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जयंती विशेष: पढ़िए काकोरी कांड के महानायक की कहानी, हथियारों के लिए बेच दी थी अपनी लिखी किताब
Fri, 11 Jun 2021 04:50 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 11 Jun 2021 04:50 PM IST
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इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से संरक्षित किया गया है।
- फोटो : अमर उजाला
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अपनी बहादुरी से अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाने वाले महान क्रांतिकारी अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की 124वीं जयंती पर पूरा देश नमन कर रहा है। इस मौके पर हम आपको भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व काकोरी कांड के महानायक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल से जुड़ी खास कहानी बताने जा रहे हैं। उन्होंने 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में जन्म लिया था। वहीं गोरखपुर में बिस्मिल की एक अलग पहचान है। अपने जीवन के आखिरी चार महीने और दस दिन उन्होंने यहां की जिला जेल में बिताए थे। यह वक्त उनके आध्यात्मिक सफर का भी अंतिम पड़ाव था।
राम प्रसाद बिस्मिल
- फोटो : अमर उजाला।
बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि उन्होंने क्रांतिकारी बनने के बाद पहला तमंचा अपनी किताब की बिक्री से मिली राशि से ही खरीदा था। बिस्मिल के जीवन को नई पीढ़ी तक ले जाने की कोशिशों में जुटे गुरुकृपा संस्थान के बृजेश त्रिपाठी कहते हैं, बिस्मिल एक रचनाकार, कवि और साहित्यकार भी थे।
राम प्रसाद बिस्मिल को इसी जगह दी गई थी फांसी।
- फोटो : अमर उजाला
वे अपने जीवन में गुरु भाई परमानंद और दादी मां के स्वाभिमान से बहुत प्रेरित थे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है। बृजेश कहते हैं, उनकी भावनाओं में देशभक्ति कूट-कूटकर भरी थी। वे बहुत पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन साहित्य के मर्मज्ञ थे।
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इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से संरक्षित किया गया है।
- फोटो : अमर उजाला
कोठरी संख्या सात में रहते थे बिस्मिल
बिस्मिल को छह अप्रैल 1927 को काकोरी कांड का अभियुक्त मानते हुए सजा सुनाई गई। वे पहले लखनऊ जेल में रखे गए। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने 10 अगस्त को 1927 को गोरखपुर जेल भेज दिया। यहां वे कोठरी संख्या सात में रहते थे। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से जाना जाता है।
बिस्मिल को छह अप्रैल 1927 को काकोरी कांड का अभियुक्त मानते हुए सजा सुनाई गई। वे पहले लखनऊ जेल में रखे गए। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने 10 अगस्त को 1927 को गोरखपुर जेल भेज दिया। यहां वे कोठरी संख्या सात में रहते थे। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से जाना जाता है।
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राम प्रसाद बिस्मिल अंतिम दिनों में इसी जगह पर बंदी रहे।
- फोटो : अमर उजाला
एकादशी के दिन जन्म और इसी दिन बलिदान
बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी।
बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी।