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50 की उम्र में 'प्रेग्नेंट' हुईं इस एक्ट्रेस ने निकाला गुस्सा, बोलीं- 'पैसे ने सब खत्म कर दिया'

Thu, 22 Nov 2018 02:30 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 22 Nov 2018 02:30 PM IST
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badhai ho actress neena gupta on box office and writers
Badhaai Ho

नीना गुप्ता हिंदी फिल्मों के इतिहास की संभवत: पहली और आखिरी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने संस्कृत में एम.ए, एम.फिल की पढ़ाई की। वह रंगमंच से सिनेमा में आईं और खूब साहित्य पढ़ा। बधाई हो के लिए इन दिनों वह सुर्खियों में हैं। 60 के करीब उम्र में भी उन्हें अपने लिए बेहतरीन भूमिकाओं की तलाश है...

badhai ho actress neena gupta on box office and writers
Badhaai Ho

फिल्म बधाई हो से बॉलीवुड में जबरदस्त वापसी करने वालीं अभिनेत्री नीना गुप्ता इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं। 50 पार की उम्र में गर्भवती की भूमिका निभाने वालीं नीना के रोल की सराहना तो हो ही रही है, फिल्म के बारे में भी बॉलीवुड के दिग्गज मान रहे हैं कि इसे खूब जमा कर लिखा गया है। फिल्म के निर्देशक अमित शर्मा बता चुके हैं कि उन्होंने अपने राइटरों की टीम के साथ मिलकर करीब डेढ़ साल में इसे लिखा। इस बात की इंडस्ट्री में खूब चर्चा हो रही है। 

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neena gupta

एक दौर में हिंदी फिल्मों में साहित्य रचने वाले लेखक जुड़ा करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। खूब फिल्में बन रही हैं परंतु ज्यादातर खराब स्क्रिप्ट की वजह से वहीं बैठ जाती हैं। आखिर क्या हुआ फिल्मी दुनिया के राइटरों को? अमर उजाला से विशेष बातचीत में नीना ने कहा, ‘मनोरंजन की दुनिया के राइटरों को टीवी ने मार दिया। टीवी में आपको धड़ाधड़ लिखना पड़ता है। पैसा आता है। मुझे लगता है कि गंभीर विचारों वाली राइटिंग अब खत्म हो चुकी है। कोई राइटर अगर एक बार टीवी पर लिखने लगे तो समझिए कि वह खत्म हो गया।’ 

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Neena Gupta

यह पूछने पर कि दूरदर्शन के दौर में टीवी पर भी अच्छे लेखक थे और संवेदनशील-तार्किक-मनोरंजनक चीजें लिखी जाती थीं। अच्छे सीरियल भी आते थे। इस पर उन्होंने कहा- 'मैं उस दौर में काम कर रही थी और तब सीरियल साप्ताहिक हुआ करते थे। अब तो डेली सोप हो गए हैं। यह किसी पागलपन की तरह है।' नीना गुप्ता कहती हैं कि वह समझ नहीं पाती हैं कि हिंदी में लिखने वाले लेखक/साहित्यकार ज्यादातर मनोरंजक चीजों के लेखन से दूर क्यों रहते हैं? वह मानती हैं कि हिंदी का थियेटर भी कमजोर है। इसके पास दर्शक भी नहीं हैं। जबकि गुजराती-मराठी में दर्शक भी हैं और यहां का रंगमंच भी समृद्ध है। अच्छे-अच्छे नाटक हैं। हिंदी अच्छे नाटकों का अकाल है। 

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neena gupta

नीना गुप्ता ने ने कहा कि हिंदी में नए अच्छे नाटक आए ही नहीं। पुरानी चीजें ही बार-बार दोहराई जाती हैं। अभी तक लोग मोहन राकेश के नाटक ही किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूरा समाज ईजी-मनी की तरफ जा रहा है। सबको जल्दी-जल्दी पैसा कमाना है। अत: लेखक भी वैसा ही कर रहे हैं। नीना बताती हैं कि 'बीए में मैंने पास कोर्स किया था। उस वक्त एक विषय संस्कृत था। वह इसलिए लिया था कि उसमें नंबर अच्छे आते हैं। तब मैं हॉकी खेला करती थी। कॉलेज पॉलिटक्स में भी थी तो लगता था कि एक आसान विषय ले लो। मेरे विषय थे राजनीति शास्त्र, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी मेरे विषय थे। फिर मुझे संस्कृत में मजा आने लगा। कालिदास में मजा आने लगा।' 

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