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कारगिल के 27 साल: 'हर कदम पर मौत थी,पर तिरंगा लहराने की ख्वाहिश ने डरने नहीं दिया'-डटे रहे गोरखपुर के जांबाज

Sun, 26 Jul 2026 11:42 AM IST
Rohit Singh रजनी ओझा/ अभिषेक त्रिपाठी/ अरुण मिश्रा, गोरखपुर
रजनी ओझा/ अभिषेक त्रिपाठी/ अरुण मिश्रा, गोरखपुर Published by: Rohit Singh Updated Sun, 26 Jul 2026 11:42 AM IST
सार

चौरी-चौरा के रणबांकुरों की हुंकार की गूंज आज भी इस माटी के कण-कण में सुनाई देती है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी लहू की स्याही से इतिहास के पन्नों को स्वर्णिम किया। यह वही धरती है जहां पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खां जैसे अमर शहीदों ने हंसते-हंसते फंदे को चूमकर देश के स्वाभिमान को सर्वोच्च रखा। वर्ष 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान कारगिल की बर्फीली चोटियों पर जब देश को अपने वीर सपूतों की जरूरत पड़ी, तो गोरखपुर की इसी माटी के बेटों ने अपने सीने पर गोलियां खाकर तिरंगे की आन को आंच नहीं आने दी।

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27 Years of the Kargil War: The story of those sons of Gorakhpur who blew up enemy outposts.
करगिल युद्ध के समय हिमालय की दुर्गम चोटी पर तिरंगे के साथ सेना के जवान - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

गोरखपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और अटूट देशभक्ति का वह जीवंत दस्तावेज है, जिसकी हर सांस में राष्ट्रप्रेम की महक रची-बसी है। चौरी-चौरा के रणबांकुरों की हुंकार की गूंज आज भी इस माटी के कण-कण में सुनाई देती है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी लहू की स्याही से इतिहास के पन्नों को स्वर्णिम किया।



यह वही धरती है जहां पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खां जैसे अमर शहीदों ने हंसते-हंसते फंदे को चूमकर देश के स्वाभिमान को सर्वोच्च रखा। वर्ष 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान कारगिल की बर्फीली चोटियों पर जब देश को अपने वीर सपूतों की जरूरत पड़ी, तो गोरखपुर की इसी माटी के बेटों ने अपने सीने पर गोलियां खाकर तिरंगे की आन को आंच नहीं आने दी।

कारगिल विजय दिवस के इस पावन अवसर पर, उन्हीं अमर बलिदानियों के अदम्य शौर्य, अटूट जज्बे और उनके परिवारों के त्याग को आइए मिलकर नमन करते हैं और सुनते हैं कारगिल युद्ध की कहानियां। इन कहानियों को बार-बार दोहराना इसलिए भी जरूरी है कि हमारे युवा इन्हें सुनें, अपने हीरो को जानें और खुद एक मिसाल बनें।

27 Years of the Kargil War: The story of those sons of Gorakhpur who blew up enemy outposts.
सूबेदार मेजर ओम प्रकाश मिश्रा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तोपखाने की टीम थी हमारी, मिलकर दुश्मन की चौकियों को ध्वस्त कर दिया
सूबेदार मेजर (सेवानिवृत्त) ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि कारगिल की बर्फीली चोटियों पर हर पल मौत सामने खड़ी थी। कई-कई दिनों तक खाना खाने का होश नहीं रहता था, नींद आंखों से कोसों दूर रहती थी और दुश्मन की गोलियां हर पल सीना चीरने को तैयार रहती थीं। लेकिन भारतीय सैनिकों के कदम कभी नहीं डगमगाए। मुझे गर्व है कि मैं खुद उन्हीं जांबाजों में शामिल था।

कारगिल युद्ध के दौरान तोपखाने की उस टीम में रहकर दुश्मन की मजबूत चौकियों को हमने मिल कर ध्वस्त किया। युद्ध में सबसे बड़ी ताकत हथियार नहीं, बल्कि देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा होता है।

कई बार ऐसी परिस्थितियां आई जब कई दिनों तक ठीक से भोजन नहीं मिला, शरीर थककर जवाब देने लगा, लेकिन न किसी जवान ने पीछे हटने की सोची और न ही अपने साथियों का हौसला टूटने दिया।

हर सैनिक के मन में सिर्फ एक ही संकल्प था। हर हाल में तिरंगे की आन-बान-शान की रक्षा करनी है। गोलियों और गोलाबारी के बीच हर सैनिक अपने परिवार के बारे में नहीं, बल्कि अपने देश और अपनी बटालियन के बारे में सोच रहा था। घायल साथियों को देखकर दर्द जरूर होता था लेकिन वही दृश्य दुश्मन को जवाब देने का हौसला भी दोगुना कर देता था।
27 Years of the Kargil War: The story of those sons of Gorakhpur who blew up enemy outposts.
मुझे गर्व है कि मेरा परिवार देश के काम आ रहा
सूबेदार मेजर ओम प्रकाश मिश्रा के कहते हैं कि दोनों बेटे भारतीय सेना में अधिकारी हैं, जबकि बड़ी बहू भी सेना में मेजर हैं। कहते हैं कि मुझे गर्व है कि मेरा परिवार देश के काम आ रहा है। हमारे परिवार में वर्दी केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पण, अनुशासन और कर्तव्य का प्रतीक है।
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27 Years of the Kargil War: The story of those sons of Gorakhpur who blew up enemy outposts.
अनिरुद्ध शाही, अध्यक्ष गोरखपुर वीर सेनानी कल्याण संस्थान - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
नींद का एक लम्हा भी भारी था...
अनिरुद्ध शाही, अध्यक्ष, गोरखपुर वीर सेनानी कल्याण संघ बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान जैसलमेर का तपता हुआ रेगिस्तान भी देश की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ था। उसी मोर्चे पर हम पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात थे। जैसलमेर बॉर्डर की भीषण गर्मी, 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचता तापमान और रेत के उठते बवंडर किसी खामोश दुश्मन से कम नहीं थे।

पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हालात और हर पल मंडराते अनजान खतरे के बीच हम सभी अपने-अपने मोर्चे पर डटे रहे। ऐसे कठिन समय में नींद का एक पल भी भारी पड़ सकता था। हम न जाने कितनी रातें जागते रहे, हर क्षण सतर्क रहना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।

अपनी और अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए मेरी नजर दुश्मन की हर नापाक हरकत पर टिकी रहती थी। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हमारे हौसले अडिग थे और देश की रक्षा का संकल्प हर कठिनाई से कहीं अधिक मजबूत था।
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राम राज प्रसाद, महामंत्री गोरखपुर वीर सेनानी कल्याण संस्थान - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तोलोलिंग चोटी तक मदद पहुंचाना हमारा लक्ष्य था
रामराज प्रसाद, सेवानिवृत्त सैनिक ने युद्ध को याद करते हुए बताया कि कारगिल युद्ध केवल गोलियों और तोपों की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, त्याग और अटूट संकल्प की मिसाल भी था। टाइगर हिल के नीचे स्थित तोलोलिंग चोटी पर दुश्मनों का कब्जा था।

वहां तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं था। ऊंची बेहद कठिन चढ़ाई के बीच हर कदम पर मौत का खतरा मंडरा रहा था। हमारी जिम्मेदारी समय-समय पर आगे मोर्चे पर लड़ रहे जवानों तक हथियार और जरूरी सामग्री पहुंचाने की थी। दुश्मन की नजरों और लगातार हो रही गोलीबारी के बीच भी हमारी टीम ने यह जिम्मा बखूबी निभाया।

बड़े भाई देश की सेवा करते हुए शहीद हो चुके थे। भाई की शहादत ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि देश के प्रति उनका संकल्प और मजबूत कर दिया। उन्होंने कहा कि जब भी थकान या भय महसूस होती थी, शहीद भाई का चेहरा याद आते ही कदम खुद-ब-खुद आगे बढ़ जाते थे।
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