शुभ संयोगों के बीच वासंतिक नवरात्र की शुरुआत दो अप्रैल व समापन 10 अप्रैल को होगा। इस बार नवरात्र पूरे नौ दिनों का है। कोई तिथि न खंडित, (क्षय) है और न वृद्धि को प्राप्त है। यह नवरात्र संतुलन को बनाए रखने वाला और भारतीय समाज में सौम्यता और संतुलन की दृष्टि से उत्तम रहेगा।
Navratri: शुभ संयोगों संग दो अप्रैल से शुरू हो रहा वासंतिक नवरात्र, जानिए कलश स्थापना का मुहूर्त
वासंतिक नवरात्र का महत्व
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, बसंत ऋतु में होने के कारण चैत्र नवरात्र को वासंतिक नवरात्र कहा जाता है। इस दौरान हर दिन मां के नौ अलग-अलग रूपों मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक मां की पूजा व उपवास किया जाता है। नौवें दिन ही हवन के बाद कन्या पूजन होता है। नौ दिनों तक विधि-विधान से व्रत करने वाले श्रद्धालु 10वें दिन पारण करते हैं। मान्यताओं के अनुसार, चैत्र नवरात्र के नवमी तिथि को ही भगवान राम का जन्म हुआ था।
आठ को महानिशा पूजा, नौ को अष्टमी का व्रत
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, महानिशा पूजा बलिदान के लिए आठ अप्रैल का दिन मान्य रहेगा। इस दिन सप्तमी तिथि का मान आठ बजकर 29 मिनट तक पश्चात रात में अष्टमी है। इसी रात में महानिशा पूजा और देवी के निमित्त बलिदानादिक क्रियाएं संपन्न की जाएंगी। बताया कि नौ अप्रैल दिन शनिवार को महाष्टमी का व्रत किया जाएगा। इस दिन अष्टमी तिथि का मान रात्रि 10 बजकर 26 तक रहेगा। इसी तरह पुनर्वसु नक्षत्र भी संपूर्ण दिन और अर्द्धरात्रि के बाद एक बजकर 56 तक है। सूर्योदय की तिथि में अष्टमी होने से और अर्धरात्रि में नवमी का संयोग होने से महाष्टमी व्रत के लिए यह दिन पूर्ण प्रशस्त रहेगा।
कलश स्थापना मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार, कलश स्थापना दो अप्रैल सुबह पांच बजकर 51 मिनट से सुबह छह बजकर 28 मिनट तक। 10 बजकर तीन मिनट से 12 बजकर 17 मिनट तक। अभिजीत मुहूर्त दिन में 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 36 मिनट तक। शाम चार बजकर 48 मिनट से छह बजकर 10 मिनट तक होगा।
कलश स्थापना पूजन विधि
पंडित जोखन पांडेय शास्त्री के अनुसार, वासंतिक नवरात्र का पर्व आरंभ करने के लिए मिट्टी की वेदी बनाकर उसमें जौ और गेहूं मिलाकर बोएं। उस पर विधिपूर्वक कलश स्थापित करें। कलश पर देवी जी मूर्ति (धातु या मिट्टी) अथवा चित्रपट स्थापित करें। नित्यकर्म समाप्त कर पूजा सामग्री एकत्रित कर पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। इसके बाद आचमन, प्राणायाम, आसन शुद्धि करके शांति मंत्र का पाठ कर संकल्प करें। रक्षादीपक जला लें। सर्वप्रथम क्रमश: गणेश-अंबिका, कलश (वरुण), मातृका पूजन, नवग्रहों तथा लेखपालों का पूजन करें। प्रधान देवता-महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती-स्वरूपिणी भगवती दुर्गा का प्रतिष्ठापूर्वक ध्यान, आह्वान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, पत्र, सौभाग्य द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, ताम्बूल, निराजन, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा आदि षोडशोपचार से विधिपूर्वक श्रद्धा भाव से एकाग्रचित होकर पूजन करें।

कमेंट
कमेंट X