त्राल इलाके के चेवा गांव में 17 घंटे से अधिक समय तक चली मुठभेड़ में शुक्रवार को हिजबुल मुजाहिदीन के तीन आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया। आतंकियों की मौजूदगी की सूचना पर गुरुवार शाम लगभग छह बजे चेवा गांव में सुरक्षाबलों ने घेराबंदी की। इस दौरान घेरा सख्त होने पर एक मकान में छिपे आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई से मुठभेड़ शुरू हो गई। कुछ देर तक फायरिंग जारी रहने के बाद सुरक्षाबलों ने अंधेरे के कारण ऑपरेशन स्थगित कर दिया।
आतंक मुक्त त्रालः हम्माद के बाद जुगनू बना था हिज्ब का कमांडर, ठिकाने समेत ऐसे उड़ाया गया
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इस दौरान फ्लड लाइट लगाई गईं ताकि आतंकी भाग न सकें। पूरे गांव में घेराबंदी जारी रही। शुक्रवार सुबह दोबारा ऑपरेशन शुरू किया गया। इस दौरान सुरक्षाबलों ने तीन आतंकियों को मार गिराया। सुबह साढ़े सात बजे तक पहला, नौ बजे तक दूसरा और 10 बजे तीसरा आतंकी मारा गया। इनसे 2 एके 47 राइफल, 6 एके मैगजीन, 5 एके राउंड, 1 पिस्टल, 1 पिस्टल मैगजीन, 4 पिस्टल राउंड और अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई है।
सूत्रों के अनुसार मारे गए आतंकियों की शिनाख्त हिजबुल के ऑपरेशनल कमांडर मोहम्मद कासिम शाह उर्फ जुगनू, बासित अहमद पररे व हरीश मंजूर भट के रूप में हुई है। जुगनू मडूरा त्राल का रहने वाला था। पुलिस ने फिलहाल मारे गए आतंकियों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। उसने मुठभेड़ स्थल से दूर रहने की लोगों से अपील की है।
त्राल में हिजबुल कमांडर हम्माद खान के मारे जाने के बाद मोहम्मद कासिम शाह उर्फ जुगनू को ऑपरेशनल कमांडर की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मदूरा त्राल का जुगनू तीन मार्च 2017 को संगठन में शामिल हुआ था। उस दौरान वह सिविल इंजीनियरिंग से बीटेक कर रहा था। लारिबल निवासी बासित 27 मई 2020 को शामिल हुआ था। वह विज्ञान में सूचना प्रौद्योगिकी से स्नातक था। तीसरा आतंकी कोयल शिकरागाह का हरीश 25 अप्रैल को लापता हुआ था। इसके बाद उसने आतंक का दामन थाम लिया था।
पुलिस के अनुसार मारे गए आतंकियों के शवों को उत्तरी कश्मीर के हंदवाड़ा भेज दिया गया है जहां उनकी डीएनए सैंपलिंग कर शवों को दफनाया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक मुठभेड़ के दौरान जिस मकान में आतंकी छुपे हुए थे उसे सुरक्षाबलों ने उड़ा दिया है। दक्षिणी कश्मीर में जून माह में ये 12वी मुठभेड़ है। उधर, जम्मू-कश्मीर पुलिस ने दावा किया कि पुलवामा जिले के त्राल क्षेत्र में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों की अब कोई मौजूदगी नहीं है। 1989 में घाटी में आतंकवाद के फैलने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है।