“मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि हिंदी सिनेमा ने जितने अभिनेता पैदा किए हैं, उनमें इरफान सर्वश्रेष्ठ हैं। वह एक महान अभिनेता, एक शानदार इंसान और एक बेहतरीन दोस्त हैं।” नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा यानी एनएसडी के दिन याद करने पर एक शख्स जो बार-बार और शिद्दत से याद आता है, उसका नाम है इरफान। 1992 में जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुंचा, तो इरफान मुझसे दो बैच सीनियर थे। तब एनएसडी के चर्चित अभिनेताओं में इरफान की कोई गिनती नहीं होता थी। एक दिन एनएसडी में 'ब्रेख्त' का एक नाटक हुआ, जिसमें इरफान ने भी अभिनय किया। उसे देखकर मैं स्तब्ध रह गया। मंच से इतना प्रभावशाली अभिनय मैंने इससे पहले नहीं देखा था। इसके बाद जब भी उन्हें अभिनय करते देखा तो पाया कि उनके अभिनय में अपनी सोच होती है, जो साफ दिखती है। यहीं से मेरी और इरफान की दोस्ती की बुनियाद पड़ी।
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इरफान खान को याद कर भावुक हुए साहेब बीबी और गैंगस्टर के डायरेक्टर, बोले- बस बहुत हुआ, अब लौट आओ
मनोरंजन डेस्क,अमर उजाला
Updated Sun, 16 Sep 2018 06:37 PM IST
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IRRFAN KHAN
- फोटो : SELF
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irrfan with tigmanshu dhulia
मैं जीवन में बहुत कम लोगों से प्रभावित हुआ हूं, लेकिन इरफान की बात ही अलग थी। हम दोनों में सिनेमा ही, नहीं जिंदगी को लेकर भी बहुत से समान संदर्भ थे। मुझे विश्व सिनेमा में गहरी दिलचस्पी थी, यही शौक इरफान को भी था। कई निर्देशक, अभिनेता और अभिनेत्रियां जिन्हें इरफान पसंद करते थे, वही मेरी पसंद भी थे। साहित्य और राजनीति पर बात करने के लिए भी हमारे बीच बहुत कुछ था। हमारे सामाजिक सरोकार भी एक जैसे थे।
irrfan khan
सबसे अहम बात यह थी कि काम के प्रति ईमानदारी का माद्दा भी हम दोनों में एक जैसा था। इरफान 1990 में मुंबई जा चुके थे, जबकि मैं वहां 1993 में पहुंचा। वह समय दोनों के स्थापित होने की जद्दोजहद का समय था। हम जब भी मिलते, हमारी लंबी-लंबी बैठकें होती थीं। इरफान दूसरों के साथ कम और नपी तुली बात करते हैं, लेकिन हम दोनों के बीच जब बातचीत शुरू होती है, तो वक्त का पता नहीं चलता। इस दौरान इरफान सिनेमा और टीवी के कुछ प्रोजेक्ट से जुड़े हुए थे। अपने रोल को लेकर परेशानी की हद तक फिक्रमंद रहने वाला, वह पहला अभिनेता मैंने देखा। हर रोल को लेकर इरफान बेइंतहा मेहनत करते हैं। इससे मेरे मन में उनके प्रति न सिर्फ और सम्मान बढ़ा, बल्कि उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता है। वे बेहद इंटेलिजेंट अभिनेता हैं।
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irrfan khan
मैं तो इरफान के अभिनय का शुरू से मुरीद रहा। सिर्फ एक दोस्त की हैसियत से नहीं, बल्कि एक निर्देशक के रूप में भी। अपनी पहली फिल्म 'हासिल' के लिए इरफान के अलावा कोई दूसरा नाम मेरे दिमाग में आया ही नहीं। इरफान ने साबित भी किया कि मेरा फैसला गलत नहीं था। 'हासिल' के लिए इरफान को 2004 में बेस्ट विलेन का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। इसके बाद इरफान को लेकर मैंने 'चरस', 'साहब बीबी और गैंगस्टर', 'पानसिंह तोमर' बनाई और हर बार उन्हें सीन समझाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें सीन के संदर्भ बताने ही काफी होते हैं और इरफान समझ जाते हैं कि उनसे किस चीज की उम्मीद की जा रही है। इसके बाद सीन की हर बारीक से बारीक चीज पर वे खुद रिसर्च कर कैमरे के सामने जो पेश करते हैं, वह लाजवाब होता है।
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paan singh tomar
इरफान ने अपने कुछ इंटरव्यूज में कहा कि जब उन्हें मन मुताबिक रोल नहीं मिल रहे थे, तो उन्होंने फिल्मी दुनिया को अलविदा कहने का मन बना लिया था। तब मैंने उन्हें रोका और कहा कि अभी कहां जा रहे हो, रुको मैं तुम्हें नेशल अवॉर्ड दिलवाउंगा। मुझे तो याद नहीं कि मैंने कब इरफान से यह कहा, लेकिन 'पानसिंह तोमर' में नेशनल अवार्ड हासिल करने के बाद जब उन्होंने मीडिया से यह सब कहा, तो मन अंदर ही अंदर भीग-सा गया। इस माया नगरी में कौन किसे इस मोहबब्त से याद करता है।