फिल्म ‘हासिल’ के निर्देशक तिग्मांशु धूलिया से इस फिल्म को लेकर अब भी बात छेड़ो तो उनके सीने में दबी कोई आंच सी सुलग जाती हैं। वह बताते हैं, ‘बहुत परेशानी हुई मुझे इस फिल्म को बनाने में, रिलीज करने में और इसे दर्शकों तक पहुंचाने में। इलाहाबाद में मैं पला बढ़ा। और उसी शहर में मैं जब पहुंचा तो वहां मतलब, ये पूरा एक पॉलीटिकल गेम रचा जा चुका था। बड़ी रची बनी बनाई साजिश थी। मैं तो गया था कि पहली फिल्म बना रहा हूं तो अपने शहर में जाऊंगा, एक एक्साइटेड बच्चे की तरह और वहां पर मेरे साथ जो हुआ, बस ये समझिए कि मेरी बहुत दुर्गति की गई। शूटिंग का विरोध करने वालों का ये कहना था जो मुझे बाद में पता चला कि मैं यूनिवर्सिटी को गलत लाइट में नहीं दिखा सकता हूं इसीलिए फिर मैंने ‘हासिल’ में तय किया कि मैं नाम नहीं लूंगा किसी शहर का। पूरी फिल्म में कहीं नाम नहीं लिया मैंने इलाहाबाद का।”
Bioscope S2: ‘हासिल’ की कड़वी यादों पर बोले तिग्मांशु धूलिया, इलाहाबाद के लोगों ने बहुत दुर्गति की
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
तरण आदर्श ने दिए थे दो स्टार
फिल्म ‘हासिल’ रिलीज हुई 16 मई 2003 को। फिल्म के निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया। तिगमांशु, विशाल भारद्वाज, अनुभव सिन्हा और अनुराग कश्यप ये सब उस गोल के फिल्मकार हैं जिनके सिनेमा को लेकर फिल्म समीक्षकों की भी खूब गोलबंदी मुंबई में होती रही। तरण आदर्श ने तब फिल्म ‘हासिल’ को अपने रिव्यू में दो स्टार दिए थे। रेडिफ ने लिखा कि ये हर किसी का सिनेमा नहीं है वगैरह वगैरह। हिंदी सिनेमा में तमाम ऐसी फिल्में हुई हैं जो अपनी रिलीज के वक्त तो फ्लॉप हुईं, लेकिन दर्शकों की अगली पीढ़ी ने इन्हीं फिल्मों को सिर आंखों पर रखा। ‘मेरा नाम जोकर’ के समय के दर्शकों को ‘बॉबी’ जैसी फिल्म चाहिए थी। ‘रहना है तेरे दिल में’ के साल में लोगों को ‘गदर एक प्रेम कथा’ में रस मिला और ‘हासिल के समय लोगों को ‘कोई मिल गया’ अच्छी लगी। समय का पहिया घूमता रहता है। इरफान का पहिया भी इसी फिल्म से घूमना शुरू हुआ। किसे पता था कि जिस कलाकार की फिल्म को कभी कोई रिलीज करने को तैयार नहीं होगा, उसके पीछे एक दिन निर्माताओं की लाइन लगी रहेगी।
तिग्मांशु का पहला लिटमस टेस्ट
फिल्म ‘हासिल’ एक शानदार निर्देशक और एक शानदार अभिनेता दोनों के लिए लिटमस टेस्ट सरीखी फिल्म थी। तिग्मांशु की पढ़ाई लिखाई इलाहाबाद में हुई। वहां की गलियों में सरकती बोली वह अच्छा पकड़ते थे। पिता इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे। ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘वॉरियर’ जैसी फिल्मों की कास्टिंग कर चुके थे। टीवी पर बड़ा नाम था उन दिनों तिग्मांशु धूलिया का। तिग्मांशु भौकाली फिल्मकार हैं। अपने गोल के बाकी फिल्मकारों जैसे। उनकी पिछली फिल्म ‘यारा’ मुझे बेहतरीन फिल्म लगी। ‘हासिल’ उनकी अपनी लिखी फिल्म है। इलाहाबाद में बिताए दिनों से संजीवनी पाने वाली इस फिल्म की कहानी ऐसी है कि एक बार आप फिल्म देखना शुरू करें तो फिर आखिर तक ब्रेक नहीं लेंगे। लेकिन, इसे बनाने में तमाम स्पीड ब्रेकर आए।
बॉबी बेदी ने नहीं निभाया वादा
तिग्मांशु का इस फिल्म को लेकर बॉबी बेदी वाला किस्सा इसमें सबसे रोचक किस्सा भी है और सबसे बड़ा स्पीडब्रेकर भी। शेखर कपूर को लेकर ‘बैंडिट क्वीन’, दीपा मेहता को लेकर ‘फायर’, शाद अली को लेकर ‘साथिया’, विशाल भारद्वाज को लेकर ‘मकबूल’ और केतन मेहता को लेकर ‘मंगल पांडे’ बनाने वाले बॉबी बेदी के साथ तिग्मांशु धूलिया उनकी दूसरी फिल्म ‘इलेक्ट्रिक मून’ के समय से रहे। तिग्मांशु ने उनके लिए टीवी पर काफी काम भी किया लेकिन बॉबी बेदी ने वादे के बाद भी ‘हासिल’ में पैसा नहीं लगाया। फिल्म के लिए पैसा जुटाने में तिग्मांशु को जो मेहनत करनी पड़ी, उसकी खटास उनके सिनेमा में बरसों तक झलकती रही। फिल्म में इरफान का जो गुस्सा और जो तेवर है, वही इस फिल्म की असली आंच है और ये आंच है एक ऐसे फिल्मकार की भी जिसमें सिनेमा की भूख दिखती है। तिग्मांशु अब खाए अघाए फिल्मकार हैं। अभिनय में भी तल्लीन हैं। ओटीटी पर भी सक्रिय हैं। लेकिन हासिल को अब भी नहीं भूले हैं। फिल्म की सालगिरह पर इरफान को याद करते हुए वह बताते हैं कि कैसे फिल्म का शीर्षक उनको इरफान के किराए वाले फ्लैट पर ही चमका था।
कुंभ में शूट किया क्लाइमेक्स
और, चमका तो इरफान खान का नाम भी इसी फिल्म से था। बेस्ट विलेन का अवार्ड दिलाने वाली फिल्म ‘हासिल’ हिंदी सिनेमा में इरफान का असली टेक ऑफ रहा। टेक ऑफ इसलिए क्योंकि इससे पहले वह करीब दो दर्जन बार परदे पर तो दिख चुके थे, लेकिन उनके करियर का प्लेन उड़ नहीं पा रहा था। अजब सा चेहरा, गजब सी आंखें लिए इरफान को कोई हीरो मटीरियल मानता नहीं था और यहां तक कि फिल्म बन जाने के बाद भी इसे रिलीज करने में तिग्मांशु के तोते उड़ गए थे। ये फिल्म उन गिनी चुनी फिल्मों में शामिल है जिसकी शूटिंग रिवर्स सीक्वेंस में शुरू हुई। यानी पहले क्लाइमेक्स फिर बाकी की फिल्म। लेकिन, यहां क्लाइमेक्स की शूटिंग पहले करना निर्देशक की मजबूरी थी क्योंकि इलाहाबाद का कुंभ खत्म होने वाला था और प्रोड्यूसर कोई मिल नहीं रहा था। तिग्मांशु ने क्राउड फंडिंग के जरिए थोड़ा बहुत पैसा जुटाया और इसका क्लाइमेक्स शूट कर डाला। इस क्लाइमेक्स को एडिट करके उन्होंने इसे फिल्म की शो रील बनाया और तमाम निर्माताओं को दिखाया। और, जब सब कुछ हो गया और तिग्मांशु फिल्म शूट करने इलाहाबाद पहुंचे तो इलाहाबाद यूनीवर्सिटी के छात्र नेताओं ने उन्हें वहां फिल्म ही नहीं शूट करने दी। तो जो इलाहाबाद यूनीवर्सिटी आपको फिल्म में दिखती है वह दरअसल पुणे और मुंबई की ऐसी लोकेशन्स हैं जिन्हें तिग्मांशु ने इलाहाबाद यूनीवर्सिटी जैसा दिखा दिया है।