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बाइस्कोप: जब राज कपूर को बेटे पर आया था जबर्दस्त गुस्सा, ये दो असिस्टेंट बने नामी फिल्म डायरेक्टर

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 01 Aug 2020 03:01 AM IST
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prem rog this day that year series by pankaj Shukla 31 july 1982 bioscope raj Kapoor rishi Kapoor
प्रेम रोग - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

आज के बाइस्कोप के लिए मुकाबला तीन फिल्मों के बीच माना गया था और ये फिल्में थी राज कपूर की 1982 में रिलीज हुई फिल्म प्रेम रोग, 1992 में रिलीज हुई काजोल की पहली फिल्म बेखुदी जिससे सैफ अली खान को फिल्म शुरू होने के बाद निकाल दिया गया था और 2009 में रिलीज निर्देशक इम्तियाज अली की फिल्म लव आज कल, जिसमें संयोग से हीरो सैफ अली खान ही थे। बाइस्कोप के नियमित पाठक टोंक, राजस्थान के राम भगीरथ लिखते हैं, “मैं तो अस्सी के दशक के आखिरी सालों में पैदा हुआ बच्चा हूं इसलिए बचपन में सारी नब्बे के दशक की ही मूवीज देखी है इसलिए उनके बारे में जानना चाहता हूं।” सबसे ज्यादा पाठकों ने चूंकि फिल्म ‘प्रेम रोग’ के बारे में ही पढ़ने की मंशा जाहिर की और आज मैं लिखने वाला भी फिल्मफेयर पुरस्कार में 12 श्रेणियों में नामांकन हासिल करने ‘प्रेम रोग’ के बारे में ही जा रहा हूं, लेकिन राम भगीरथ का कहना मुझे याद रहेगा। कोशिश रहेगी कि आने वाले दिनों में बाइस्कोप का दायरा बढ़ाया जाए और इसमें पिछली सदी के अलावा इस सदी की फिल्में भी शामिल की जाएं।



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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया

तो शुरू करते हैं आज का बाइस्कोप, जिसमें फोकस में है 31 जुलाई 1982 को रिलीज हुई फिल्म ‘प्रेम रोग’। इस फिल्म की कहानी लिखी कामना चंद्रा ने, जिनकी दो बेटियां हैं, निर्देशक तनूजा चंद्रा और फिल्म समीक्षक अनुपमा चंद्रा। बेटा विक्रम भी उनका उपन्यासकार है, विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर ही नेटफ्लिक्स की सीरीज सेक्रैड गेम्स बनी है। कामना चंद्रा की लिखी इस कहानी के संवाद लिखे हैं मशहूर लेखक जैनेंद्र जैन ने। जैनेंद्र जैन बंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी करते करते राज कपूर की संगत में आए और उन दिनों आए जब राज कपूर फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने के बाद कंगाल से हो गए थे। जैनेंद्र जैन के लिखे ‘बॉबी’ के संवादों को राज कपूर ने पसंद किया। इसी फिल्म से आर के स्टूडियो की किस्मत बदली। इस फिल्म के बाद जैनेंद्र जैन ने राज कपूर के साथ ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ में भी काम किया।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया

राज कपूर जैनेंद्र जैन के काम से काफी खुश थे और फिल्म ‘प्रेम रोग’ का निर्देशन वह जैनेंद्र जैन से ही करवाने वाले थे, लेकिन फिल्म की कथा, पटकथा और संवाद जब तीनों राजकपूर के सामने आए तो उन्हें लगा कि शायद जैनेंद्र जैन इस फिल्म के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे और राज कपूर ने खुद ये फिल्म बनाने का फैसला कर लिया। हालांकि जैनेंद्र जैन ने इसके लिए कभी सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा और बाद में आर के स्टूडियो की फिल्मों ‘हिना’ और ‘प्रेम ग्रंथ’ के लिए भी काम किया लेकिन ‘प्रेम रोग’ का निर्देशन न मिलने से वह इतना व्यथित हुए कि उन्होंने इस फिल्म के रिलीज होते ही अपनी खुद की फिल्म शुरू कर दी। जैकी श्रॉफ, रति अग्निहोत्री और खुशबू स्टारर ये फिल्म थी ‘जानू’। ये फिल्म 1985 में रिलीज हुई। इस फिल्म के निर्देशक थे जैनेंद्र जैन और इसका निर्माण भी उन्होंने खुद ही किया।

फिल्म ‘प्रेम रोग’ की कहानी दरअसल देवदास की कहानी को ट्वीक कर तैयार की गई  कहानी है। यहां भी कहानी का नायक देव ही है, देवधर है उसका पूरा नाम। ठाकुर की बेटी मनोरमा और देव दोनों साथ खेल कूद कर बड़े हुए। ठाकुर की मदद से ही वह शहर पढ़ने जाता है। लौटकर आता है तो रमा बड़ी हो चुकी है। घर की गरीबी आड़े आती है और वह अपने मन की बात कह नहीं पाता है। इसी बीच मनोरमा की शादी हो जाती है और अगले ही दिन वह विधवा भी हो जाती है। ‘अनुज वधू भगिनी सुत नारी, सुन सठ कन्या सम ए चारी’ पढ़ने व मानने वाले देश में जेठ रमा का बलात्कार करता है। वह वापस अपने मायके लौट आती है। देव एक बार फिर से मनोरमा के चेहरे पर वही मुस्कान देखना चाहता है। और, उसे बताता है कि वह उसे अब भी प्यार करता है।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया

अभी जो गाना यहां पर आपने सुना या देखा होगा, वह इस फिल्म के नाम को सार्थक करता है, ‘प्रेम रोग’। गाने का ये अंतरा ही देव की मनोस्थिति का खुलासा करता है,

सोचता हूं कि मेरी आंखों ने
क्यों सजाए थे प्यार के सपने
तुझसे मांगी थी इक खुशी मैंने
तूने गम भी नहीं दिए अपने

***
जिन्दगी बोझ बन गई अब तो
अब तो जीता हूं और न मरता हूं
मैं तुझे कल भी प्यार करता था
मैं तुझे अब भी प्यार करता हूं


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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया

इस गीत को लिखा है दिल्ली के मशहूर शायर रहे अमीर कजलबाश ने। इस गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर के बेस्ट लिरिसिस्ट कैटेगरी में नॉमीनेशन भी हासिल हुआ। फिल्म ‘प्रेम रोग’ के गाने लिखने के लिए राज कपूर अपने फेवरिट संगीतकारों शंकर जयकिशन में से तब तक सक्रिय शंकर की बजाय लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को लिया और लक्ष्मी-प्यारे अपने साथ इस फिल्म में मनोज कुमार के फेवरिट गीतकार संतोष आनंद को ले आए। संतोष आनंद ने इस फिल्म के तीन सबसे सुपरहिट गाने लिखे। पहला तो लता मंगेशकर का कमाल का गाया गाना है, ‘ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा’, दूसरा गाना है लता मंगेशकर और सुरेश वाडेकर का गाया गाना ‘मोहब्बत है क्या चीज हमको बताओ’ और तीसरा गाना रहा सुधा मल्होत्रा और अनवर का गाया गीत ‘ये प्यार था या कुछ और था..’।

फिल्म के गाने ‘मोहब्बत है क्या चीज हमको बताओ’ के लिए संतोष आनंद का नाम भी उस साल फिल्मफेयर पुरस्कारों में बेस्ट लिरिसिस्ट के तौर पर नॉमीनेट हुआ और ये पुरस्कार जीता भी संतोष आनंद ने ही।


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