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Movie Review: डाकुओं को लेकर बुने सारे जाले साफ कर देती है 'सोनचिड़िया'
Fri, 01 Mar 2019 11:03 AM IST
विजय जैन
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: विजय जैन
Updated Fri, 01 Mar 2019 11:03 AM IST
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मूवी रिव्यू: सोन चिड़िया
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- फोटो : social media
फिल्म सोनचिड़िया की कहानी डाकू मान सिंह के गैंग कहानी है। गिरोह के सारे लोग उसे दद्दा कहते हैं, शायद पूर्व दस्यु मलखान सिंह इसी भ्रम में इस फिल्म की कहानी को अपनी कहानी मान बैठे हैं और अदालत तक जा पहुंचे हैं। फिल्म का दद्दा धर्म और भगवान में विश्वास करता है। सब उसका आदर भी करते हैं। गिरोह में लखना और वकील सिंह का संघर्ष है। तीस-चालीस साल पहले एक युवती का अपने ससुरालवालों से विद्रोह है। यह विद्रोह वह अपने ससुर से एक मासूम को बचाने के लिए करती है। और, कहानी का टिपिंग प्वाइंट है दरोगा वीरेंद्र सिंह।
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इश्कियां और उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों से अपने सिनेमा का एक अलग दर्शक वर्ग बना चुके निर्देशक अभिषेक चौबे ने एक बार फिर जमीनी हकीकत को गिरेबान से पकड़ने की कोशिश की है। उनकी दृश्य संरचना फिर एक बार चौंकाती है। यह बीहड़ों को एक ऐसे नजरिये से दिखाती है कि दर्शको के दिमाग से घोड़ों वाले डाकुओं की फिल्मों का हैंगओवर एक झटके में उतर जाता है। पहले सीन से ही अभिषेक कहानी की गुद्दी पकड़ लेते हैं और आखिरी सीन तक कहानी कहने के अपने अलहदा अंदाज को अपन पकड़ से निकलने नहीं देते। यही सोनचिड़िया की असली जीत है।
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सोनचिड़िया
- फोटो : सोशल मीडिया
हिंदी सिनेमा में नंबर चार और नंबर पांच के लिए चल रही लड़ाई में सुशांत सिंह राजपूत कड़े संघर्ष में रहे हैं और विकी कौशल के साथ मुकाबले में यह फिल्म उनकी मदद करने वाली है। सुशांत की अदाकारी में दमखम है। अपने काम को लेकर उनकी थोड़ी सी और गंभीरता उनको चोटी के तीन सितारों में भी पहुंचा सकती है, इस फिल्म से ये बात साबित होती है। आमतौर पर शहरी किरदारों में दिखते रहे रणवीर शौरी ने वकील सिंह के किरदार में सबको चौंका दिया है। इस फिल्म के लिए उनको बेस्ट विलेन के खूब अवार्ड्स मिलने वाले हैं। भूमि पेडनेकर का तो कहना ही क्या, वह फिल्म दर फिल्म खुद को मांज रही हैं, और उनकी चमक सोनचिड़िया से और निखरी है। मनोज बाजपेयी फिल्म में ज्यादा देर के लिए नहीं हैं, पर जितना भी हैं, असर छोड़ते हैं। आशुतोष राणा को जो कहा गया, उतना उन्होंने सलीके से कर दिया है।
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Sonchiraiya
- फोटो : social media
तकनीकी तौर भी सोनचिड़िया काफी मजबूत है। अनुज राकेश का कैमरा फिल्म शुरू होते ही दर्शकों को कहानी का हिस्सा बनाने में कामयाब रहता है। मेघना सीन ने एडिटिंग टेबल पर अभिषेक और अनुज की मेहनत को इज्जत बख्शी है। फिल्म की कमजोर कड़ी इसका संगीत है लेकिन डाकुओं के जीवन में पैदल भागते फिरते वैसे भी रस बचता कहां है, फिर भी मामे खान को बागी रे गाने में सुनना अच्छा लगता है। अभिषेक चौबे इस फिल्म के साथ अपने उस्ताद विशाल भारद्वाज से दो कदम आगे के निर्देशक बन चुके हैं। विशाल को भी इस बात का गर्व जरूर होगा। अमर उजाला डॉट कॉम के वीकली रिव्यू में फिल्म सोन चिड़िया को मिलते हैं चार स्टार।