बिंदास अदाकारा नीना गुप्ता देश की महिलाओं को व्यस्त रहने की सलाह देती हैं। हिंदी सिनेमा के लोगों में वह हॉलीवुड जैसा अनुशासन देखना चाहती हैं। नए साल की शुरूआत फिल्म 'पंगा' से करने के बाद वह जल्द रिलीज हो रही फिल्म 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' में एक खास किरदार में नजर आएंगी।
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60 साल की उम्र में आप 20 साल की उम्र जितनी फिल्में कर रही हैं। इसमें सिनेमा में बदलाव का कितना योगदान है?
व्यस्त रहना अच्छी बात है। व्यस्त रहने से जीवन की तकलीफें खत्म हो जाती हैं। वेब सीरीज और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के आने से अच्छी सामग्री वाली चीजें लोग बना रहे हैं। एक समय मुझे लगता था कि अच्छे लेखक ही नहीं बचे लेकिन अब एक साथ बहुत सी अच्छी कहानियां सामने आने लगी हैं। समय बदल गया है। यह हिंदी सिनेमा का सुनहरा समय चल रहा है।
आपका हॉलीवुड से भी करीब का नाता रहा है। ऐसी कौन सी आदतें हैं जो हिंदी सिनेमा को हॉलीवुड से सीखनी चाहिए?
सबसे पहले तो अनुशासन। वहां लोग समय के बहुत पाबंद होते हैं। अगर 7 बजे की शिफ्ट है तो सभी कलाकार 7 बजे सेट पर आ जाएंगे। यहां की तरह नहीं है कि दो घंटे, तीन घंटे लेट हो गए तो भी कोई बात नहीं। दूसरा, सफाई। हमारे यहां के सेट बहुत गंदे रहते हैं और खाने के बाद तो पूछो ही मत।
आपने टीवी सीरियल 'सांस' को लिखा, निर्देशित भी किया, फिर लिखाई व निर्देशन का काम आगे क्यों नहीं जारी रखा?
मुझे नहीं लगता कि मैं लिखने में बहुत अच्छी थी। उस सीरीज में मेरे साथ एक लेखकों की टीम ने काम किया था तब जाकर उस सीरीज ने अच्छा प्रदर्शन किया। मैं अकेले कुछ नहीं कर सकती थी। मैंने हमेशा से अभिनय का ही आनंद लिया है और मैं वही करते रहना चाहती हूं।
आप फिल्म 'भगवद्गीता' में द्रौपदी का किरदार निभा चुकी हैं। दीपिका पादुकोण भी बहुत जल्द द्रौपदी का किरदार निभाने वाली हैं। आप उन्हें क्या सलाह या सीख देना चाहेंगी?
(हंसते हुए) नहीं, नहीं, नहीं! बिल्कुल नहीं। मैं उस फिल्म का अपना अनुभव किसी को नहीं दे सकती। द्रौपदी का वह किरदार एकदम अलग था। वह फिल्म सिर्फ 10 लाख रुपये में बनी थी। उसको फिल्माने के लिए हम बर्फ में गए थे। शिफॉन की साड़ी पहनाकर मुझे एक साइड में खड़ा कर देते थे और ठंड से मेरे पूरे पैर नीले पड़ जाते थे।