से देश में कुछ ही चुनिंदा शहर हैं। लेकिन अब इन शहरों से भी लोगों का मोह भंग होता जा रहा है। तभी तो अकेले एक शहर में 14 साल के अंतराल में 1000 लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। आइए पढ़ते हैं ये चौंकाने वाली रिपोर्ट....
Chandigarh
चंडीगढ़ में आत्महत्या का ट्रेंड चौंकाने वाला है। 2004 से 2017 तक एक हजार से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की है। इसमें 58 प्रतिशत से ज्यादा लोग युवा हैं, जो चिंताजनक है। सेक्टर-32 मेडिकल कालेज के मनोचिकित्सा विभाग के विश्लेषण से पता चलता है कि 17 से 30 साल उम्र के करीब 58 प्रतिशत और 17 से 25 साल के करीब 49 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्या की।
विश्लेषण में यह भी देखने को मिला है कि इसमें 60 प्रतिशत पुरुष और 40 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। जीएमसीएच-32 का मनोचिकित्सा विभाग 2003 से आत्महत्या के पैटर्न पर विश्लेषण कर रहा है। इसमें वह आत्महत्या के पैटर्न, उसके कारण और क्या आत्महत्या को रोका जा सकता था, जैसे मुद्दों पर गहन विश्लेषण करता है। आत्महत्या करने का मुख्य कारण तनाव देखने को मिला है। तनाव की वजह एग्जाम में फेल होना, प्रेम प्रसंग में निराशा और पारिवारिक कलह जैसा रहा है।
विश्लेषण में यह भी देखने को मिला है कि इसमें 60 प्रतिशत पुरुष और 40 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। जीएमसीएच-32 का मनोचिकित्सा विभाग 2003 से आत्महत्या के पैटर्न पर विश्लेषण कर रहा है। इसमें वह आत्महत्या के पैटर्न, उसके कारण और क्या आत्महत्या को रोका जा सकता था, जैसे मुद्दों पर गहन विश्लेषण करता है। आत्महत्या करने का मुख्य कारण तनाव देखने को मिला है। तनाव की वजह एग्जाम में फेल होना, प्रेम प्रसंग में निराशा और पारिवारिक कलह जैसा रहा है।
चंडीगढ़
फांसी लगाकर आत्महत्या करना सबसे कॉमन तरीका
मनोचिकित्सक ने पाया कि करीब 68 प्रतिशत लोगों ने फांसी पर लटककर आत्महत्या की, जो 14 साल में हुई आत्महत्या का करीब दो तिहाई है। उसके बाद लोग जहर खाकर आत्महत्या करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक पंखे से लटककर आत्महत्या करना सबसे कॉमन आइडिया रहा है। जो पुरुष हैं, वे आत्महत्या के लिए ज्यादा हिंसात्मक तरीका अपनाते हैं, जैसे कि छत से कूदना, नहर से कूदना, गोली से उड़ाना, नस काटना। पिछले 8 साल में 21 व्यक्तियों ने खुद को गोली से उड़ाया है। इससे यह भी पता चलता है कि यंगस्टर को पिस्तौल आसानी से उपलब्ध होती है। सुखना लेक के सुसाइड प्वाइंट पर भी 21 लोगों ने आत्महत्या की। इसमें 13 पुरुष व 8 महिलाएं हैं।
मनोचिकित्सक ने पाया कि करीब 68 प्रतिशत लोगों ने फांसी पर लटककर आत्महत्या की, जो 14 साल में हुई आत्महत्या का करीब दो तिहाई है। उसके बाद लोग जहर खाकर आत्महत्या करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक पंखे से लटककर आत्महत्या करना सबसे कॉमन आइडिया रहा है। जो पुरुष हैं, वे आत्महत्या के लिए ज्यादा हिंसात्मक तरीका अपनाते हैं, जैसे कि छत से कूदना, नहर से कूदना, गोली से उड़ाना, नस काटना। पिछले 8 साल में 21 व्यक्तियों ने खुद को गोली से उड़ाया है। इससे यह भी पता चलता है कि यंगस्टर को पिस्तौल आसानी से उपलब्ध होती है। सुखना लेक के सुसाइड प्वाइंट पर भी 21 लोगों ने आत्महत्या की। इसमें 13 पुरुष व 8 महिलाएं हैं।
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chandigarh
पंखे के डिजाइन पर बदलाव जरूरी
हर घर में पंखा लगा है। यह आसानी से उपलब्ध है, इसलिए लोग पंखे से लटककर ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। मेडिकल कालेज के डायरेक्टर व मनोचिकित्सा विभाग के एचओडी प्रो. बीएस चवन ने बताया कि पंखे के डिजाइन को बदलने की पूरी संभावना है। इस बारे में सीएसआईओ के वैज्ञानिकों से बातचीत हुई है और वे इस पर काम कर रहे हैं।
हर घर में पंखा लगा है। यह आसानी से उपलब्ध है, इसलिए लोग पंखे से लटककर ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। मेडिकल कालेज के डायरेक्टर व मनोचिकित्सा विभाग के एचओडी प्रो. बीएस चवन ने बताया कि पंखे के डिजाइन को बदलने की पूरी संभावना है। इस बारे में सीएसआईओ के वैज्ञानिकों से बातचीत हुई है और वे इस पर काम कर रहे हैं।
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आत्महत्या को रोका जा सकता है
मेडिकल कालेज के डायरेक्टर व वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. बीएस चवन ने बताया कि आत्महत्या को सौ फीसदी रोका जा सकता है। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान पता चला कि अधिकांश पेरेंट्स ने बताया कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि उनका बच्चा आत्महत्या कर सकता है। हालांकि, तनाव और अजीब व्यवहार के संकेत उन्हें जरूर मिले थे। इसलिए जब भी बच्चे तनाव से गुजरते हैं तो पेरेंट्स को सतर्क हो जाना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा बच्चे से बातचीत करनी चाहिए। मनोचिकित्सक की भी मदद ले सकते हैं।
इसमें मीडिया का भी अहम रोल होता है। आत्महत्या की खबरों को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए। ऐसी खबरों को मुख्य पेज के बजाय अंदर के पेज में लगाना चाहिए। तरीके का उल्लेख करने से बचना चाहिए
मेडिकल कालेज के डायरेक्टर व वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. बीएस चवन ने बताया कि आत्महत्या को सौ फीसदी रोका जा सकता है। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान पता चला कि अधिकांश पेरेंट्स ने बताया कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि उनका बच्चा आत्महत्या कर सकता है। हालांकि, तनाव और अजीब व्यवहार के संकेत उन्हें जरूर मिले थे। इसलिए जब भी बच्चे तनाव से गुजरते हैं तो पेरेंट्स को सतर्क हो जाना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा बच्चे से बातचीत करनी चाहिए। मनोचिकित्सक की भी मदद ले सकते हैं।
इसमें मीडिया का भी अहम रोल होता है। आत्महत्या की खबरों को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए। ऐसी खबरों को मुख्य पेज के बजाय अंदर के पेज में लगाना चाहिए। तरीके का उल्लेख करने से बचना चाहिए