ओटीटी के आगमन के बाद जिन चंद सितारों के करियर को एक नया जीवनदान मिला है, उसमें अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके अभिनेता मनोज बाजपेयी का नाम भी शामिल है। अपनी सीरीज ‘द फैमिली मैन’ के दो सीजन के बाद ओटीटी के शीर्षस्थ अभिनेताओं में शुमार हो चुके मनोज बाजपेयी इन दिनों इस माध्यम के सबसे महंगे सितारों में से भी एक हैं। हालांकि बड़े परदे पर उनका करियर पिछले पांच साल की फिल्मों के हिसाब से देखा जाए तो करीब करीब हाशिये पर ही पहुंच चुका था। लेकिन, अब वह नए जोश में हैं और कहते हैं कि एक दिन अपनी पूरी राम कहानी अपनी आत्मकथा में भी लिख सकते हैं।
तीन नेशनल फिल्म अवार्ड जीत चुके अभिनेता मनोज बाजपेयी बोले, जब आत्मकथा लिखूंगा तो सब लिखूंगा
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साल 2018 मनोज बाजपेयी के लिए मिला जुला रहा। जहां निर्देशक नीरज पांडे की चर्चित फिल्म ‘अय्यारी’ के फ्लॉप हो जाने से उनकी ब्रांडिग को काफी नुकसान हुआ वहीं, ‘बागी 2’ और ‘सत्यमेव जयते’ में उन्हें लोगों ने काफी पसंद किया। इसी साल बनी फिल्म ‘भोसले’ ने उन्हें तीसरा नेशनल फिल्म अवार्ड दिलाया।
मनोज बाजपेयी मानते भी हैं कि उनकी यात्रा फूलों की सेज कभी नहीं रही। लोग उनके बारे में सिर्फ उतना जान पाते हैं जितना वह एक छोटे से इंटरव्यू में बता पाते हैं। मनोज कहते हैं, “किसी दिन मैं अपनी आत्मकथा लिखूंगा तब सबको सब पता चलेगा कि ये यात्रा कैसी रही। मैंने अपने करियर में बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं। और, जहां अब मैं हूं वहां आना मेरे जैसे बिना फिल्म बैकग्राउंड के कलाकार के लिए आसान नहीं रहा।”
साल 2019 में मनोज बाजपेयी दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ फिल्म ‘सोनचिड़िया’ में दिखे और उसके बाद उनकी तीन लगातार फिल्में और ‘मिसेज सीरियल किलर’, ‘सूरज पे मंगल भारी’ और ‘साइलेंस’ दर्शकों को लुभा पाने में नाकाम रहीं। उनकी एक और फिल्म ‘डायल 100’ सीधे ओटीटी पर रिलीज हो रही है। इस फिल्म को लेकर मनोज काफी आशावान हैं और कहते हैं, “बीते समय को बीता हुआ मानकर ही आगे बढ़ जाना चाहिए। आज फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है। यहां आत्म-सम्मान और विश्वास के साथ ऊपर आने की कोशिश करने वालों के दुश्मन बहुत होते हैं। मुझे खुद को दूसरों के हिसाब से ढालने में मुश्किल होती है क्योंकि मेरा पालन पोषण ही ऐसा हुआ है कि मैं आत्मसम्मान से समझौता नहीं कर सकता।"
ये पूछे जाने पर कि नए दौर के राजकुमार राव जैसे अभिनेता जब उन्हें अपना आदर्श बताते हैं और उनकी फिल्मे देखकर कथानक आधारित सिनेमा में किस्मत आजमाने आते हैं तो कैसा लगता है? मनोज बाजपेयी कहते हैं, “अभिनय में किसी और को देखकर आना तो ठीक है लेकिन यहां सिर्फ हौसला ही काम नहीं आता। अभिनय एक तपस्या है। मुझे ढाई दशक से ज्यादा हो गए हैं, यहां मेहनत करते हुए और अब भी मेरा संघर्ष जारी ही है। यहां तमाम तरह के संघर्ष हैं, काम पाने का संघर्ष तो है ही इसके अलावा संघर्ष अपने काम को लोगों तक पहुंचाने का, सही लोगों के बीच आपकी बात सही तरह से सुने जाने का संघर्ष भी चलता रहता है। मैं कह सकता हूं कि आज जहां मैं हूं, वह स्थान मैंने बहुत संघर्षों से पाया है और अब संघर्ष इस स्थान को बनाए रखने का भी जारी ही है।”