रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘रण’ में समाचार वाचक की छोटी सी भूमिका से बड़े पर्दे पर अपना करियर शुरू करने वाले राजकुमार राव को हिंदी सिनेमा में 10 साल पूरे हो गए हैं। वह लीक से इतर कहानियों वाली फिल्मों के पहले पोस्टर ब्वॉय हैं। उनसे ये मुलाकात की पंकज शुक्ल ने।
EXCLUSIVE: ओटीटी की बढ़ती ताकत पर बोले राजकुमार राव, ‘अब निर्माता पर मुनाफे का तनाव नहीं है’
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साल 2020 में आपकी नई ‘छलांग’ ओटीटी पर है। निर्देशक हंसल मेहता हैं। आप दोनों की जोड़ी कुछ कुछ मनमोहन देसाई और अमिताभ बच्चन जैसी नहीं होती जा रही? जब साथ आए तो सिक्सर?
- ये बात सच है कि हम जब भी साथ आते हैं तो लोगों को हमसे उम्मीदें होती हैं। हमें एहसास भी है इस बात का कि हमें हर बार कुछ अलग बनाना ही चाहिए और ‘छलांग’ में इसलिए हम लोग कोई सामाजिक नाटकीयता, कोई संवेदनशील कथ्य या कोई सोच पर चोट करने वाली कहानी लेकर नहीं आ रहे। ये हल्की फुल्की फिल्म है और हमें भरोसा है कि लोगों को ये पसंद आएगी। लेकिन, साथ ही मैं ये भी कहना चाहूंगा कि जिस ईमानदारी से हम ‘शाहिद’, ‘सिटीलाइट्स’ या ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्म बनाते हैं, उसी ईमानदारी से हमने ‘छलांग’ भी बनाई है।
अपने 10 साल के करियर में आपने तमाम ऐसी फिल्में चुनीं जिनकी कामयाबी ने हिंदी सिनेमा में कहानी कहने के तरीके को बदला है, आपको लगता है कि इसमें आपकी हिम्मत का भी योगदान है?
- मैं इसका क्रेडिट उन लेखकों और फिल्म निर्माताओं को देना चाहूंगा, जिन्होंने ऐसी फिल्में लिखीं और बनाईं। अगर ये लेखक लिखते नहीं, निर्देशक अलग तरह की फिल्में बनाते नहीं, निर्माता इनमें पैसा लगाते नहीं तो हमारे जैसे कलाकार तो पता नहीं कहां होते। अगर दिबाकर बनर्जी नहीं सोचते कि मुझे ‘एलएसडी’ बनानी है और मेरे जैसे नए लोगों से काम लेना है तो कुछ नहीं होता। इसके साथ ही मैं इस बदलाव का श्रेय दर्शकों को भी देता हूं जिन्होंने इस तरह की फिल्में पसंद कीं।
ओटीटी (ओवर द टॉप) प्लेटफॉर्म के आने से अलग तरह की फिल्में बनाने में फिल्मकारों का भरोसा कितना बढ़ा है?
- मेरे हिसाब से काफी बढ़ा है। अब निर्माता पर मुनाफे का तनाव नहीं है। ओटीटी ने एक ताकत दी है कि अगर आपके पास कहानी है कहने को, तो लोग उसे देखेंगे। हर फिल्म की रिलीज से पहले शहर शहर घूमने और रोज नए कपड़े पहनकर करोड़ों रुपये फिल्म के प्रचार में खर्च करने की जरूरत भी इसने खत्म कर दी है। दर्शकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें एक अच्छी कहानी चाहिए होती है।
साथी कलाकारों मसलन सतीश कौशिक या कि सौरभ शुक्ला से आप कॉमेडी के कौन से सूत्र सीखते हैं?
- सतीश कौशिक के हास्य का मैं बचपन से फैन रहा हूं। कैलेंडर का उनका किरदार कालजयी किरदार है। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ में उनका वह टेलीफोन वाला सीन बहुत कुछ सिखाता है। वह खुद बताते हैं कि कैसे इसे शूट करते वक्त लोगों को इस दृश्य में तर्क नहीं दिख रहा था। लेकिन, फिल्म रिलीज होने के बाद अब वह सिनेमा के बेहतरीन दृश्यों में गिना जाता है।