'टुकड़े टुकड़े दिन बीता, धज्जी धज्जी रात मिली, जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौगात मिली।' यह फलसफा दिग्गज अभिनेत्री मीना कुमारी की उन्हीं की जुबानी है। सिनेमा जगत में ट्रेजडी क्वीन के नाम से मशहूर मीना जिंदगी भर सच्चे प्यार के लिए तरसती रहीं। मीना को पैदा होते ही पिता का पत्थरदिल रवैया, करियर के मुकाम पर महबूब की बेवफाई और पति की अग्निपरीक्षा नसीब हुई। पुरुष के प्रत्येक रूप ने उनके दिल को तार तार ही किया। अपने इस दर्द के बारे में खुद मीना कुमारी भी लिखती हैं, 'न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन, बड़े करीब से उठकर चला गया कोई।'
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अनाथालय में गूंजी पहली किलकारी
मीना कुमारी के पिता घर में एक बेटा चाहते थे। इस वजह से जब मीना का जन्म हुआ तो उनके पिता को यह बात बिल्कुल भी रास नहीं आई। मीना के जन्म के ठीक बाद उनके पिता उन्हें अनाथालय छोड़ आए थे। लेकिन औलाद से बिछड़कर मीना की मां का रो रोकर बुरा हाल हो गया था। जिसके बाद मीना के पिता उन्हें वापस ले आए।
बाल कलाकार के तौर पर शुरू किया करियर
मीना कुमारी के परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी। घर की सहायता करने के लिए मीना ने बचपन से ही काम करना शुरू कर दिया था। छह साल की उम्र से ही उन्होंने साल 1939 में विजय भट्ट की फिल्म लेदरफेस में पहली बार काम किया। इस फिल्म में उन्होंने महजबीं का किरदार निभाया। यह मीना कुमारी का असल नाम भी था। इसके अलावा उन्होंने तमाम टीवी शोज में काम किया जिनमें धार्मिक शोज भी शुमार थे। इन शोज में उन्होंने देवी के किरदार निभाए।
100 हफ्तों तक लगी थियेटर में फिल्म
साल 1952 में रिलीज हुई फिल्म बैजू बावरा से मीना कुमारी को असल शोहरत प्राप्त हुई। यह फिल्म लोगों को इतनी पंसद आई थी कि 100 हफ्तों तक थियेटर में लगी रही। 1954 में उन्होंने पहले फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार प्राप्त किया। इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली वह पहली अभिनेत्री थीं।
दिल के करीब रहा रंग सफेद
मीना कुमारी के बारे में एक बात कही जाती है कि उन्हें सफेद रंग बेहद पसंद था। तकरीबन सभी तरह के कार्यक्रमों में वह सफेद रंग के कपड़ों में ही नजर आती थीं। इसके साथ ही उन्हें पार्टियों में जाना बिल्कुल भी पंसद नहीं था। मीना का कहना था कि ऐसी पार्टियों में उनका मन नहीं लगता था और उन्हें बोरियत महसूस होती है।
कम ही दिखा फिल्मों में बायां हाथ
मीना कुमारी की फिल्मों में उनका दृश्य ध्यान से देखा जाए ते यह मालूम पड़ता है कि वह अक्सर अपना बायां हाथा छुपाया करती थीं। दरअसल मीना कुमारी के इस हाथ की छोटी उंगली किसी वजह से कट गई थी इस वजह से शूट के दौरान वह अक्सर यह उंगली छुपा लिया करती थीं। मीना इतनी सफाई से ये करती थीं कि लोग पकड़ ही नहीं पाते थे।
कमाल अमरोही से शादी
साल 1951 में फिल्म तमाशा के सेट पर मीना कुमारी की मुलाकात उस दौर के मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही से हुई थी। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के करीब आते गए और एक साल के भीतर भीतर निकाह कर लिया। यह कमाल अमरोही की तीसरी शादी थी। हालांकि 12 साल के भीतर ही दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। एक रोज दोनों के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और कमाल ने मीना को तीन तलाक दे दिया।
निजी जिंदगी पर बनी फिल्म निकाह
मीना कुमारी से तलाक के बाद कमाल को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह मीना को दोबारा हासिल करना चाहते थे। लेकिन इस्लामिक धर्म के अनुसार यह केवल हलाला के बाद ही मुमकिन था। कमाल ने अपने दोस्त और जीनत अमान के पिता अमानउल्लाह खान के साथ उनका हलाला करवाया और एक महीने बाद उनका दोबारा मीना कुमारी से निकाह हुआ। हालांकि मीना कुमारी हलाला के बाद पूरी तरह से टूट गई थीं। इस बारे में मीना कुमारी ने लिखा भी था, 'धर्म के नाम पर मुझे दूसरे मर्द को सौंपा गया तो मुझमें और वेश्या में क्या फर्क रह गया।' मशहूर निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा ने साल 1982 में इस वाकये पर फिल्म बनाई, निकाह।
धर्मेंद्र से प्यार के चर्चे
मीना कुमारी की धर्मेंद्र से पहली मुलाकात साल 1964 में फिल्म मैं भी लड़की हूं से हुई। उस दौरान दोनों ही शादीशुदा थे लेकिन मीना, धर्मेंद्र के प्यार में पड़ गईं। उस समय तो ऐसी चर्चा भी रही कि धर्मेंद्र के कारण ही मीना कुमारी का अपने पति, निर्देशक कमाल अमरोही से तलाक हो गया। लेकिन धर्मेंद्र को मीना कुमारी से कोई प्यार नहीं था बल्कि उन्होंने मीना का इस्तेमाल फिल्म इंडस्ट्री में अपने कदम जमाने के लिए किया था।