बसपा सुप्रीमो मायावती व सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव यूपी की सियासत में कट्टर विरोधी हैं। एक-दूसरें को फूटी आंख नहीं सुहाते। दोनों बृहस्पतिवार को दो घंटे के अंतराल पर मीडिया से मुखातिब हुए। उन्होंने 500 व 1000 रुपये के नोट बंद करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जमकर कोसा। इस दौरान उनके आरोप एक जैसे और तुलना भी एक जैसी ही थी।
माया व मुलायम बोल रहे एक जुबान, अरे! ये तो इमरजेंसी
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माया व मुलायम ने मोदी सरकार के इस फैसले को इमरजेंसी जैसा बताया। माया ने कहा कि केंद्र सरकार का पुराने नोट बंद करने का यह फैसला आर्थिक आपातकाल जैसा है। केंद्र में ढ़ाई साल बिताने के बाद यह फैसला किया गया है। जब वह चुनावी वादों का एक चौथाई भी पूरा नहीं कर पाए हैं। देश का हर वर्ग मोदी के शासनकाल से निराश है। ऐसे में चुनाव नजदीक आते देख सरकार की कमियों से ध्यान बंटाने के लिए कालेधन पर अंकुश लगाने के नाम पर आर्थिक इमरजेंसी लगाने जैसा वातावरण बनाया गया है। उन्होंने कहा, कांग्रेस ने जिस तरह राजनीतिक इमरजेंसी लगाई थी, वैसा ही यह भी फैसला है। देश के 90 फीसदी लोग इससे दुखी हैं।
वहीं, मुलायम ने इसे देश के खिलाफ आपातकाल के बाद लगाया गया सबसे बड़ा फैसला बताया। उन्होंने कहा, देशवासियों के जीवन में अभाव पैदा हो गया है। विदेशों से भी पैसा मिलना बंद हो जाएगा। काला धन विदेशी मुद्रा और सोने के रूप में जमा है। उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। केवल गरीबों को परेशान करने के लिए कदम उठाया गया है।
माया-मुलायम का दूसरा आरोप भी एक जैसा रहा। दोनों ने ही सरकार के इस फैसले को उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाला बताया। मायावती ने कहा कि नोटों पर पाबंदी के फैसले ने धन्नासेठों को इसका लाभ उठाने का रास्ता खोल दिया है। पेट्रोल पंप वालों की चांदी हो गई है। लेकिन इस फैसले ने गरीब व मध्यम वर्ग को जिस तरह चोट पहुंचाई है, यह वर्ग विधानसभा चुनाव में बीजेपी एंड कंपनी को जरूर सख्त सजा देगा। मोदी का यह फैसला जनहित में कम, किसी को तकलीफ में देखकर आत्मसंतोष प्राप्त करने वाला ज्यादा लगता है।
मुलायम ने मोदी सरकार के इस कदम को देश के बड़े घरानों के हाथों गिरवी रखने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा, विदेशों से कालाधन वापस लाने के दबाव में प्रधानमंत्री मोदी ने जल्दबाजी में बड़े नोट बंद करने की घोषणा कर दी। इससे अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है। लोग तनाव में हैं, सदमे से मौत हो रही है। मोदी देश को बड़े घरानों के हाथों में गिरवी रख देना चाहते हैं। इस फैसले से कंस्ट्रक्शन के कार्य बंद हो जाएंगे, करोड़ों मजदूर बेरोजगार होंगे। व्यापार बुरी तरह प्रभावित होगा और कानून-व्यवस्था खराब होगी।