सिख धर्म में लंगर का विशेष महत्व है। सभी गुरुद्वारों में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए लंगर का विशेष इंतजाम किया जाता है लेकिन चंडीगढ़ में एक ऐसा गुरुद्वारा है जहां लंगर नहीं बनता। इसके बावजूद संगत लंगर छकती है और यहां से कोई भूख नहीं जाता।
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एक ऐसा गुरुद्वारा, जहां कभी नहीं बनता लंगर, फिर भी भूखी नहीं रहती संगत
Tue, 19 Jan 2021 12:04 PM IST
निवेदिता वर्मा
नीरज कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
नीरज कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Tue, 19 Jan 2021 12:04 PM IST
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चंडीगढ़ के गुरुद्वारा नानकसर साहिब में लंगर नहीं बनता।
- फोटो : अमर उजाला
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गुरुद्वारा साहिब में लंगर छकती संगत।
- फोटो : अमर उजाला
चंडीगढ़ के सेक्टर 28 गुरुद्वारा नानकसर साहिब स्थित है। इस गुरुघर की खासियत यह है कि यहां न तो लंगर बनता है, न कोई गोलक है, फिर भी यहां से कोई भूखा नहीं जाता। इस गुरुद्वारा साहिब की कोई कमेटी तक नहीं है लेकिन लंगर और पंगत की व्यवस्था बदस्तूर जारी है। सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व की तैयारियों में संगत जुटी है।
गुरुद्वारा साहिब में पहुंचा खाना।
- फोटो : अमर उजाला
इस गुरुद्वारे में संगत अपने घर से लंगर लेकर आती है। देसी घी के परांठे, मक्खन, कई प्रकार की सब्जियां, दाल, मिठाई और फल संगत के लिए उपलब्ध रहते हैं। लंगर में बचने वाला खाना सेक्टर 16 और 32 के अस्पताल के अलावा पीजीआई में भेज दिया जाता है ताकि वहां भी लोग लंगर का प्रसाद ग्रहण कर सकें। इस गुरुद्वारा साहिब का हेडक्वार्टर नानकसर कलेरा है, जो पंजाब के लुधियाना के पास पड़ता है। यहां साल में दो बार अमृत छकाया जाता है। नानकसर गुरुघरों की लंबी श्रृंखला है। चंडीगढ़, हरियाणा, देहरादून के अलावा आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड आदि देशों में करीब 170 से भी ज्यादा गुरुद्वारे हैं।
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गुरुद्वारा नानकसर साहिब।
- फोटो : अमर उजाला
पचास साल पहले हुआ था निर्माण
गुरुद्वारा नानकसर के इंचार्ज बाबा गुरदेव सिंह बताते हैं कि गुरुद्वारा नानकसर का निर्माण हुए पचास से अधिक वर्ष हो गए। पौने दो एकड़ क्षेत्र में फैले इस गुरुद्वारे में पुस्कालय भी है। हर वर्ष मार्च में वार्षिक समागम होता है, जो सात दिन चलता है। बड़ी संख्या में संगत इस समागम में शामिल होने देश विदेश से आती है। इस दौरान एक विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन होता है।
गुरुद्वारा नानकसर के इंचार्ज बाबा गुरदेव सिंह बताते हैं कि गुरुद्वारा नानकसर का निर्माण हुए पचास से अधिक वर्ष हो गए। पौने दो एकड़ क्षेत्र में फैले इस गुरुद्वारे में पुस्कालय भी है। हर वर्ष मार्च में वार्षिक समागम होता है, जो सात दिन चलता है। बड़ी संख्या में संगत इस समागम में शामिल होने देश विदेश से आती है। इस दौरान एक विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन होता है।
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चंडीगढ़ का गुरुद्वारा नानकसर साहिब।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
लंगर के लिए दो महीने से भी अधिक का लंबा इंतजार
गुरुद्वारा के सेवादार प्रिंसिपल गुरचरण सिंह ने बताया कि संगत सेवा के लिए अपनी बारी का इंतजार करती है। गुरुद्वारे में तीनों वक्त लंगर लगता है। लोग अपने घरों से लाते हैं। किसी को लगाना हो तो उन्हें कम से कम 2 महीने का इंतजार करना होता है। कोई सुबह तो कोई शाम और कोई रात का लंगर लगाता है। हर वक्त अखंड पाठ चलता रहता है। सुबह सात बजे से नौ बजे तक और शाम पांच बजे से रात नौ बजे तक कीर्तन का आयोजन होता है। हर महीने अमावस्या के दिन दीवान सजता है।
गुरुद्वारा के सेवादार प्रिंसिपल गुरचरण सिंह ने बताया कि संगत सेवा के लिए अपनी बारी का इंतजार करती है। गुरुद्वारे में तीनों वक्त लंगर लगता है। लोग अपने घरों से लाते हैं। किसी को लगाना हो तो उन्हें कम से कम 2 महीने का इंतजार करना होता है। कोई सुबह तो कोई शाम और कोई रात का लंगर लगाता है। हर वक्त अखंड पाठ चलता रहता है। सुबह सात बजे से नौ बजे तक और शाम पांच बजे से रात नौ बजे तक कीर्तन का आयोजन होता है। हर महीने अमावस्या के दिन दीवान सजता है।