गोरखपुर जिले में साक्ष्यों के अभाव में कहीं मनीष गुप्ता हत्याकांड के आरोपियों के ट्रायल के दौरान अदालत से राहत न पा जाएं। अभी तक जो तथ्य सामने आए हैं उसके मुताबिक केस में साक्ष्य संकलन का स्तर बेहद कमजोर है। जानकार हैरत जताते हैं कि हत्या के दौरान पहने गए कपड़े, वारदात में इस्तेमाल हथियार आदि रिकवर करने के लिए आरोपियों को कस्टडी रिमांड पर लेने की जरूरत एसआईटी ने नहीं समझी।
Exclusive: साक्ष्यों के अभाव में कहीं कमजोर न पड़ जाए मनीष हत्याकांड की जांच, एसआईटी की लापरवाही है या पुलिसिया भाईचारा
अचेत मनीष को नीचे लाते वक्त उसकी चोट से अंदाजा लगाना आसान है कि कपड़ों पर खून के छींटे जरूर आए होंगे, साक्ष्य संकलन के लिए आरोपितों की कस्टडी रिमांड तक नहीं मांगी।
मामले में आरोपी सभी पुलिस कर्मियों की गिरफ्तारी के बाद मामला शांत हो गया है। एसआईटी की टीम घटना के तीन दिन बाद से लगातार शहर में है। दो दिन पहले वीडियो कांफ्रेंसिंग से आरोपी पुलिस कर्मियों की कोर्ट में पेशी भी हो गई, लेकिन किसी आरोपी के रिमांड पर लेने की सूचना नहीं आ सकी। जानकार सवाल उठा रहे हैं कि अगर आरोपियों को रिमांड पर नहीं लिया तो घटना के वक्त मौजूद साक्ष्य एसआईटी को कहां से मिलेंगे? अगर गिरफ्तारी के वक्त एसआईटी की टीम ने उक्त सामानों की जानकारी ली भी होगी तो उसकी बरामदी और उल्लेख में इतना वक्त क्यों लगा रहा है? जिला एवं सत्र न्यायालय के अधिवक्ताओं का कहना है कि घटना के दौरान पहने गए पुलिसकर्मियों के कपड़े, जूते मोजे, बंदूक सबसे बड़े साक्ष्य हैं।
फोटो और वीडियो में दिख रही घटना व पोस्टमार्टम रिपोर्ट में एंटीमॉर्टम चोट के जिक्र से साफ है कि मनीष को काफी गंभीर चोट लगी थी। मनीष के खून के छीटें भी आरोपियों की वर्दी पर या जूते -मोजे पर पड़े होंगे। एसआईटी की टीम ने होटल में खून वाली जगह को तो चिह्नित कर जांच में रखा है, लेकिन इन सबसे अहम कड़ियों को सामने नहीं ला सकी है।
वहीं, मनीष गुप्ता के रिश्तेदारों ने घटना वाले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद मनीष को बंदूक की बट से मारने का आरोप लगाया था। ऐसे में तत्कालीन इंस्पेक्टर जेएन सिंह के हमराही के पास मौजूद एसएलआर की बरामदगी भी जरूरी है। अगर उसी एसएलआर से मारा गया होगा तो उस पर भी मनीष के खून और शरीर के चमड़े के निशान जरूर आए होंगे। ऐसे में मामले की तफ्तीश में एसएलआर भी अहम कड़ी हो सकती है।
गिरफ्तारी और पूछताछ को हो गई, लेकिन सीन री-क्रिएट नहीं कराया
घटना के वक्त जो बातें सामने आईं, उसके मुताबिक तत्कालीन इंस्पेक्टर जगत नारायण सिंह एंड कंपनी ने मनीष को होटल से रात 12:11 बजे नीचे लाती है। 12:36 बजे मनीष को मानसी अस्पताल लेकर जाती है। अस्पताल का स्टाफ मनीष को भर्ती करने से मना देता है। इस सब में करीब 10 मिनट का समय लग जाता है। सीसीटीवी में ये बातें साफ दिखती हैं।
इसके बाद रामगढ़ताल थाने के तत्कालीन रात्रि इंचार्ज व दरोगा अजय राय ने बताया था कि उन्हें 1:12 बजे रात में ही थाने से फोन आया था। रात 1:40 बजे वह थाने पहुंच कर वहां से दो-तीन मिनट बाद मेडिकल कॉलेज के लिए निकल गए थे। रात 2:05 बजे मनीष को मेडिकल कॉलेज लेकर पुलिस की टीम पहुंचती है। पूरे घटनाक्रम का सीन री-क्रिएट पुलिस वालों के साथ करना क्या जरूरी नहीं था? होटल के कमरे के अंदर आखिर क्या बात हुई थी? अगर आरोपी पुलिसकर्मियों की मान लें और मनीष बिस्तर से गिरा तो उस समय होटल के कमरे के अंदर दृश्य क्या रहा होगा?
पुलिस टीम द्वारा कमरे की जांच के दौरान एक फोटो सामने लाई जाती है, जिसमें मनीष हाफ पैंट और टीशर्ट पहने हैं, जबकि थोड़ी देर बाद ही अचेत मनीष सिर्फ अंडरवियर में दिखते हैं? सवाल है कि अगर खुद गिरा तो हाफ पैंट कहां चला गया? क्या एसआईटी की टीम को आरोपितों के साथ घटनास्थल पर जाकर पूरी घटना नहीं समझनी चाहिए थी? इस संबंध में एसआईटी प्रभारी आनंद प्रकाश तिवारी (एडीशनल सीपी) से सवाल किया गया तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।
एसआईटी ने होटल स्टाफ के साथ सीन री-क्रिएट किया था
एसआईटी की टीम जिस दिन गोरखपुर जांच के लिए आई थी, उसी दिन होटल में जाकर सीन री-क्रिएट किया था। अस्पताल और मेडिकल कॉलेज जाकर भी सीन री-क्रिएट किया था, लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ। गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों से थाने पर ही एसआईटी की टीम ने घंटों पूछताछ जरूर की थी।