हिंदी सिनेमा वैसे तो हर साल सैकड़ों किस्से परदे पर पेश करता है लेकिन इसके अपने किस्से भी कभी कभी किसी फिल्मी कहानी जैसे हो जाते हैं। ये किस्सा ऐसा है जो 20 साल पहले सामने आया तो इसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को ही नहीं बल्कि पूरे देश दुनिया को हिलाकर रख दिया। अपने जमाने की एक बेहद खूबसूरत हसीना अपने बंगले में बेजान पाई गई। पुलिस ने जांचा परखा तो मामला मर्डर का निकला। तफ्तीश हुई, मुकदमा चला, जिरह हुई और फिर हुई उम्रकैद ऐसे चार लोगों को जिनमें दो पर इन मोहतरमा की देखरेख की जिम्मेदारी थी और दो को कायदे से इन्हें कहना चाहिए था, मां!
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हीर-रांझा, हंसते जख्म जैसी सुपर डुपर हिट फिल्मों की हीरोइन रहीं प्रिया राजवंश का करियर भले ही छोटा रहा हो, लेकिन उनकी जिंदगी बहुत उतार-चढ़ावों से गुजरी। अंग्रेजों के जमाने में पैदा हुईं। 10 साल की उम्र में बंटवारा झेलना पड़ा। जिस बंदे से मोहब्बत की पूरी जिंदगी सिर्फ उसी की फिल्मों में काम किया। राज कुमार, बलराज साहनी, नवीन निश्चल, धर्मेंद्र, जैकी श्रॉफ जैसे सितारों की मौजूदगी को कैमरे के सामने बस अपनी एक अदा से फीका कर देने वाली प्रिया राजवंश की जिंदगी यूं लगता है कि जैसे किसी जासूसी उपन्यास का किस्सा है।
प्रिया राजवंश का जन्म आज के पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झेलम में हुआ। घर वालों ने नाम रखा वीरा सुंदर सिंह। जैसा कि उस दौर का चलन था हर डायरेक्टर अपने हीरो या हीरोइन को एक नया नाम देने को ही अपनी मठाधीशी का चमत्कार मानता था तो वीरा सुंदर सिंह बन गईं प्रिया राजवंश। नाम उनको ये दिया मशहूर निर्माता निर्देशक चेतन आनंद ने जिनका उन दिनों हिंदी फिल्मों में अलग ही रूतबा था। उनकी फिल्म नीचा नगर आजादी से साल भर पहले ही कान फिल्म फेस्टिवल का सबसे बड़ा पुरस्कार यानी पाम डिओर यानी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब जीत चुकी थी।
हीरोइनें उन दिनों चेतन आनंद आगे पीछे मधुमक्खियों की तरह घूमती थी और वह फिदा हो गए अपनी प्रिया पर। नाम भी शायद उनको ये इसीलिए पसंद आया। प्रिया को भी सिनेमा में एक ढंग का मुकाम चाहिए था। अतीत तब तक उनका उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से तबाह कर चुका था। वह बचपन से कलाकार बनना चाहती थीं और जब चेतन आनंद जैसा फिल्मकार उन पर रीझा तो उन्हें लगा कि अब जाकर किस्मत उनके दरवाजे पहुंची है।
वीरा सुंदर सिंह के चेतन आनंद तक पहुंचने का किस्सा भी काफी फिल्मी है। वीरा के पिता पिता सुंदर सिंह जंगलों के बड़े अफसर थे। बंटवारा हुआ तो वह किसी तरह परिवार लेकर शिमला आ बसे। नौ साल की थी वीरा जब उसने अपने स्कूल में एक अंग्रेजी नाटक 'वर्ल्ड विदाउट मेन' में एक्टिंग का अवार्ड जीता। स्कूल से कॉलेज पहुंची और एक्टिंग के इसी शौक ने एक दिन उनकी मुलाकात करा दी मशहूर अभिनेता बलराज साहनी से।
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