सूरज बड़तात्या हिंदी सिनेमा में फिल्म निर्माण कंपनी राजश्री के मशाल वाहक हैं। भारतीयता से ओतप्रोत फिल्में बनाने वाले सूरज को लगता है कि समाज में बुजुर्गों की कहानियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है इसीलिए उन्होंने एक धारावाहिक 'दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ' बनाया है। सलमान खान की अगली फिल्म से लेकर सिनेमा के बदलते रंग रूप पर सूरज बड़जात्या से ये खास मुलाकात की रोहिताश सिंह परमार ने।
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राजश्री का पारिवारिक फिल्में बनाने का इतिहास रहा है, अब फिर वैसी ही फिल्में हिट हो रही हैं जिन्हें पूरा परिवार साथ में देखे। क्या राजश्री का मूल विचार ही इन फिल्मों की कामयाबी का मूल मंत्र है?
मैं बहुत खुश हूं कि वह दौर फिर से लौट आया है जिसमें पूरा परिवार साथ बैठकर फिल्म देख रहा है। मेरा मानना है कि फिल्म हो, टीवी हो या ओटीटी हो, सब परिवार पर ही आधारित हैं। आप कितना भी अकेले देख लो लेकिन जहां कहानी है, वहां बांट कर ही मजा आता है। राजश्री की फिल्में देखना एक पिकनिक मनाने जैसा होता है। मुझे बहुत खुशी होती है जब अमित शर्मा की 'बधाई हो', लव रंजन 'दे दे प्यार दे' या गौरी शिंदे हैलो जिंदगी इंग्लिश विंग्लिश बनाते हैं। फिल्म बनाना और देखना एक उपचार है। मैं अपनी कमियों के बावजूद 'बाला' की तरह पूर्ण हूं, ये किसी को शिक्षा देने से समझ में नहीं आएगा।
'मैंने प्यार किया' से सलमान ने आपके साथ काम किया, 'प्रेम रतन धन पायो' तक एक अभिनेता और एक इंसान के तौर पर सलमान में आप क्या बदलाव देखते हैं?
हमें एक दूसरे को जानते हुए 32 साल बीत चुके हैं। एक इंसान के तौर पर उनमें एक प्रतिशत भी बदलाव नहीं आया। एसी में न बैठना, कुछ भी खा लेना, कहीं भी सो जाना, वही दिलदारी ये सब अब भी बरकरार है। लेकिन, एक अभिनेता के रूप में उनमें बहुत बदलाव आए हैं। अब वह बहुत सुलझे हुए हैं, काम पर केंद्रित रहते हैं।
आपकी फिल्मों की भाग्यश्री, माधुरी दीक्षित, सोनम कपूर जैसी अभिनेत्रियां भारतीय संस्कृति का एक उदाहरण रही हैं। समय को देखते हुए आपकी अगली फिल्म की अभिनेत्री में कितने बदलाव आएंगे?
थोड़ा सा बदलाव तो आएगा ही। लेकिन अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा। और बात रही भारतीयता की तो वह तो 100 प्रतिशत रहेगी ही क्योंकि यह हमारी पहचान है। मैं मानता हूं कि भारतीय नारी जितना खूबसूरत पूरी दुनिया में कोई नहीं है।
आपकी फिल्मों में बड़े-बड़े परिवार होते हैं लेकिन अब छोटे परिवार को सुखी माना जाता है। ऐसे में परिवार को साथ लेकर कैसे चला जाए?
आज के दौर में साथ रहना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन साथ का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं है, दिल साथ रहने चाहिए। ज्यादा कुछ नहीं तो सिर्फ हालचाल लेने के लिए फोन जरूर करते रहना चाहिए और हर त्यौहार साथ मिलकर मनाना चाहिए। आजकल जो मनमुटाव हो जाते हैं, वह नहीं होना चाहिए। यही आज का आदर्श संयुक्त परिवार माना जायेगा।