Movie Review: यारा (Yaara)
ओटीटी: ZEE5
रेटिंग: ***1/2
फ्रेंडशिप डे पर रिलीज हुई फिल्म 'यारा' तिग्मांशु ने अपने दोस्त इरफान खान को याद करते हुए शुरू की है। तिग्मांशु मुंबई को एक बड़ा सा ऑफिस मानते हैं जिसमें सब आते हैं, काम करते हैं और चले जाते हैं। दोस्त उनके सब इलाहाबाद में रहते हैं। रात को दो बजे फोन करके हैरान होते हैं। फिर सुबह छह बजे फोन रिसीव करके परेशान होते हैं। दोस्त होते ही ऐसे हैं। बिना बात के लकड़ी करने वाले। सन 50 से लेकर अब तक के हिंदुस्तान को एक कैनवस की तरह इस्तेमाल करते हुए तिग्मांशु ने दोस्ती के यही रंग लेकर एक कहानी पेंट की है, यारा।
Yaara Review: विद्युत, विजय, अमित और केनी ने जमा दी चौकड़ी, अरसे बाद पूरे रंग में दिखे तिग्मांशु
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जय वीरू के दौर में मशहूर रही फागुन, मितवा, रिजवान और बहादुर की दोस्ती वाली कहानी है यारा। इसमें एक्शन है, इमोशन है, ड्रामा है और हैं एक दो बिल्कुल दिल चाहता है, टाइप गाने। 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा' के बाद ये दूसरी कायदे की ऐसी हिंदी फिल्म है जो दोस्ती की तह तक भी जाती है और बाहर से मलमल से लगने वाले एहसास के फटे अस्तर भी उधेड़ती है।
कहानी फागुन के मुंडन से शुरू होती है। मितवा उसे गिफ्ट में मिलता है मुंडन कराके। गले में ओम लटकाने वाले फागुन का साथ पाकर मितवा अपना ताबीज उतार देता है। गांव में कांड करके दोनों भागते हैं और पहुंचते है रास्ते में मिले चाचा के साथ नेपाल बॉर्डर। यहां दोनों रिजवान और बहादुर से मिलते हैं। चारों का चौकड़ी गैंग स्कूल यूनीफॉर्म पहनकर तस्करी करता है और फिर बड़े होकर एक दिन उस पटना का बैंक लूटता है जिसकी गलियों में जय प्रकाश नारायण यानी जेपी के नारे अंग्रेजी में लिखे हैं। पैसा कमाने के साथ ही दोनों रिश्ते भी कमाते हैं लेकिन भेदिये पहचानना भूल जाते हैं। अर्बन नक्सल गिरोह को दिल्ली में हथियार पहुंचाते हैं और गांव में पकड़े जाते हैं। कहानी का असली एंगल इन सबके उम्रदराज होने के बाद खुलता है और किस्सा अपने अंजाम तक पहुंचता है।
फ्रांस की फिल्म लेस ल्योन्नेस (ए गैंग स्टोरी) के इस आधिकारिक रूपांतरण में तिग्मांशु धूलिया ने कॉकटेल क्राइम ड्रामा की उस श्रेणी पर मास्टरी कर ली है जिसकी पहली कोशिश में वह पांच साल पहले फिल्म 'बुलेट राजा' में फेल हो गए थे। तिग्मांशु ने वहां अपने ही मैदान में मात खाई थी सो इस बार वह राजस्थान, नेपाल बॉर्डर, पटना और रोमानिया में अपनी कहानी ले गए। यहां चांद लोहार का बेटा कहानी का कलेवर सेट करता है। नाम है फागुन और परिचय वह अपना ये कहकर देता है कि हमारे नाम से गर्मी शुरू होती है। तिग्मांशु धूलिया की ये फिल्म 'बुलेट राजा' के तुरंत बाद ही शुरू हुई थी और एक तरह से उन गलतियों का पश्चाताप है जो उनसे सैफ अली खान की फिल्म में हुईं।
'यारा' का तिग्मांशु धूलिया 'पान सिंह तोमर' के आगे का तिग्मांशु धूलिया है। तिग्मांशु के किरदार वैसे भी कभी पूरे स्याह या पूरे सफेद नहीं रहे। तिग्मांशु ने यहां कहानी की एक टाइमलाइन फिल्मों के पोस्टर्स के सहारे सेट करने की कोशिश की है। मार्च 75 में रिलीज हुई 'अमानुष' के गाने का जिक्र करने के बाद नवंबर 75 की फिल्म 'फरार' के पोस्टर से आगे बढ़ता ये सिलसिला जहानाबाद मास मर्डर, मुकेश के निधन का समाचार और अमर अकबर एंथनी में आकर थोड़ा गड़बड़ाता है, लेकिन हर दर्शक इतना महीन पकड़ भी नहीं पाता है। तिग्मांशु यहां एक काल खंड सजाते हैं और अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन दौर में तीन बैक टू बैक हिट फिल्म देकर डेब्यू से ही स्टार बन गए अमोल पालेकर की 'चितचोर' भी ले आते हैं।
स्याह रातों की धुंधली सुबहों के सुलगते उजालों की कहानी कहती 'यारा' में विद्युत जामवाल नायक बनकर उभर पाते हैं तो इसलिए कि उनके साथी कलाकारों में विजय वर्मा का दीवार का अमिताभ बच्चन बनने का स्वांग, अमित साध का उसका दाहिना हाथ बने रहने का राग और केनी की मटरगश्तियां तस्वीर के बाकी रंग सलीके से भरते रहते हैं। चारों कलाकारों ने उम्र के दो अलग अलग पड़ावों में अपना अभिनय हकीकत के करीब रखने की पूरी कोशिश की है। वजन बढ़ाकर देह रूपांतरण करने के मामले में यहां अमित साध ने बाजी मारी है और एक्शन के मामले में विद्युत जामवाल ने। विजय वर्मा का तालाब के किनारे दोस्त की गोली खाने के बाद का गुस्सा अच्छा बन पड़ा है। ट्रक में साड़ी पहने श्रुति हसन बिल्कुल 'गीत गाता चल' की सारिका नजर आती हैं।
तिग्मांशु धूलिया की ये फिल्म उनके निर्देशन क्षमता का एक और विस्तार है। ये वह विस्तार है जहां उन्हें अपनी तकनीकी टीम में कुछ नए सिनेमा के लोग मिले हैं। अल्लू अर्जुन की फिल्म 'सरैयनोडू' और राम चरण की फिल्म 'विनय विधेय राम' में अपने कैमरा कोणों का करिश्मा दिखाने वाले सिनेमैटोग्राफर ऋषि पंजाबी का फिल्म 'यारा' में दिखा ये करिश्मा पांच साल पहले का है। नेपाल और रोमानिया की खूबसूरती दिखाने के अलावा ऋषि ने उत्तराखंड की वादियों पर भी अच्छे से कैमरा घुमाया। टिहरी झील के दृश्य वाकई मनोरम हैं।
फिल्म की एडीटिंग के लिए भी तिग्मांशु ने गीता सिंह में एक माटी का लाल खोज निकाला है। 'लिसेन अमाया' के बाद तिग्मांशु की 'राग देश' भी गीता ने एडिट की है। उनके एडिट में एक पैटर्न पकड़ा जा सकता है, वह जंप कट देने से बचती हैं और उनकी टाइम लाइन पर एक सीन से दूसरे सीन में कहानी बहती हुई जाती है। फिल्म सिर्फ 10 मिनट ज्यादा लंबी है, वहां जहां दो गाने एक के बाद एक आ जाते हैं।
फिल्म में एक और गुदड़ी का लाल तिग्मांशु ने संगीत क्षेत्र में खोजा है, रेव शेरगिल। रेव ने फिल्म में तीन गाने 'खुदखुशी', 'बेपरवाह' और 'बिखर गए' लिखे और गाए हैं। तीनों गाने इस सीजन के बेहतरीन गाने हैं और फिल्म के अलावा भी अपना असर छोड़ते हैं। 'खुदकुशी' अगले साल के फिल्म पुरस्कारों में अपनी जगह बनाने का पूरा दम रखता है। इस वीकएंड पर वैसे तो तमाम फिल्में रिलीज हो रही हैं, लेकिन अगर दोस्तों के साथ मस्ती करते हुए वीकएंड बिताने का मूड हो तो ये फिल्म जरूर देखें। दोस्ती का एक बड़ा सबक इसका क्लाइमेक्स देता है। मैं इस फिल्म को देता हूं साढ़े तीन स्टार।
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