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बड़े-बूढ़ों के साथ संवाद कर उनके अकेलेपन को दूर कर रहे चंद लोग, दर्द बांटना है इनका मकसद
Thu, 01 Oct 2020 02:51 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Thu, 01 Oct 2020 02:51 PM IST
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गौरव और उनके साथी, उमेश कुमार, डॉ इंदु सुभाष
- फोटो : अमर उजाला
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कुछ इस तरह खूबसूरत मेरी शाम हो गई
प्रतीकात्मक तस्वीर
एक अक्तूबर को वरिष्ठ नागरिकों को समर्पित इस खास दिन पर आइए हम बात करते हैं उनकी जिन्होंने अपने व्यस्त समय के कुछ घंटे इन बुजुर्गों के नाम कर दिए। ये मानते हैं कि बुजुर्ग हैं तो रिश्ते हैं, नाम है पहचान है, अगर बुजुर्ग नहीं तो बच्चों की कहानियां बेजान हैं।
उमेश कुमार चांदना
- फोटो : अमर उजाला
झुर्रियों के पीछे का दर्द बांटना है मकसद
नागरिक सुरक्षा संगठन के पदाधिकारी हैं उमेश कुमार चांदना। इन्हें अक्सर पेपर मिल कॉलोनी के पार्क में बुजुर्गों से बतियाते देखा जा सकता है। 12 साल से इनकी दिनचर्या में बुजुर्गों को हंसाना, उनकी बातें सुनना शामिल है। इसके अलावा किसी को दवा की जरूरत है या डॉक्टर को दिखाना है, कोई मदद के लिए नहीं है तो ये उसको अस्पताल ले जाकर दिखाने से लेकर घर तक छोड़ते हैं। इलाज कराने को जिस बुजुर्ग के पास पैसे नहीं उसके लिए ये सांसद-विधायक-मंत्री किसी से भी गुहार लगाने पहुंच जाते हैं। इनकी कोशिशों से मदद का इंतजाम हो ही जाता है। ये कभी बुजुर्गों की मरहम पट्टी करते दिख जाते हैं तो कहीं घर वालों की उपेक्षा का शिकार बुजुर्ग की आंखों के आंसू पोंछने पहुंच जाते हैं। हंसते हुए कहते हैं कि एक दिन सबको सठियाना है, फिर थोड़ा तजुर्बा ले लिया जाए।
क्यों करते हैं ये सब: उमेश कहते हैं कि बुजुर्गों को सिर्फ और सिर्फ हमारी तवज्जो चाहिए और कुछ नहीं।
नागरिक सुरक्षा संगठन के पदाधिकारी हैं उमेश कुमार चांदना। इन्हें अक्सर पेपर मिल कॉलोनी के पार्क में बुजुर्गों से बतियाते देखा जा सकता है। 12 साल से इनकी दिनचर्या में बुजुर्गों को हंसाना, उनकी बातें सुनना शामिल है। इसके अलावा किसी को दवा की जरूरत है या डॉक्टर को दिखाना है, कोई मदद के लिए नहीं है तो ये उसको अस्पताल ले जाकर दिखाने से लेकर घर तक छोड़ते हैं। इलाज कराने को जिस बुजुर्ग के पास पैसे नहीं उसके लिए ये सांसद-विधायक-मंत्री किसी से भी गुहार लगाने पहुंच जाते हैं। इनकी कोशिशों से मदद का इंतजाम हो ही जाता है। ये कभी बुजुर्गों की मरहम पट्टी करते दिख जाते हैं तो कहीं घर वालों की उपेक्षा का शिकार बुजुर्ग की आंखों के आंसू पोंछने पहुंच जाते हैं। हंसते हुए कहते हैं कि एक दिन सबको सठियाना है, फिर थोड़ा तजुर्बा ले लिया जाए।
क्यों करते हैं ये सब: उमेश कहते हैं कि बुजुर्गों को सिर्फ और सिर्फ हमारी तवज्जो चाहिए और कुछ नहीं।
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गौरव, और उनके साथी
- फोटो : अमर उजाला
व्यस्त समय से कुछ पलों की बुजुर्गों के नाम कर दी रजिस्ट्री
गौरव, आस्था, रचित, ऋचा, वैभव, इशिता, शिखर समेत उनके कई दोस्त उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे ये अहसास है कि बुजुर्गों को सिर्फ और सिर्फ थोड़ा वक्त चाहिए। इसके बदले में उनसे दुआएं और बेशकीमती तजुर्बे का खजाना मिल जाएगा। इन युवाओं ने 2017 में एक क्लब बनाया, जिसका नाम रखा मोटीवेजर्स क्लब। गौरव कहते हैं कि इसकी शुरुआत दोस्तों के बाहर जाने से अकेले रह गए उनके माता-पिता को देखकर हुई। हमने 6 महीने तक सर्वे किया, समझा कि इनकी जरूरतें क्या हैं। निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन्हें पैसा नहीं बल्कि हमारा समय चाहिए। हम हफ्ते में एक दिन किसी पार्क में चाय पर चर्चा करने लगे। कोविड से पहले तक हम इनके साथ किसी एक दिन कभी क्लब, कभी लाउंज कभी रेस्टोरेंट में जाकर वक्त बिताते, किस्से कहानियां कविताएं सुनते थे। कोविड के दौरान हमने अपने सारे संवाद ऑनलाइन कर दिए हैं। वेबिनार के दौरान जब ये मोबाइल पर एक-दूसरे से मिलते हैं तो इनकी खुशी देखते ही बनती है।
क्यों इसकी जरूरत है: गौरव कहते हैं कि इनके मन में बहुत खालीपन है, कारण अलग-अलग है, पर ये ठीक नहीं।
गौरव, आस्था, रचित, ऋचा, वैभव, इशिता, शिखर समेत उनके कई दोस्त उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे ये अहसास है कि बुजुर्गों को सिर्फ और सिर्फ थोड़ा वक्त चाहिए। इसके बदले में उनसे दुआएं और बेशकीमती तजुर्बे का खजाना मिल जाएगा। इन युवाओं ने 2017 में एक क्लब बनाया, जिसका नाम रखा मोटीवेजर्स क्लब। गौरव कहते हैं कि इसकी शुरुआत दोस्तों के बाहर जाने से अकेले रह गए उनके माता-पिता को देखकर हुई। हमने 6 महीने तक सर्वे किया, समझा कि इनकी जरूरतें क्या हैं। निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन्हें पैसा नहीं बल्कि हमारा समय चाहिए। हम हफ्ते में एक दिन किसी पार्क में चाय पर चर्चा करने लगे। कोविड से पहले तक हम इनके साथ किसी एक दिन कभी क्लब, कभी लाउंज कभी रेस्टोरेंट में जाकर वक्त बिताते, किस्से कहानियां कविताएं सुनते थे। कोविड के दौरान हमने अपने सारे संवाद ऑनलाइन कर दिए हैं। वेबिनार के दौरान जब ये मोबाइल पर एक-दूसरे से मिलते हैं तो इनकी खुशी देखते ही बनती है।
क्यों इसकी जरूरत है: गौरव कहते हैं कि इनके मन में बहुत खालीपन है, कारण अलग-अलग है, पर ये ठीक नहीं।
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डाॅ इंदु सुभाष
- फोटो : अमर उजाला
...ताकि कोई न कर सके उनसे दुर्व्यवहार
डॉ. इंदु सुभाष घर की चारदीवारी में बुजुर्गों पर होने वाले दुर्व्यवहार, घरेलू हिंसा के खिलाफ एक खामोश जंग लड़ रही है। वे यूपी पुलिस की वरिष्ठ नागरिक मध्यस्थता सेल की मुख्य सलाहकार हैं। कहती हैं कि कानूनी मदद देनी हो या फिर आने-जाने का भाड़े देकर किसी को बुलवाना हो, डॉ. इंदु सुभाष सारी जिम्दारी खुद निभाती हैं। कहती हैं कि पहली कोशिश बातचीत से समस्या हल करने, मध्यस्थता कराने की होती है। बात नहीं बनती तो आगे की कार्रवाई के बारे में सोचते हैं। सेल के सीयूजी नंबर के अलावा वे खुद भी एक हेल्पलाइन चलाती हैं, जिसका खर्च वे खुद वहन करती हैं।
क्यों है इसकी जरूरत : कहती हैं कि ये सेवा मैंने अपने माता-पिता को समर्पित की है, मेरे लिए हर बुजुर्ग में अपने माता-पिता को देखती हूं।
डॉ. इंदु सुभाष घर की चारदीवारी में बुजुर्गों पर होने वाले दुर्व्यवहार, घरेलू हिंसा के खिलाफ एक खामोश जंग लड़ रही है। वे यूपी पुलिस की वरिष्ठ नागरिक मध्यस्थता सेल की मुख्य सलाहकार हैं। कहती हैं कि कानूनी मदद देनी हो या फिर आने-जाने का भाड़े देकर किसी को बुलवाना हो, डॉ. इंदु सुभाष सारी जिम्दारी खुद निभाती हैं। कहती हैं कि पहली कोशिश बातचीत से समस्या हल करने, मध्यस्थता कराने की होती है। बात नहीं बनती तो आगे की कार्रवाई के बारे में सोचते हैं। सेल के सीयूजी नंबर के अलावा वे खुद भी एक हेल्पलाइन चलाती हैं, जिसका खर्च वे खुद वहन करती हैं।
क्यों है इसकी जरूरत : कहती हैं कि ये सेवा मैंने अपने माता-पिता को समर्पित की है, मेरे लिए हर बुजुर्ग में अपने माता-पिता को देखती हूं।