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बाइस्कोप: ‘मदर इंडिया’ के बाद इस फिल्म में मिले राजेंद्र कुमार और सुनील दत्त, माधुरी ने निभाया वादा

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 30 Jul 2020 12:32 AM IST
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phool this day that year series by pankaj shukla 30 july 1993 bioscope kumar gaurav madhuri dixit
फूल - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

जीवन में मुसीबतें आएं तो बिना घबराए कैसे उनका सामना करना चाहिए, इसे समझाने के लिए अब भी कभी कभी मशहूर भरत नाट्यम नर्तकी सुधा चंद्रन का नाम लिया जाता है। सुधा चंद्रन ने अपना एक पैर त्रिची से चेन्नई जाते हुए रास्ते में हुई एक दुर्घटना में खो दिया था, लेकिन उन्होंने कृत्रिम पैर लगाकर फिर से नृत्य शुरू किया और पूरी दुनिया में अपने नृत्य की धाक जमा दी। भारतीय सिनेमा में बायोपिक बनाने का चलन वैसे तो फिल्म ‘डॉ. कोटनीस की अमर कहानी’ से माना जाता है लेकिन संगीतम श्रीनिवास राव की साल 1984 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म ‘मयूरी’ ने इसे फिर से चलन में ला दिया। ये फिल्म सुपरहिट हुई। संगीतम श्रीनिवास राव सिनेमा के पुराने दिग्गज रहे हैं लेकिन ‘मयूरी’ की चर्चा उत्तर भारत तक इतनी हुई कि रामोजी राव ने इसे हिंदी में बनाने का फैसला कर लिया। दो साल बाद फिल्म ‘नाचे मयूरी’ रिलीज हुई और सुपरहिट रही।

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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

‘नाचे मयूरी’ ने लोगों को इसकी ओरिजनल फिल्म ‘मयूरी’ देखने को भी उत्साहित किया। तब तक ये फिल्म तमिल और मलायलम में भी डब होकर रिलीज हो चुकी थी और हिंदी पट्टी तक भी संगीतम श्रीनिवास राव का लोग जानने लगे थे और इसी बीच साल 1988 में एक ऐसी फिल्म की चर्चा हुई जिसमें कोई संवाद ही नहीं था। फिल्म का नाम था ‘पुष्पक विमाना’। फिल्म में जब संवाद ही नहीं तो इसकी भाषा भला क्या? लेकिन हिंदी पट्टी के वितरकों ने इसे ‘पुष्पक’ नाम से रिलीज किया। कमल हासन और अमला के साथ टीनू आनंद के अभिनय ने इस फिल्म से संगीत श्रीविनास राव नाम के निर्देशक को घर घर चर्चित कर दिया और इनकी कमल हासन के साथ अगली फिल्म ‘अपूर्व सहोदारगल’ ने तो कमाल ही कर दिया। कमल हासन ने फिल्म एक पूरा और एक आधा रोल किया। आधा मतलब कुछ कुछ फिल्म ‘जीरो’ में शाहरुख खान के किरदार बउआ सिंह जैसा। हिंदी में ये फिल्म ‘अप्पू राजा’ के नाम से रिलीज हुई और सुपरहिट हुई। ये बात है साल 1990 की और तब तक हिंदी सिनेमा में अपनी पहली ही फिल्म ‘लव स्टोरी’ से सुपरस्टार बने कुमार गौरव के सारे विकल्प सिनेमा में बने रहने के आजमाए जा चुके थे।

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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कुमार गौरव के पिता राजेंद्र कुमार ने एक आखिरी दांव अपने बेटे कुमार गौरव पर लगाया और एलान किया एक फिल्म का जिसमें उस वक्त की नंबर वन हीरोइन माधुरी दीक्षित को लिया गया। निर्देशक लाए गए, संगीतम श्रीनिवास राव। राजेंद्र कुमार ये मानकर चले कि जो निर्देशक कमल हासन को तमिल सिनेमा से निकालकर पूरी दुनिया में सुपरस्टार बना सकता है, वह जरूर उनके बेटे का कुछ तो कल्याण करेगा। आमतौर पर हिंदी सिनेमा के सितारे दक्षिण भारत के फिल्मकारों से मुंहमांगी रकम पाते रहे हैं, ये शायद पहला मौका था जब किसी दक्षिण भारतीय फिल्ममेकर ने मुंबई के फिल्म निर्माता से मुंहमांगी रकम फिल्म निर्देशित करने के लिए वसूल की और ये फिल्म बनी भी तो सिर्फ राजेंद्र कुमार की साख के चलते। 

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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राजेंद्र कुमार को जिन्होंने करीब से जाना है, वे मानते हैं कि हिंदी सिनेमा के चंद बेहद शरीफ लोगों में उनकी गिनती की जा सकती है। लोकप्रियता में वह जुबली कुमार कहलाए। वह इसलिए कि एक जमाना ऐसा भी था जब उनकी आधा आधा दर्जन फिल्में एक साथ तमाम शहरों के सिनेमाघरों में लगी होतीं और सब कम से कम 25 हफ्ते (सिल्वर जुबली) इन सिनेमाघरों मे चलती रहतीं। ‘धूल का फूल’ से शुरू हुआ सिल्वर जुबली फिल्मों का ये सिलसिला ‘दिल एक मंदिर’, ‘मेरे महबूब’, ‘संगम’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘आरजू’, ‘सूरज’, ‘झुक गया आसमान’, ‘तलाश’ और ‘गंवार’ जैसी फिल्मों तक चलता रहा। फिल्म पुरस्कारों की बदकिस्मती देखिए कि वह अपनी किसी ट्रॉफी पर उनका नाम कभी नहीं लिखवा पाए।

जी हां, जो सितारा जनता के बीच जुबली कुमार के नाम से मशहूर हुआ वह कभी पुरस्कारों की सेटिंग में नहीं पड़ा और न ही उसने कभी किसी पुरस्कार देने वाली पत्रिका के संपादक की खुशामद ही इस काम के लिए की। राजेंद्र कुमार कहते थे, “अंग्रेजी बोलने वालों से मिली तारीफ से कुछ नहीं होता। तारीफ उससे मिलनी जरूरी है जो दिन में चंद रुपये कमाकर भी शाम को टिकट लेकर मेरी फिल्म देखता है।” राजेंद्र कुमार ने कभी अंग्रेजी फिल्म समीक्षकों की तारीफ को ही अपनी काबिलियत का पैमाना भी नहीं माना।

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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राजेंद्र कुमार ने जब संगीतम श्रीनिवास राव के साथ अपने बेटे का करियर बचाने के लिए फिल्म ‘फूल’ बनाने का एलान किया तो लोगों को समझ नहीं आया कि ये प्रोजेक्ट बनेगा कैसे। लेकिन कम लोगों को ही ये पता था कि ये राजेंद्र कुमार ही थे जिन्होंने माधुरी की काबिलियत को ‘तेजाब’ की रिलीज से पहले ही पहचान लिया था और उनको अपनी एक फिल्म के लिए साइनिंग अमाउंट भी दे आए थे। राजेंद्र कुमार की इस दरियादिली ने अपना रंग दिखाया और उनके फोन करने पर माधुरी दीक्षित को साल 1987 की बात याद रही और उन्होंने उनकी फिल्म ‘फूल’ में बिना किसी हिचक के काम भी किया। माधुरी चाहतीं तो तब साइनिंग अमाउंट लौटाकर इस फिल्म के लिए मना भी कर सकती थीं, लेकिन माधुरी को हिंदी सिनेमा में दिल से मजबूत और जुबान से पक्की कलाकार माना जाता है। ये इस घटना ने एक बार फिर साबित भी किया। वैसे, माधुरी और कुमार गौरव को एक और फिल्म नाराज के लिए भी साइन किया गया था लेकिन वह फिल्म बनी नहीं।

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