मोहब्बत 1981 की हो या 2018 की, इश्क जताने का जरिया चिट्ठी हो या फिर वीडियो कॉलिंग, रिश्तों की बुनियाद भरोसा, उम्मीद और सुख-दुख में साथ देने जैसे शब्दों पर ही टिकती है। आज वैलेंटाइन-डे है। यानी मोहब्बत का दिन। हम सभी जानते हैं, प्यार एक दिन की बात नहीं होती है। आखिर क्या होता है प्यार, कैसे निभाते हैं वर्षों तक इश्क? बस इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमने बात की शहर के कुछ खास लोगों से। उन्होंने अमर उजाला से साझा किया अपना इश्क...
वैलेंटाइन डे special: क्या होता है प्यार का अहसास, जानें- इन कपल्स की जुबानी
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दूसरी मुलाकात में ही मुझे कर दिया प्रपोज
मेरे बुटीक पर विशाल किसी के साथ आए थे। फॉर्मल बातचीत ही हुई थी। मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि हमारे बीच कुछ है, लेकिन जब हमारी दूसरी मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझे प्रपोज कर दिया। मैं ना नहीं कर पाई। हम एक-दूसरे के साथ हो लिये। शादी के बाद आज वैलेंटाइन डे पर हमारी पहली एनिवर्सरी भी है। मेरे लिए वैलेंटाइन-डे बेहद खास है। बस हम यही सोचते हैं कि अच्छा-बुरा चाहे जैसा भी वक्त आएगा, हम एक साथ उसे बांट लेंगे। एक-दूसरे के साथ रहेंगे। (तस्वीर में- फैशन डिजाइनर गरिमा पति विशाल के साथ।)
उनके खत के लिए डाकिये का इंतजार
हमारी शादी 1981 में हुई थी। जब वह बिहार के मुजफ्फरपुर से 60 किमी. दूर मेरे गांव पहुंचीं तो बहुत अच्छा फील हो रहा था। खुशी-खुशी चार-पांच दिन बीते ही थे कि नौकरी पर लखनऊ रवाना होना पड़ा। यहां आया तो चिट्ठियों का सिलसिला शुरू हुआ। एक माह में दस-दस चिट्ठियां लिखता था। उस वक्त किसी चीज को देखकर सबसे ज्यादा खुशी होती थी तो वह था डाकिया। डाकिया भी यंग था। समझता था कि हमें खत का इंतजार है।
किस्सा जो दिल को छू गया
नीतू से जब शादी तय हुई थी तो मुझे डर सिर्फ इस बात का था कि डीयू में पढ़ी फटाफट इंग्लिश बोलने वाली लड़की बिहार के सामान्य परिवार में कैसे एडजस्ट करेगी। लेकिन शादी बाद जब मैंने देखा कि वह तो घूंघट ओढे़ चूल्हे पर खाना बना रही है। हैंडपंप से पानी भर रही है तब जाकर जान में जान आई। मैं समझ गया कि लड़की परफेक्ट है। उसकी इंग्लिश इतनी अच्छी है कि आज भी उसी से स्पेलिंग पूछता हूं। (तस्वीर में- एमपी सिंह, एसीएम-एनईआर पत्नी नीतू सिंह के साथ।)
उनकी मासूमियत की कायल हू मैं
अनिरुद्ध से शादी की बातचीत शुरू हुई तो मेरी तबीयत खराब थी। लड़के पक्ष से लोग मेरा हालचाल लेने घर आ गए। लेकिन उनके साथ अनिरुद्ध नहीं थे। बाद में उनका भी फोन आया। शादी तय हो गई। हम दोनों के बीच खूब बातें हुईं। अनिरुद्ध की जॉब दुबई में है। ऐसे में मिलना मुश्किल होता है। चार दिन बाद 18 मार्च को हमारी शादी है।
किस्सा जो दिल को छू गया
मैं बीमार थी। इस बीच उनका फोन आया। उनके शब्दों से पता चल रहा था कि वाकई उनको मेरी फिक्र है। मैं तेजी से रिकवर करने लगी। मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था कि दवा से ज्यादा असर उनके फोन आने का हुआ। (तस्वीर में- अश्रुति, अनिरुद्ध के साथ।)
मैं बिंदास, वो केयरफुल ...बस जम गई जोड़ी
केजीएमसी में डॉ. राजीव मेरे सीनियर थे। मुलाकात तो थी लेकिन शादी इन्हीं से होगी ये पता नहीं था। दोनों परिवारों में बातचीत हुई। 1993 में एंगेजमेंट हुई और जून 1994 में शादी हो गई। राजीव शुरू से ही बहुत केयरिंग, डीसेंट थे। उनमें बहुत ज्यादा पेशेंस था, जबकि मैं बिंदास टाइप की। मुझे लगने लगा था कि उनके बगैर मैं अधूरी हूं।
किस्सा जो दिल को छू गया
प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलीवरी के बाद जब मेरी तबीयत खराब थी तो वह घर का सारा काम खुद करते थे। यहां तक कि वह बाई को भी हाथ नहीं लगाने देते थे। इस दौरान मैं अक्सर उन्हें काम करते देखती थी तो सोचने लगती थी कि आखिर ये बंदा है क्या चीज। जब भी उस वाकये को याद करती हूं तो लगता है कि मेरा हसबैंड द बेस्ट है। (तस्वीरे में- डॉ. तूलिका चंद्रा पति डॉ. राजीव के साथ।)