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Thyroid: थायराइड की समस्या महिलाओं में क्यों अधिक देखने को मिलती है? जान लें इसके पीछे का मूल कारण

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिखर बरनवाल Updated Sun, 18 Jan 2026 08:53 PM IST
सार

Risks of Thyroid in Pregnancy: अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि महिलाएं थायराइड से अधिक परेशान रहती हैं। ऐसा होने के पीछे कई कारण हैं, आइए इस लेख में इसी के बारे में विस्तार से जानते हैं।

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थायरॉइड - फोटो : Freepik.com

Symptoms of Thyroid in Women: थायराइड एक छोटी सी तितली के आकार की ग्रंथि है जो हमारी गर्दन के निचले हिस्से में स्थित होती है। हालांकि यह ग्रंथि छोटी है, लेकिन यह शरीर के मेटाबॉलिज्म, एनर्जी लेवल और हृदय गति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को थायराइड विकार होने की आशंका कई गुना अधिक होती है।



इसका मुख्य कारण महिलाओं के शरीर में होने वाले जटिल हार्मोनल उतार-चढ़ाव हैं। प्यूबर्टी (किशोरावस्था), मासिक धर्म चक्र, गर्भावस्था और मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन में होने वाले बदलाव थायराइड ग्रंथि के कामकाज को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।

जब यह ग्रंथि जरूरत से ज्यादा (हाइपरथायरायडिज्म) या बहुत कम (हाइपोथायरायडिज्म) हार्मोन बनाती है, तो वजन बढ़ना, थकान, बालों का झड़ना और अनियमित पीरियड जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। महिलाओं में इस समस्या की अधिकता का एक बड़ा कारण उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली की संवेदनशीलता भी है। आइए इस लेख में ऐसा होने के पीछे के अन्य कारण के बारे में भी विस्तार से जानते हैं।

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थायरॉइ़ड - फोटो : Adobe Stock

महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली
महिलाओं में थायराइड का सबसे बड़ा कारण 'ऑटोइम्यून' विकार हैं, जैसे हाशिमोटो रोग। महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पुरुषों की तुलना में अधिक सक्रिय होती है, जिसके कारण कभी-कभी शरीर की रक्षा करने वाली कोशिकाएं गलती से अपनी ही थायराइड ग्रंथि पर हमला कर देती हैं। इससे ग्रंथि में सूजन आ जाती है और वह सही मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती। यही कारण है कि महिलाओं में 'हाइपोथायरायडिज्म' के मामले सबसे ज्यादा देखे जाते हैं।


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थायरॉइ़ड - फोटो : Adobe Stock

गर्भावस्था और प्रसव के बाद के शारीरिक बदलाव
गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में 'एचसीजी' और एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर काफी बढ़ जाता है, जो थायराइड को उत्तेजित करते हैं। कई महिलाओं को प्रसव के बाद 'पोस्टपार्टम थायरायडिटिस' की समस्या हो जाती है, जिसमें प्रसव के पहले साल के भीतर थायराइड ग्रंथि में सूजन आ जाती है। अगर इसे समय पर नहीं पहचाना गया, तो यह स्थाई रूप से थायराइड की बीमारी बन सकती है, जिससे मां और शिशु दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

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थायरॉइ़ड - फोटो : Adobe Stock

पोषक तत्वों की कमी
आजकल की व्यस्त जीवनशैली अत्यधिक तनाव और खान-पान में आयोडीन, सेलेनियम व आयरन की कमी महिलाओं में थायराइड के जोखिम को बढ़ा देती है। तनाव शरीर में 'कोर्टिसोल' हार्मोन को बढ़ाता है, जो थायराइड हार्मोन के उत्पादन में बाधा डालता है। इसके अलावा प्लास्टिक के बर्तनों का अधिक उपयोग और पर्यावरण में मौजूद टॉक्सिन्स भी स्रावी तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं, जिसका सीधा असर थायराइड पर पड़ता है।

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थायरॉइ़ड - फोटो : Adobe Stock
समय पर जांच और जागरूकता
थायराइड एक ऐसी समस्या है जिसे सही खान-पान, व्यायाम और समय पर ली गई दवाइयों से पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। महिलाओं को चाहिए कि वे 30 की उम्र के बाद नियमित रूप से अपना 'टी.एस.एच' टेस्ट करवाते रहें। अगर आपको लगातार थकान, कब्ज या मूड स्विंग्स महसूस हों, तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर न टालें, तुरंत डॉक्टर से मिलकर परामर्श लें।

नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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